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नोएडा अथॉरिटी के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह की जमानत याचिका खारिज

नोएडा अथॉरिटी के हजारों करोड़ रुपये के घोटाला मामले में आरोपी यादव सिंह की जमानत याचिका मंगलवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने खारिज कर दी. लखनऊ जेल में बंद यादव सिंह ने प्रवर्तन निदेशालय के मामले में मंगलवार को जमानत याचिका दायर की थी, जो खारिज कर दी गई.

करोड़ों रुपये के घोटाला मामले में आरोपी यादव सिंह करोड़ों रुपये के घोटाला मामले में आरोपी यादव सिंह

नोएडा अथॉरिटी के हजारों करोड़ रुपये के घोटाला मामले में आरोपी यादव सिंह की जमानत याचिका मंगलवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने खारिज कर दी. लखनऊ जेल में बंद यादव सिंह ने प्रवर्तन निदेशालय के मामले में मंगलवार को जमानत याचिका दायर की थी, जो खारिज कर दी गई.

 

जमानत याचिका खारिज होने के बाद यादव सिंह को जल्द राहत मिलती नहीं दिख रही है. यादव सहित उनके नोएडा अथॉरिटी के नौ साथी बहुचर्चित टेंडर घोटाले में डासना जेल में सजा काट रहे हैं. उन पर आरोप है कि उसने नोएडा प्राधिकरण में चीफ इंजीनियर रहते हुए कई सौ करोड़ रुपये घूस लेकर ठेकेदारों को टेंडर बांटे.

 

यही नहीं नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस अथॉरिटी में इंजीनियर रहते हुए यादव सिंह की सभी तरह के टेंडर और पैसों के आवंटन में बड़ी भूमिका होती थी. सीबीआई ने यादव सिंह के खिलाफ आईपीसी की धारा 409, 420, 466, 467, 469, 481 के अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज किया है.

 

यादव सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार, आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, फर्जीवाड़ा और कानून के उल्लंघन के संबंध में केस दर्ज किया गया है. यादव सिंह पर आरोप है कि उन्होंने महज आठ दिनों में 100 करोड़ रुपये कमा लिए थे. चीफ इंजीनियर रहते हुए यादव सिंह की सभी तरह के टेंडर और पैसों के आवंटन बड़ी भूमिका होती थी.

 

साल 2011 के दिसंबर महीने के लगातार 8 दिनों में ही इन टेंडर को पास करने के लिए यादव सिंह ने बतौर चीफ इंजीनियर कागजातों पर दस्तखत किए थे. जिन कंपनियों को टेंडर दिए गए थे उनमें से कई ने साइट पर काम बहुत पहले ही शुरू कर दिए थे और दिसंबर तक करीब 60 फीसदी काम भी पूरा कर दिया गया था.

 

आरोप है कि 21.90 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट जेएसपीएल कंस्ट्रक्शन को दिया गया था. तिरुपति कंस्ट्रक्सन को 25.50 करोड़ रुपये का टेंडर और एनकेजी इंफ्रास्ट्रक्चर्स को 34.87 करोड़ रुपये का टेंडर बिना यादव सिंह के दस्तखत के ही दे दिया गया था. तभी इस बड़े कारनामे के बाद ही इनकम टैक्स वालों की नजर पड़ी थी.

 

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