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जब 12 वर्षों तक भूखे भटकते रहे थे भगवान जगन्नाथ और बलराम, खिचड़ी भी नहीं हुई थी नसीब

खिचड़ी एक ऐसा व्यंजन है जो सामाजिक समरसता और एकता का प्रतीक माना जाता है. यह व्यंजन दाल और चावल के मिलन से बनता है, जो अलग-अलग अन्नों को एक साथ जोड़कर एक नई चीज बनाता है. मकर संक्रांति के अवसर पर खिचड़ी भोज का आयोजन होता है, जो समाज के सभी वर्गों को एक साथ लाता है.

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जगन्नाथ मंदिर में खिचड़ी से जुड़ी कई कथाएं हैं
जगन्नाथ मंदिर में खिचड़ी से जुड़ी कई कथाएं हैं

खिचड़ी... खाने की थाली में परोसे गए इस व्यंजन का नाम ऐसा क्यों पड़ा होगा? फूड एक्सपर्ट बताते हैं कि खिचड़ी मिलावट का नाम है. दो अन्न मिलकर कुछ तीसरा ही बन गया तो वो हो गई खिचड़ी. अब कहने को ये है तो दाल और चावल, लेकिन मिला दिया तो न दाल रही और न बचा चावल, बन गई कोई तीसरी ही चीज, जिसका नाम रखा खिचड़ी.

खिचड़ी इसीलिए सामाजिक भोजन मानी जाती है. यह समाज के हर वर्ग, जाति, संप्रदाय और अमीर-गरीब को एक साथ, एक पायदान पर ले आती है. इसलिए मकर संक्रांति के मौके पर खिचड़ी भोज का आयोजन किया जाता है. खिचड़ी ने कई बार भक्त और भगवान के बीच के अंतर को भी मिटा दिया और कई बार तो भगवान ने खुद खिचड़ी को वो हथियार बनाया जिसके जरिए वो समाज में एकता और समानता का पाठ पढ़ा सकें.

ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर में प्रसिद्ध है ये लोककथा
ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर में ऐसी ही एक कथा खूब कही-सुनी जाती है, जहां अपनी एक भक्त को समाज स्थान दिलाने के लिए भगवान अपने भाई के साथ 12 वर्षों तक भूखे-प्यासे भटकते रहे. इस दौरान मंदिर का रत्न भंडार खाली हो गया, भगवान जगन्नाथ खुद कंगाल हो गए और इतनी दीन-हीन हो गए कि खाने को उन्हें खिचड़ी भी नसीब नहीं हुई. 

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बहुत पुरानी बात है. जगन्नाथ पुरी में एक महिला रहती थी. निम्न जाति की, गरीब, लाचार लेकिन संकल्प की धनी. उसका नाम श्रिया था. महिला देवी लक्ष्मी की उपासक थी और जगन्नाथजी के भरोसे ही जीवनयापन कर रही थी. एक बार उसकी इच्छा हुई कि वह कठिन अष्टलक्ष्मी व्रत करे, पर उसे व्रत की विधि नहीं पता थी. एक दिन वह रास्ते पर झाड़ू लगा रही थी कि इस दौरान उसे एक पुजारी मिला, जिससे वह व्रत की विधि पूछना चाहती थी, लेकिन उन्होंने श्रिया को तुरंत मना कर दिया.

Khichadi

...जब श्रीमंदिर छोड़ कर चले गए भगवान
इस तरह श्रिया जहां भी व्रत विधि पूछती थी, लोग उसे दुत्कार देते थे. एक दिन भूख-प्यास की मारी श्रिया व्रत की विधि पूछने के लिए भटक रही थी और इसी बीच चक्कर खाकर गिर पड़ी उसके सिर से खून निकल आया. अपने भक्त की सच्ची श्रद्धा और दुख देखकर जगन्नाथ इतने दुखी हुए की उनकी भी प्रतिमा से खून निकल आया. मंदिर में पंडे-पुजारियों और सेवायतों ने ये देखा तो घबरा गए और पूरी पुरी में हड़कंप मच गया. ये बात राजा तक भी पहुंची तो वह समझ गया कि जरूर कहीं घोर पाप हुआ है और भगवान श्रीमंदिर छोड़कर चले गए हैं. ऐसे में राजा ने तुरंत सिंहासन त्याग दिया और उस पाप की खोज में चल पड़ा, जिसके कारण श्रीमंदिर से भगवान चले गए.

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उधर, भगवान के आदेश पर नारद मुनि ने संत का वेश बनाया और श्रिया के घर उसे व्रत विधि समझाने पहुंचे. उन्होंने कहा कि भक्ति सच्ची हो तो किसी कठिन व्रत की जरूरत नहीं होती. तुम सच्चे मन से भजन करो. आस-पास को साफ रखो, घर को लीप-बुहार कर सुंदर बना लो, सबसे प्रेम से बोलो. जो ऐसा करता है देवी लक्ष्मी उस पर प्रसन्न रहती हैं. फिर तो तुम केवल दिन भर व्रत रखकर, शाम को खीर बनाकर उन्हें भोग लगाओ, आरती करो और प्रसाद बांटो. देवी तुम्हारे घर चलकर आएंगी.

श्रिया पर प्रसन्न हुईं माता लक्ष्मी
श्रिया ने ऐसा ही किया. शाम को वह जब आरती कर रही थी तो एक महिला घूंघट में उसके पास पहुंची. लोगों की भीड़ के बीच उसने श्रिया को प्रसाद चढ़ाने के लिए एक पोटली दी. श्रिया ने उस महिला को खीर का प्रसाद दिया. खीर खाने के दौरान महिला के चेहरे से घूंघट हट गया और जब श्रिया की नजरें उस पर पड़ीं तो वह सुध-बुध खो बैठी. श्रिया को जब सुधि आई तब तक सभी लोग जा चुके थे. उसने महिला द्वारा दी गई पोटली खोलकर देखी तो उसमें रत्न, हीरे, सोना-चांदी निकले. श्रिया समझ गई कि मां लक्ष्मी ने उस पर कृपा कर दी है.

