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बजट 2021 को प्रभावित करेगी कोरोना महामारी, हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने का दबाव

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ऐसी आर्थिक स्थिति पहले कभी नहीं रही है और इसे संभालने के लिए सरकार खर्च का विशेष प्रावधान कर सकती है. केयर रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस ने कहा, "सरकार को आम जनता के टीकाकरण पर खर्च के लिए बड़ा बजट देना होगा. इसके अलावा हेल्थकेयर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करने को लेकर खास फोकस रहेगा."

देश के आगामी बजट में स्वास्थ्य और इससे संबंधित बुनियादी ढांचे पर ज्यादा धन आवंटित होने की संभावना है. (सांकेतिक फोटो) देश के आगामी बजट में स्वास्थ्य और इससे संबंधित बुनियादी ढांचे पर ज्यादा धन आवंटित होने की संभावना है. (सांकेतिक फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बजट का आकार तय करने में रहेगी महामारी की भूमिका
  • अर्थशास्त्रियों माना- ऐसी आर्थिक स्थिति पहले कभी नहीं रही

महामारी के चलते भारी नुकसान उठाने के बाद देश के आगामी बजट में स्वास्थ्य और इससे संबंधित बुनियादी ढांचे पर ज्यादा धन आवंटित होने की संभावना है. भारत में कोरोना वायरस का पहला केस 30 जनवरी, 2020 को केरल में सामने आया था. लेकिन इसका जिक्र न तो पिछले आर्थिक सर्वेक्षण (2019-20) में हुआ और न ही केंद्रीय बजट 2020 में.

संभवतः उस समय इस बारे में ये अंदाजा नहीं था कि इस महामारी का प्रभाव इतना भयावह होगा. बीते साल कोरोना संकट ने वित्तीय और प्रशासनिक संसाधनों को भारी नुकसान पहुंचाया है. एक फरवरी को पेश होने जा रहे आगामी बजट 2021-22 का आकार तय करने में यह महामारी अहम भूमिका निभाएगी.

इस बजट में नौकरियों और अर्थव्यवस्था को बचाने और बजट घाटे के बढ़ते अंतर को कम करने की चुनौती है. साथ ही कोरोना टीकाकरण के मद्देनजर स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचा भी इस बजट में काफी अहम मुद्दा होगा. इन वजहों से बजट का आकार संभवतः मौजूदा 30 खरब रुपये को पार कर सकता है.

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ऐसी आर्थिक स्थिति पहले कभी नहीं रही है और इसे संभालने के लिए सरकार खर्च का विशेष प्रावधान कर सकती है. केयर रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस ने कहा, "सरकार को आम जनता के टीकाकरण पर खर्च के लिए बड़ा बजट देना होगा. इसके अलावा हेल्थकेयर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करने को लेकर खास फोकस रहेगा." संसद की एक स्थायी समिति ने कहा है कि यह समय स्वास्थ्य, उसमें भी खासकर स्वास्थ्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर ध्यान देने का है.

संसद की स्थायी समिति (रिपोर्ट संख्या 229) ने दिसंबर 2020 में अपनी रिपोर्ट में कहा, "सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के तेजी से विकास के लिए स्वास्थ्य ढांचे में ज्यादा निवेश होना चाहिए. महामारी के चलते गैर-कोरोना मरीजों के अलावा भी हजारों लोग अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं, इससे निपटने के लिए एक मजबूत और प्रभावी पब्लिक हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर जरूरी है."

लेकिन सवाल ये है कि वित्त मंत्री एक बीमार और अति-दबाव से ग्रस्त स्वास्थ्य क्षेत्र पर पैसा खर्च करेंगी भी तो कैसे, क्योंकि महामारी ने पूरी अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है.

