वेजुएला के राष्ट्रपति को अमेरिका ले जाने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर साफ संकेत दिया है कि अब उनकी नजर ग्रीनलैंड पर है. ट्रंप का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से ग्रीनलैंड को अमेरिका के नियंत्रण में लाना जरूरी है. यह बयान ऐसे समय में आया है, जब वैश्विक राजनीति में आर्कटिक क्षेत्र की अहमियत तेजी से बढ़ रही है. Photo: Getty
यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर ऐसा रुख अपनाया हो. साल 2019 में, अपने पहले कार्यकाल के दौरान, उन्होंने ग्रीनलैंड को खरीदने की पेशकश की थी. हालांकि डेनमार्क ने उस प्रस्ताव को साफ तौर पर ठुकरा दिया था. इसके बावजूद ट्रंप की दिलचस्पी खत्म नहीं हुई. जेफ लैंड्री को ग्रीनलैंड का विशेष दूत बनाए जाने के बाद, 2025 के अंत में यह विवाद और गहरा गया है. लैंड्री खुले तौर पर कह चुके हैं कि ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनना चाहिए. Photo: Getty
ग्रीनलैंड उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित एक विशाल द्वीप है. ग्रीनलैंड के पश्चिम में कनाडा है और पूर्व में आइसलैंड. भले ही ग्रीनलैंड ज़मीन के हिसाब से उत्तरी अमेरिका का हिस्सा है, लेकिन यह डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है. Photo: Getty
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ग्रीनलैंड में ऐसा क्या खास है, जो अमेरिका इसे इतना जरूरी मान रहा है. ग्रीनलैंड की अहमियत सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है. इसके पीछे संसाधनों और भू-रणनीति का बड़ा खेल है. ग्रीनलैंड का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा बर्फ से ढका हुआ है. माना जाता है कि यहां दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत शुद्ध पानी का भंडार मौजूद है. जलवायु परिवर्तन और बढ़ते जल संकट के दौर में यह पानी भविष्य का बेहद अहम संसाधन माना जा रहा है. Photo: Getty
ग्रीनलैंड प्राकृतिक संसाधनों से भी भरपूर है. CIA.GOV के मुताबिक यहां कोयला, लौह अयस्क, सीसा, जिंक और मोलिब्डेनम जैसे खनिज पाए जाते हैं. इसके अलावा यहां हीरे, सोना और प्लैटिनम जैसे कीमती खनिज भी मौजूद हैं. सबसे अहम हैं दुर्लभ खनिज,नियोबियम, टैंटलम और यूरेनियम,जो आधुनिक तकनीक और रक्षा उद्योग के लिए बेहद जरूरी माने जाते हैं. Photo: Reuters
समुद्री संसाधनों के मामले में भी ग्रीनलैंड काफी समृद्ध है. यहां मछलियां, सील और व्हेल पाई जाती हैं. ऊर्जा के क्षेत्र में ग्रीनलैंड में हाइड्रोपावर की बड़ी क्षमता मानी जाती है. इसके साथ ही यहां तेल और गैस के संभावित भंडार भी बताए जाते हैं, जो इसकी रणनीतिक अहमियत को और बढ़ाते हैं. Photo: Reuters
ग्रीनलैंड में मौजूद ये संसाधन आज की उभरती तकनीकों की बुनियाद हैं. इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियां, पवन टरबाइन, सैन्य उपकरण, मिसाइल सिस्टम, सैटेलाइट और स्पेस टेक्नोलॉजी,इन सभी के लिए यहां पाए जाने वाले खनिज बेहद जरूरी हैं. यही वजह है कि अमेरिका ग्रीनलैंड को सिर्फ एक द्वीप नहीं, बल्कि अपनी भविष्य की तकनीकी और रणनीतिक सुरक्षा के रूप में देखता है. Photo: Reuters
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता चीन है. चीनी कंपनियां यहां खनन परियोजनाओं में दिलचस्पी दिखा चुकी हैं. खासकर रेयर अर्थ मिनरल्स के दोहन में चीन की सक्रियता अमेरिका और डेनमार्क दोनों को चिंता में डालती है. चीन पहले से ही वैश्विक रेयर अर्थ सप्लाई चेन पर मजबूत पकड़ बनाए हुए है. अगर ग्रीनलैंड के संसाधनों पर भी चीन का असर बढ़ता है, तो यह अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ा रणनीतिक खतरा बन सकता है. Photo: Reuters
इंस्टीट्यूट ऑफ चाइना–अमेरिका स्टडीज़ के अनुसार, साल 2019 में अमेरिका ने सस्टेनेबल मिनरल रिसोर्स डेवलपमेंट को सपोर्ट करने के लिए ग्रीनलैंड के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MOU) साइन किया था. अगले साल, अमेरिका ने नूक में अपना दूतावास फिर से खोला और स्टेट डिपार्टमेंट और US जियोलॉजिकल सर्वे के ज़रिए माइनिंग पार्टनरशिप को सपोर्ट करने के लिए पहल शुरू कीं. Photo: Reuters
हालांकि, पिछली दो अमेरिकी सरकारों के दौरान हुए घटनाक्रमों से पता चलता है कि रिश्तों में थोड़ी ठंडक आई है. ग्रीनलैंड की बिजनेस और मिनरल रिसोर्स मंत्री नाजा नाथानिएलसन ने बताया कि डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान खनिज सहयोग पर साइन किया गया MOU खत्म हो गया है, और राष्ट्रपति जो बाइडेन के तहत इसे रिन्यू करने की कोशिशें नाकाम रहीं. Photo: Reuters
डिफेंस प्रोडक्शन एक्ट और इंडस्ट्रियल बेस एनालिसिस एंड सस्टेनमेंट (IBAS) प्रोग्राम के ज़रिए, US डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस (DoD) ने चीनी दखल से मुक्त रेयर अर्थ सप्लाई चेन को फंड देना शुरू किया , जिसमें वे चेन भी शामिल थीं जो संभावित रूप से ग्रीनलैंड में हो सकती थीं. इन कोशिशों का मकसद डिफेंस और टेक्नोलॉजी सेक्टर के लिए ज़रूरी मटीरियल हासिल करना और चीन के दबदबे वाली सप्लाई चेन पर निर्भरता कम करना था. Photo: Reuters
इतिहास भी बताता है कि अमेरिका 1867 में अलास्का खरीदने के बाद अमेरिका ने डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदने की कोशिश की थी. साल 1910 में इसे तीन देशों के बीच समझौते के जरिए हासिल करने की योजना बनी. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1941 में ‘डिफेंस ऑफ ग्रीनलैंड’ समझौते के तहत अमेरिका ने इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली. इसके बाद 1951 में हुए नए समझौते से यहां अमेरिकी सैन्य मौजूदगी और मजबूत हो गई. आज भी थुले एयर बेस आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका का सबसे अहम सैन्य ठिकाना माना जाता है. Photo: Reuters