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'इलाहाबाद से लंगड़ा चला लाहौर तक पहुंचा...', पढ़िए, आम पर फिदा शायरों ने क्या- क्या लिखा?

ये लो, फिर निकल गई बात इधर से उधर. क्या बताएं, आम की बात पर बने भी रहना है और दिल उछल-उछल कर कविता, शायरी, गजल-नज्म पर पहुंच जा रहा है. ये आम भी तो अजीब हैं. हर जगह तो इनकी मौजूदगी है. 3 महीने के लिए आते हैं और बस छा जाते हैं. भीतर आम-बाहर में आम.

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आम कहानीः शायरों और कवियों ने 'आम' को भी अपनी कविता और शेर का विषय बनाया है (Photo: Grok AI)
आम कहानीः शायरों और कवियों ने 'आम' को भी अपनी कविता और शेर का विषय बनाया है (Photo: Grok AI)

आम की बात शुरू हुई तो देखिए कहां-कहां तक पहुंच गई. ये तो शायर कफ़ील आज़र अमरोहवी की मशहूर नज्म की माफिक बात हो गई कि 'बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी.' कितनी दूर तक जाएगी, कहां पहुंचेगी. हमें क्या पता. हम क्यों पूछने लगे. आम खाते-खाते चल पड़ेंगे, फिर देखते हैं कहां तक जाती है बात. आम आदमी की बातें ऐसी ही होती हैं. बसंती हवा की तरह. केदारनाथ अग्रवाल लिख गए थे न,

जहां से चली मैं,
जहां को गई मैं
शहर गांव बस्ती नदी रेत निर्जन
झुलाती चली मैं, झुमाती चली मैं
हवा हूं हवा मैं, बसंती हवा हूं.

ये लो, फिर निकल गई बात इधर से उधर. क्या बताएं, आम की बात पर बने भी रहना है और दिल उछल-उछल कर कविता, शायरी, गजल-नज्म पर पहुंच जा रहा है. ये आम भी तो अजीब हैं. हर जगह तो इनकी मौजूदगी है. 3 महीने के लिए आते हैं और बस छा जाते हैं. भीतर आम-बाहर में आम. जिस दर पहुंचो उस घर आम. गालिब ने जब से ये बताया कि 'आम के आगे नेशकर क्या हैं?' तब से ये जानने में दिलचस्पी बढ़ गई थी कि गीतों-गजलों की दुनिया में आम कितने खास हैं? भाई साहब! पूछिए मत. आमों ने यहां पर भी ताज पहन रखा है. वनस्पति विज्ञान ने साहित्य को कंवल और गुलाब जैसे फूल दिए हैं तो फलों की टोकरी में आम ज्यादा रखे हैं.

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तो देर न करते हुए इस सिलसिले को शुरू करते हैं अकबर इलाहाबादी से. अकबर आम के ऐसे शौकीन थे कि पूछिए मत. उन्होंने अपने प्यारे अजीज आम के लिए तो पूरी एक नज्म ही लिख डाली थी. एक दफा इसका स्वाद लीजिए.

नामा न कोई यार का पैग़ाम भेजिए
इस फ़स्ल में जो भेजिए बस आम भेजिए
ऐसा ज़रूर हो कि उन्हें रख के खा सकूं
पुख़्ता अगरचे बीस तो दस ख़ाम भेजिए
मालूम ही है आप को बंदे का ऐडरेस
सीधे इलाहाबाद मिरे नाम भेजिए
ऐसा न हो कि आप ये लिखें जवाब में
तामील होगी पहले मगर दाम भेजिए... (
अकबर इलाहाबादी)

यहां ध्यान देने वाली बात है कि इलाहाबादी साहब किसी से आम भिजवाने के लिए कह रहे हैं. खैर, उनकी इस फरमाइश को समझा जा सकता है. पूर्वांचल और बिहार का आदमी जो दो टके की नौकरी के चक्कर में बाग-बगीचे वहीं गांव छोड़ आया है वो उसका मन 'ठेले पर आम देखकर' नहीं भर सकता है. ये बिल्कुल ऐसा ही है जैसे मशहूर लेखक रहे धर्मवीर भारती का नाम ठेले पर बर्फ देखकर नहीं भरा था और इसकी ही भरपायी के लिए उन्होंने 'ठेले पर हिमालय' नाम का जो शानदार यात्रा वृत्तांत लिखा था, क्या आज के ट्रेवल ब्लॉगर लिखते होंगे. मन हो तो गूगल करके पढ़ लीजिए मजा आ जाएगा.

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खैर, आमों का असली मजा तो बचपन में उठाया गया है. सभी ने उठाया होगा. लू भरी दोपहरी में घर से भाग जाना. पहली आंधी के तुरंत बाद अमराई में गिरे आम चुनना. फिर उन्होंने लाकर पानी में भीगने के लिए रख देना. बगीचों की रखवालों से डांट खाते, छिपते-छिपाते आम तोड़ना. अब वो दिन हवा हुए लेकिन यादें ताजा हैं. गुलजार ने इन्हीं यादों को देखिए कैसे सजाया है.

मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा-सा इक आम का पेड़ कभी?
मेरा वाकिफ़ है बहुत सालों से, मैं जानता हूं
जब मैं छोटा था तो इक आम चुराने के लिए
परली दीवार से कंधों पे चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख से मेरा पांव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर .... (गुलजार)

   

इसी तरह शाहीन इक़बाल असर ने आम के कसीदे ऐसे पढ़े, ऐसे पढ़े कि एक के बाद एक शेर कहते ही चले गए. देखिए, शेर कह-कहकर कितनी मिठास भरी नज्म पिरोई है उन्होंने.

हो रहा है ज़िक्र पैहम आम का
आ रहा है फिर से मौसम आम का

नज़्म लिख कर उस के इस्तिक़बाल में
कर रहा हूं ख़ैर-मक़्दम आम का

उन से हम रक्खें ज़ियादा रब्त क्यूं
शौक़ जो रखते हैं कम कम आम का

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तब कहीं आता है मेरे दम में दम
नाम जब लेता हूं हमदम आम का

शौक़ से पढ़ते हैं उस को ख़ास-ओ-आम
जब क़सीदा लिखते हैं हम आम का

क्या कहूं अस्मार की फ़िहरिस्त में
नाम है सब से मुक़द्दम आम का

इक फ़क़त मैं ही नहीं शैदा 'असर'
शैदा है आलम का आलम आम का

मिरा जज़्बा-ए-शौक़ काम आ रहा है
कि बाज़ार में देखूं आम आ रहा है..... (शाहीन इक़बाल असर)

इसी तरह एक शायर हुए सागर खय्यामी. आम एक ऐसा फल है जो एक होते हुए भी विविधता से भरा है. इसकी इतनी किस्में हैं कि इतने तो आदमी भी अपने चेहरों पर चेहरे नहीं रखता है. सागर खय्यामी साहब आम की इन किस्मों में से लंगड़े पर लगता है ज्यादा ही फिदा थे. एक दिन इसी के स्वाद में लिख बैठे कि

आम तेरी ये ख़ुश-नसीबी है
वर्ना लंगड़ों पे कौन मरता है

और लंगड़े आम की बात होती है तो फिर से अकबर इलाहाबादी याद आ जाते हैं कि कुछ यूं कहते हुए कि,

असर ये तेरे अन्फ़ासे मसीहाई का है अकबर,
इलाहाबाद से लंगड़ा चला लाहौर तक पहुंचा.


किस्सा-किस्सा लखनऊआ से मशहूर किस्सागो हिमांशु बाजपेयी भी सागर खय्यामी की इस बात में अक्सर हां में हां मिलाते दिख जाते हैं जो उन्होंने लंगड़े के लिए की थी. देखिए, कितनी खूबसूरती से उन्होंने क्या बयां किया है कि

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जो आम मैं है वो लब ए शीरीं मैं नहीं रस
रेशों में हैं जो शेख की दाढ़ी से मुक़द्दस
आते हैं नज़र आम, तो जाते हैं बदन कस
लंगड़े भी चले जाते हैं, खाने को बनारस. .... (सागर खय्यामी)

अब सोचता हूं कि बात आम की अलग-अलग खासियत पर पहुंच ही गई है तो पूरी ही कर देनी चाहिए. आधी-अधूरी नज्म पढ़कर मजा भी कहां आता है. पेश है सागर खय्यामी साहब की पूरी की पूरी रचना, जो उन्होंने आम का सेहरा लिखा था.


होठों पे हसीनों के जो, अमरस का मज़ा है,
ये फल किसी आशिक़ की, मोहब्बत का सिला है

आमद से दसहरी की है, मंडी में दस्हेरा,
हर आम नज़र आता है, माशूक़ का चेहरा,

एक रंग में हल्का है, तो एक रंग में गहरा,
कह डाला क़सीदे के एवज़, आम का सेहरा,

ख़ालिक़ को है मक़सूद, के मख़्लूक़ मज़ा ले,
वो चीज़ बना दी है के बुड्ढा भी चबा ले,

फल कोई ज़माने में नहीं, आम से बेहतर,
करता है सना आम की, ग़ालिब सा सुख़नवर,

इक़बाल का एक शेर, क़सीदे के बराबर,
छिलकों पा भिनक लेते हैं , साग़र से फटीचर,

वो लोग जो आमों का मज़ा, पाए हुए हैं,
बौर आने से पहले ही, बौराए हुए हैं,

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नफ़रत है जिसे आम से वो शख़्स है बीमार,
लेते है शकर आम से अक्सर लब ओ रुख़सार,

आमों की बनावट में है, मुज़मर तेरा दीदार,
बाज़ू वो दसहरी से, वो केरी से लब ए यार,

हैं जाम ओ सुबू ख़ुम कहां आंखों से मुशाबे,
आंखें तो हैं बस आम की फांकों से मुशाबे,

क्या बात है आमों की हों देसी या बिदेसी,
सुर्ख़े हों सरौली हों की तुख़्मी हों की क़लमी,

चौसे हों सफ़ैदे हों की खजरी हों की फ़जरी,
एक तरफ़ा क़यामत है मगर आम दसहरी !

फ़िरदौस में गंदुम के एवज़ आम जो खाते,
आदम कभी जन्नत से निकाले नहीं जाते !!.... (
सागर खय्यामी)
 

---- समाप्त ----
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