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कला, परंपरा और आध्यात्म का संगम... 49 वर्षों से श्रीकृष्ण की गाथा गा रहा है श्रीराम भारतीय कला केंद्र

श्रीराम भारतीय कला केंद्र मयूरभंज छऊ और कलारीपयट्टू जैसे पारंपरिक भारतीय नृत्य शैलियों का उपयोग करते हुए भगवान कृष्ण के रंगीन जीवन को उनके जन्म से लेकर महाभारत में उनकी भागीदारी तक दर्शाता है. प्रदर्शन को और अधिक यथार्थवादी अनुभव देने के लिए एलईडी वॉल का उपयोग केंद्र के नवाचार और सुधार की क्षमता को प्रत्येक वर्ष बेहतर बनाने के लक्ष्य को दोहराता है.

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श्रीराम भारतीय कला केंद्र में नृत्यनाटिका श्रीकृष्णा की प्रस्तुति, बालकृष्ण की भूमिका में काव्या नायर
श्रीराम भारतीय कला केंद्र में नृत्यनाटिका श्रीकृष्णा की प्रस्तुति, बालकृष्ण की भूमिका में काव्या नायर

भारतीय जनमानस में जिन दो पौराणिक चरित्रों के जरिए रीति, नीति और मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाता है, और जिनकी कथाएं व्यापक हैं वो दोनों चरित्र श्रीराम और श्रीकृष्ण नाम से प्रसिद्ध हैं. इसलिए इन दोनों से जुड़े ही तमाम पर्व-उत्सव और त्योहार भी हैं. कला के विभिन्न आयाम भी इनसे ही जुड़े हैं. जन्माष्टमी के उत्सव के बीच श्रीराम भारतीय कला केंद्र, महाविष्णु के इसी पूर्णावतार की गाथा को नृत्य नाटिका के तौर पर प्रस्तुत कर रहा है. केंद्र की यह प्रस्तुति महज एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि विरासत बन चुकी है और इस वर्ष यह उनकी 49वीं प्रस्तुति है.

क्या है प्रस्तुति की खासियत
श्रीराम भारतीय कला केंद्र इस साल अपनी प्रतिष्ठित नृत्य नाटिका 'कृष्ण' का 49वां संस्करण प्रस्तुत कर रहा है. यह प्रस्तुति कमानी ऑडिटोरियम, मंडी हाउस, नई दिल्ली में जारी है. हर दिन शाम 6:30 बजे से प्रस्तुति शुरू होगी. 14, 15 और 16 अगस्त को दोपहर 3 बजे विशेष मैटिनी शो भी हो रहे हैं. ‘कृष्ण’ एक ऐसा नृत्य नाटक है जो भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर महाभारत में अर्जुन को दिए गए गीता उपदेश तक की झलकियों को सुंदरता से मंच पर उतारता है.

नृत्य नाटिका में उनकी मनमोहक बाल्यावस्था के आनंदमय वर्ष, किशोरवय की उनकी शरारतें, प्रकृति के साथ उनका प्रेम, सभी जीवों के प्रति उनकी करुणा, और अंततः भक्ति का स्तर प्राप्त करना - कृष्ण और उनकी आभा आपको अपने में समाहित कर लेगी, जैसे ही आप उनके व्यक्तित्व में खो जाएंगे. भारतीय पौराणिक कथाओं के अन्य अध्यायों की तरह, भगवान कृष्ण का अध्याय भी विभिन्न कहानियों, मिथकों और जादू से बुना गया है, लेकिन इसे हमेशा व्यावहारिक और दैनिक जीवन के कई पहलुओं में ज्ञान प्रदान करने वाला माना गया है.

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Janmashtami
कृष्ण की भूमिका में टुल्लू मुर्मू और राधा की भूमिका में ऋतुपर्णा दास होता

पारंपरिक नृत्य कला से सजी है प्रस्तुति
श्रीराम भारतीय कला केंद्र मयूरभंज छऊ और कलारीपयट्टू जैसे पारंपरिक भारतीय नृत्य शैलियों का उपयोग करते हुए भगवान कृष्ण के रंगीन जीवन को उनके जन्म से लेकर महाभारत में उनकी भागीदारी तक दर्शाता है. प्रदर्शन को और अधिक यथार्थवादी अनुभव देने के लिए एलईडी वॉल का उपयोग केंद्र के नवाचार और सुधार की क्षमता को प्रत्येक वर्ष बेहतर बनाने के लक्ष्य को दोहराता है.

इस पूरी नृत्यनाटिका की कोरियोग्राफी करने वाले शशिधरण नायर बताते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र के जीवन की संपूर्ण झलक का अंश भर ही इस नृत्य नाटिका में शामिल है. वह खुद अव्यक्त हैं, लेकिन उन्हें व्यक्त करने की कोशिश युगों से जारी है. श्रीराम भारतीय कला केंद्र में वह बीते लगभग 3 दशकों से इस नाटिका की कोरियोग्राफी कर रहे हैं. इस प्रसिद्ध नृत्य नाटिका में समय के साथ कई बड़े बदलाव भी आए हैं. 

तकनीक बदल गई है, समय के साथ हम भी डिजिटल हुए हैं. पहले यह नाटिका लाइव म्यूजिक के साथ प्रस्तुत होती थी. फिर इसे रिकॉर्ड कराया गया. संगीतकार बरुण गुप्ता ने इसका संगीत दिया और बहुत सारे भाव संगीत के धुनों से ही मंच पर समझाए जाते हैं. 