  

सरकार ने कोरोना वायरस महामारी से पहले 2020-21 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.5 प्रतिशत यानी लगभग 8 लाख करोड़ रुपये का राजकोषीय घाटा बजट में रखा था. अप्रैल-अक्टूबर, 2020 के दौरान राजकोषीय घाटा 9.5 लाख करोड़ रुपये था, जो बजट अनुमान से 120 प्रतिशत ज्यादा था. कोरोना लॉकडाउन के दौरान आर्थिक गतिविधियों में बाधा आई और राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ा.

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सरकार का बजट गैप इस साल सकल घरेलू उत्पाद के 7 फीसदी से ज्यादा होने की संभावना है क्योंकि आर्थिक मंदी के कारण कर संग्रह भी कम हुआ है. सरकार को कर्ज लेने पर ज्यादा भरोसा करना होगा. सरकार ने पहले ही इस वर्ष अपनी उधार योजना को संशोधित करते हुए 7.8 खरब रुपये से बढ़ाकर 13.1 खरब रुपये कर दिया है.

इस तंगहाली के बावजूद कोरोना महामारी सरकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली मजबूत करने के लिए मजबूर करेगी. कोरोना संकट ने हमें ये एहसास कराया ​है कि क्यों हमें एक मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की जरूरत है, जिसे पिछले कई बजटों में हमेशा ही अनदेखा किया गया था. 

नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2019 के अनुसार, भारत में प्रति 1000 व्यक्ति पर अस्पतालों में सिर्फ 0.55 बिस्तर हैं. देश अब भी प्रति 1,000 की आबादी पर एक बिस्तर मुहैया कराने के लिए संघर्ष कर रहा है जबकि डब्ल्यूएचओ कहता है कि प्रति 1000 की आबादी पर 5 बिस्तर होने चाहिए.

 

उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्यों के सरकारी अस्पतालों में बिस्तर राष्ट्रीय औसत से भी कम हैं. इसी तरह भारत में प्रति 1,000 की आबादी पर सिर्फ 0.8 डॉक्टर हैं जबकि WHO की सिफारिश है कि इतनी आबादी पर कम से कम एक डॉक्टर होना चाहिए. चीन में प्रति 1000 आबादी पर 1.8 और श्रीलंका में 1 डॉक्टर है.

स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे की कम उपलब्धता ने आबादी को बुरी तरह प्रभावित किया है. ज्यादातर लोगों को इसका खामियाजा निजी अस्पतालों में महंगे इलाज के रूप में भुगतना पड़ता है और वे भारी भरकम कर्ज में डूब जाते हैं.आंकड़ों से पता चलता है कि भारत का आउट-ऑफ-पॉकेट (OOP) खर्च भारत के कुल स्वास्थ्य खर्च के 60 फीसदी से ज्यादा है. जबकि मेक्सिको, चीन और ब्राजील का OOP करीब 40 फीसदी है.

 भारत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पिछले 10 वर्षों से सकल घरेलू उत्पाद का करीब 1.2 से 1.6 फीसदी खर्च कर रहा है. यह खर्च चीन (3.2 प्रतिशत), अमेरिका (8.5 प्रतिशत), और जर्मनी (9.4 प्रतिशत) जैसे अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है.विश्व बैंक के एक आंकड़े से पता चलता है कि भारत स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति 69 डॉलर  (5,037 रुपये) से भी कम खर्च करता है, जबकि प्रति व्यक्ति का निजी खर्च इसका करीब तीन गुना (183 डॉलर यानी 13,359 रुपये) है.

सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का पुनरुद्धार एक दीर्घकालिक परियोजना है. हालांकि, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 और आयुष्मान भारत के तहत 'हेल्थ फॉर ऑल' की घोषणा इस दिशा में एक बड़ा कदम है.लेकिन व्यवसाय और अर्थव्यवस्था से लेकर स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन तक, अब तक जितनी पहल की गई है, मौजूदा हालात में वह सब बिखरती और पटरी से उतरती नजर आ रहा है. पिछले 70 वर्षों में आर्थिक विकास दर सबसे निचले स्तर पर गिर गई है और ये बजट सामान्य मंदी का बजट नहीं है.

 

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