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श्रिया का व्रत पूरा हुआ, लेकिन भगवान जगन्नाथ को तो अभी ये खेल कुछ और लंबा खेलना था. उन्हें संसार को एक सबक और सिखाना था और उसकी शुरुआत उन्हें अपने ही घर से करनी थी. 

उधर, जब देवी लक्ष्मी श्रिया के घर से लौटीं और श्रीमंदिर में प्रवेश करने लगीं तो बलभद्र नाराज हो गए. उन्होंने कहा कि लक्ष्मी ने एक छोटी जाति वाली के घर जाकर श्रीमंदिर का अपमान किया है. उसने वहां का प्रसाद भी खाया और अब वह प्रसाद हमें खिलाकर हमें भी भ्रष्ट करना चाहती है. बलभद्र ने जगन्नाथ जी को आदेश दिया कि लक्ष्मी से रत्न भंडार की चाबी ले लें और उन्हें श्रीमंदिर से निकाल दिया जाए.

श्रीमंदिर को कंगाल करके छोड़ गईं देवी लक्ष्मी
उधर, जब देवी लक्ष्मी ने यह सब सुना तो वह नाराज हो गईं और कहा कि ठीक है, अब मैं यहां नहीं रहूंगी, लेकिन आप दोनों को श्राप देती हूं कि जब तक आप किसी निम्न के हाथ से भोजन नहीं कर लेते आपका भी भरण-पोषण नहीं होगा. लक्ष्मी के जाते ही श्रीमंदिर श्रीहीन हो गया. रत्न भंडार खाली हो गया.

महल की चौखटों-दरवाजों और पलंग में दीमक लग गई. अनाज सड़ गया. कपड़े फट गए और यहां तक की मंदिर व्यवस्था ही चौपट हो गई. अब जगन्नाथ और बलभद्र खाने को तरसे. जब बलभद्र को भूख सताने लगी तो उन्होंने वेश बदलकर भिक्षाटन का सोचा.

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अब दोनों भाई, जहां भी भीख मांगने जाते तो वहां कुछ अनिष्ट हो जाता. बना हुआ भोजन खराब हो जाता. दाल में पानी गिर जाता. भात जल जाता. कहीं पर जाते तो चूल्हा ही नहीं जल पाता और कहीं-कहीं तो कोई द्वार ही नहीं खोलता था. इस तरह भूखे-प्यासे भटकते हुए दोनों भाइयों ने 12 वर्ष गुजार दिया, लेकिन न उन्हें जल मिला और न अन्न. इसी तरह भटकते-भटकते वह एक दिन समुद्र तट पर पहुंचे. 

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उन्हें वहां एक भवन में वैदिक मंत्र सुनाई दिए. बलभद्र ने एक सेविका से पूछा कि, क्या यहां कोई यज्ञ हुआ है. क्या अब प्रसाद-भोजन भी मिलेगा. भिक्षा भी अच्छी मिलेगी ना? बलभद्र के इतने सवाल सुनकर सेविका ने कहा कि, आज हमारी स्वामिनी की 12 वर्षों से चली आ रही तपस्या के पूरे होने के दिन हैं. इसके बाद वह जरूर आपको भंडारा खिलाएंगी, लेकिन हमारी स्वामिनी तो नीच कुल की हैं, क्या अब भी आप भोजन करेंगे?

...और भगवान को खिचड़ी भी नहीं हुई नसीब
इस पर बलभद्र ने कहा कि नहीं हम अछूतों का नहीं खाते हैं. अच्छा सुनो, अपनी मालकिन से कह दो कि हमें सामग्री मंगवा दें हम खुद बना लेंगे. स्वामिनी जो कि खुद लक्ष्मी ही थीं, उन्होंने सामग्री तो भेज दी, लेकिन अग्नि देव को आदेश दिया कि वह चूल्हा न जलने दें, सिर्फ धुआं ही करते रहें. अब बलभद्र जो कि सोच के बैठे थे कि आग जलाएंगे, खिचड़ी बनाएंगे और गरम-गरम खाएंगे, वह चूल्हा न जल पाने से इतना झल्लाए कि चूल्हा-मटकी, सभी कुछ फोड़ दिया और जगन्नाथजी से कहा कि, 'जगन, भोजन में क्या छोटा, क्या बड़ा. मैं तो कहता हूं कि भोजन कर लेते हैं. ऐसे तो मैं भूखा मारा जाऊंगा.' 

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इसके बाद जगन्नाथ और बलभद्र लक्ष्मी के घर पहुंचे और वहां उन्होंने खिचड़ी खाते हुए पहचान लिया कि यह लक्ष्मी ही हैं. वह लक्ष्मी को सम्मान सहित श्रीमंदिर ले आए और इस तरह पुरी से भेदभाव भी मिटा दिया. लक्ष्मी के आने श्रीमंदिर का वैभव लौट आया और रत्न भंडार फिर से भर गए. इस तरह खिचड़ी समाज में भेदभाव मिटाने वाले, छोटे-बड़े को एक साथ ले आने वाली और समरसता का प्रतीक भोजन बन गई. आज भी श्रीमंदिर के महाप्रसाद में खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और लोग उस प्रसाद को पाकर धन्य हो जाते हैं.
 

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