कोरोना वायरस का इलाज अब तक संभव नहीं हो पाया है लेकिन भारत, ब्राजील, जापान समेत कई देशों में COVID-19 का असर कम देखा जा रहा है. इन सभी देशों में बच्चों के जन्म के बाद उन्हें बीसीजी (बैसिलस कैलमेट-गुएरिन) के टीके दिए जाते हैं. यह टीका बच्चों को टीवी जैसी खतरनाक बीमारी से बचाता है. लेकिन माना जा रहा है कि फिलहाल यह कोरोना जैसी गंभीर महामारी के खिलाफ भी काम आ रहा है. वहीं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने कोरोना वायरस के मरीजों के इलाज में बीसीजी के वैक्सिनेशन के इस्तेमाल को पूरी तरह सही नहीं माना है.
ICMR प्रमुख डॉ. आर गंगाखेड़कर ने एक सवाल के जवाब में कहा कि काउंसिल इस दवाई के प्रयोग की सलाह तब तक नहीं देगा. जब तक कि स्पष्ट परिणाम सामने ना आ जाए. उन्होंने कहा, 'अगले हफ्ते से ICMR एक स्टडी शुरू करने जा रहा है. चूंकि अभी हमारे पास कोरोना के खिलाफ बीसीजी के टीके के स्पष्ट परिणाम नहीं हैं, इसलिए हम इसे हेल्थ वर्कर्स पर भी नहीं इस्तेमाल करेंगे.'
जाहिर है इससे पहले हेल्थ केयर वर्कर को भी वैक्सीन देने की बात कही जा रही थी. क्योंकि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में ये पहली पंक्ति में खड़े हैं.
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उन्होंने आगे कहा, 'बीसीजी के टीके जन्म के तुरंत बाद लगता है. लेकिन टीका लेने के बाद किसी को टीबी जैसी बीमारी नहीं होगी, ये दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है. यह शायद दिमागी बुखार (मैनेनजाइटिस) के खिलाफ काम आ सकता है. इसलिए इससे आंशिक बचाव ही संभव है. बीसीजी टीका लेने के बाद भी इसका असर 15 साल तक ही होता है. अगर फिर से टीका देने की बात है तो नौजवानों में तो दिया जा सकता है लेकिन 70 साल के किसी व्यक्ति को इससे फायदा नहीं होगा.'
वहीं कोरोना वायरस म्यूटेशन को लेकर डॉ. आर गंगाखेड़कर ने कहा कि इसका जीनोम सीक्वेंसिंग भारत से पहले अन्य देशों में भी हुआ है. कोरोना वायरस की ढेर सारी प्रजातियां है. हमारे यहां अलग-अलग देशों से लोग आए हैं. हमारे यहां वुहान वाले वायरस भी आए हैं. ईरान से जो वायरस आया वो भी वुहान जैसा ही है. इटली वालों में यूरोप और यूएस के वायरस दिखे हैं. इस तरह हमारे देश में अलग अलग किस्म के वायरस हैं. इसलिए देखना होगा कि किस किस्म वाले वायरस पर कौन सी दवाई असर कर रही है.
इससे पहले WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) ने भी बताया कि कोरोना पर बीसीजी के असर को लेकर स्टडी में साफ नहीं है कि इसका टीका दिए जाने से लोगों को कोराना से फुल प्रोटेक्शन मिल जाएगा.
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने बीसीजी के टीके को बताया था कारगर
बता दें, अमेरिकी वैज्ञानिकों के मुताबिक बीसीजी का टीका कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में परिवर्तनकारी साबित हो सकता है. न्यूयॉर्क इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनवाईआईटी) के एक अध्ययन में इटली और अमेरिका का उदाहरण देते हुए राष्ट्रीय नीतियों के तहत कई देशों में लगाए जाने वाले बीसीजी के टीके और कोविड-19 के प्रभाव की बात कही गई है.
एक अनुसंधानकर्ताओं ने कहा, ‘‘हमने पाया कि जिन देशों में बीसीजी टीकाकरण की नीतियां नहीं हैं, वहां कोरोना वायरस से लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं जैसे कि इटली, नीदरलैंड और अमेरिका. वहीं, उन देशों में लोगों पर कोरोना वायरस का ज्यादा असर नहीं पड़ा है जहां लंबे समय से बीसीजी टीकाकरण की नीतियां चली आ रही हैं.’’
अध्ययन के अनुसार संक्रमण और मौतों की कम संख्या बीसीजी टीकाकरण को कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में एक ‘‘गेम-चेंजर’’ बना सकती है. बीसीजी टीका भारत में टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा है और यह लाखों बच्चों को उनके जन्म के समय या इसके तुरंत बाद लगाया जाता है. विश्व में सर्वाधिक टीबी रोगियों वाला देश होने के साथ भारत ने 1948 में बीसीजी टीकाकरण की शुरुआत की थी.
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भारतीय विशेषज्ञों ने कहा कि वे आशावान हैं, लेकिन इस बारे में कुछ भी कहना बहुत जल्दबाजी होगा.