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Explainer: नए किसान बिल में MSP को लेकर क्यों मचा है बवाल?

किसानों के बारे में तीन विधेयकों को लेकर बवाल मचा है. विपक्ष ही नहीं, सरकार को समर्थन देने वाली अकाली दल भी इसका विरोध कर रही है. देश भर के किसान संगठन पहले से ही विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. खासकर एमएसपी को लेकर किसानों में चिंता है.

बिल के खिलाफ सड़क पर किसान (फोटो: PTI) बिल के खिलाफ सड़क पर किसान (फोटो: PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • किसानों से जुड़े विधेयकों पर मचा है बवाल
  • खासकर फसलों की एमएसपी को लेकर चिंता
  • केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर ने इस्तीफा दे दिया है

किसानों से जुड़े तीन विधेयकों को लेकर संसद से सड़क तक बवाल मचा है. केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा तक दे दिया है. आइए जानते हैं कि क्या है मसला और खासकर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को लेकर इतना हंगामा क्यों है? 

कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) विधेयक-2020, कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020, आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 को गुरुवार को लोकसभा में पारित किया गया है. सरकार ने पांच जून 2020 को ही अध्यादेश जारी किए थे, यह तीनों विधेयक उन संबंधित अध्यादेशों की जगह लेंगे. विपक्ष ही नहीं, सरकार को समर्थन देने वाली शिरोमणि अकाली दल भी इसका विरोध कर रही है. देश भर के किसान संगठन पहले से ही विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. 
 
क्या हुआ बदलाव

कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक के द्वारा सरकार ने कृषि पैदावार को किसानों को किसी भी राज्य में बेचने और मार्केटिंग करने का अधिकार दे दिया है. पहले किसान अपने राज्य की APMC मंडियों में ही इसे बेच पाते थे. सरकार का तर्क है कि इससे किसानों को अपनी उपज का बेहतर दाम मिलेगा और कृषि उत्पादों की इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग हो पाएगी. 

बिल को पेश करने के दौरान विपक्ष के नेताओं ने कहा था कि इस बिल से किसानों को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खतरा पैदा हो जाएगा. लेकिन कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इस बात को खारिज करते हुए कहा कि एमएसपी पहले की तरह ही जारी रहेगा जबकि दूसरे स्थान पर बढ़े हुए सामान के दाम का फायदा किसान वहां अपना सामान बेचकर उठा सकेगा. तोमर ने कहा कि ये बिल किसानों के हित में है और इससे उनको ज्यादा फायदा कमाने का मौका मिलेगा.

क्या होता है एमएसपी 

किसानों को उनकी फसलों  का लागत से ज्यादा मूल्य मिलने की गारंटी हो इसके लिए सरकार देशभर में अनाज, तिलहन, दलहन आदि की प्रमुख फसलों के लिए एक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करती है. खरीदार नहीं मिलने पर सरकार अपने खरीद केंद्रों के माध्यम से MSP पर किसान से फसल खरीद लेती है. एमएसपी निर्धारित करते वक्त कृषि पैदावार की लागत, मूल्यों में परिवर्तन, मांग-आपूर्ति जैसी कई बातों का ध्यान रखा जाता है. 

किसानों को क्या नुकसान 

आलोचकों का कहना है कि एपीएमसी का एकाधिकार खत्म होने से उस न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का भी कोई मतलब नहीं रह जाएगा, जो सरकार किसानों के हितों की रक्षा के लिए तय करती है. आलोचकों का कहना है कि इस समय तो इस प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत थी, लेकिन सरकार इसे बेकार साबित कर रही है. 

क्या एमएसपी खत्म हो जाएगा  

कृषि मामलों के जानकार देवेंद्र शर्मा ने Aajtak.in से कहा, 'किसानों को अच्छा दाम मिलने का क्या मतलब है? किससे अच्छा मिलेगा? पहले से ही अच्छा मिलने की बात है न तो एमएसपी को कानूनी अधिकार क्यों नहीं बना देते? इसको सरकार अनिवार्य कर दे तब तो किसान को यह भरोसा है कि उसे अपने मनमाफिक दाम पर उपज बेचने की आजादी होगी? ' 

उन्होंने कहा कि अभी सिर्फ 6 फीसदी फसल ही एमएसपी पर बिकती है और 94 फीसदी किसान बाजार पर निर्भर हैं. तो अगर बाजार इतना ही अच्छा होता तो किसान एमएसपी पर इतना जोर क्यों देते? उन्होंने कहा , 'OECD  की स्टडी के मुताबिक भारत के किसानों को 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. अगर बाजार इतना ही अच्छा है तो किसानों को 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान क्यों हुआ?  दुनिया का कौन-सा देश है जहां बाजार ने किसानों के हित में काम किया है?  जिस अमेरिका से हमने यह मॉडल अपनाया है वहां तो किसान गहरे संकट में हैं.

क्या फर्क पड़ेगा 

देवेंद्र शर्मा ने कहा कि नए विधेयक लागू होने से कृषि मंडिया खत्म हो जाएंगी, तो इसका मतलब यह है कि किसान एमएसपी पर बेच ही नहीं पाएगा. इसलिए तो इसका विरोध हो रहा है. 

 

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