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49 साल में कितनी बदल गई है प्रस्तुति
जैसे- श्रीकृष्ण और राधा के मिलन का जीवंत दर्शन जो महारास के रूप में दिखाया जाता है, उसमें पक्षियों की चहक के साथ हवा की मधुर लय और नदी की शांत बहती लहर सी आवाज भी शामिल है. यह सब मिलकर एक आनंदमयी आभास लाते हैं. कथकली, मयूरभंज छऊ और लोक जात्रा के साथ यह नाटिका संपूर्ण होती है. खुशी होती है, इतने सालों से इसके प्यारे दर्शक साथ बने हुए हैं और दर्शकों से भरा सभागार ही हमें इस परंपरा को लगातार जारी रखने के लिए प्रेरित करता है. 

बाल कृ्ष्ण की भूमिका में काव्या नायर ने 
इस पूरी नृत्यनाटिका में हृदय चुराने का काम कर जाते हैं, नन्हें से बालकृष्ण. इस भूमिका को निभा रही हैं काव्या नायर... नृत्य के भावों में उनकी छवि इतनी मनोरम और आनंददायी है कि मंच पर उतरते ही वह सीधे दिल में उतर जाती है. एक वृद्धा दर्शक ने काव्या को पुचकार कहा- बेटा! आप तो सचमुच कान्हा लग रही थीं. नृत्य नाटिका के बाद दर्शकों में बाल कृष्ण काव्या से मिलने की होड़ सी रही. काव्या सिर्फ 9 या 10 साल की हैं और नृत्य की विधा में बड़ी खूबसूरती से भाव लाते हुए अपना किरदार निभाती हैं.

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मंच पर कितना मुश्किल होता कथाओं का दृश्यांकन?
युवा कृष्ण की भूमिका में टुल्लू मुर्मू भी छाप छोड़ते नजर आते हैं. कंस वध तक टुल्लू मुर्मू ही कृ्ष्ण की भूमिका में रहते हैं और फिर परमअवतार कृष्ण की भूमिका में नजर आते हैं राज कुमार शर्मा. राज कुमार शर्मा सिर्फ मुख्य भूमिका में ही नहीं हैं, बल्कि उन्होंने कोरियोग्राफी में सहायक भूमिका निभाई है. वह श्रीराम भारतीय कला केंद्र के रेर्पटरी प्रभारी भी हैं. एक ही मंच पर सिर्फ लाइटिंग और साउंड के जरिए कभी सुख, कभी शोक, कभी आनंद तो कभी युद्ध का विधान रच देना भी उनकी ही सोच की देन है.

वह कहते हैं कि खास बात यह है कि दर्शक हमारी सोच को आसानी से समझ लेते हैं और जान पाते हैं कि वह क्या दिखा रहे हैं. जैसे एक दृश्य है, जिसमें कृष्ण के सुझाव पर सारी मथुरा, द्वारिका शिफ्ट हो रही है. माइग्रेशन (पलायन) का यह दृश्य रचना थोड़ा मुश्किल सा लगता है. मंच पर इसे कैसे दिखाया जाए. 

Krishna
परमावतार कृष्ण की भूमिका में राजकुमार शर्मा

अगर यह नृत्य नहीं होता तो इसे बैलगाड़ी आदि पर सामान ले जाते दिखाया जा सकता था, लेकिन पुराणों में है कि सारी मथुरा रातो रात शिफ्ट हो गई और नागरिकों में किसी को पता भी नहीं चला. इस बात को नृत्य में दिखाने के लिए हमने पैरों की थाप का प्रयोग किया. नृत्य करते हुए हम मंच पर एक तरफ से थाप देते हुए आगे बढ़े, मंच के आगे वाले हिस्से तक गए और फिर दूसरी ओर से बाहर निकल गए. फिर दूसरा गुट दूसरी तरफ से यही करते हुए आया. इस तरह हमने तीन-चार बार इस प्रक्रिया को दोहराया और इससे हमने पलायन के सीन को नृत्य के जरिए मंच पर उभार दिया. 

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विरासत बन चुकी है कृष्ण नाटिका की प्रस्तुति
नाटिका में अन्य कलाकारों ने भी अहम भूमिका निभाई. ऋतुपर्णा दास होता ने राधा की भूमिका निभाई. अनुशुया चौधरी द्रौपदी बनीं. नेहा शुक्ला ने पहले पूतना फिर बाद में गांधारी के रूप को जीवंत किया. रुक्मणि बनीं प्रेरणा बस्सी झा और सुनीता रानी यशोदा के किरदार में दिखीं. विशाल निर्माण बने कंस और भीष्म, लोकेश बने द्रोणाचार्य, भीम बने कनिष्क, शिशुपाल-लक्ष्मण सिंह नेगी, दुर्योधन- स्वप्न मजुमदार और हिमांशु ने सुदामा की भूमिका निभाई.

नृत्यनाटिका की निर्देशिका और श्रीराम भारतीय कला केंद्र की अध्यक्ष पद्मश्री शोभा दीपक सिंह, कहती हैं, " यह हमारे लिए गर्व की बात है कि 'कृष्ण' अपने 49वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. श्रीकृष्ण का जीवन केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है. जिसमें प्रेम, साहस और बुद्धि का गहरा संदेश छिपा है. हम इसे पूरी कलात्मकता और भावनात्मकता के साथ दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं. "

यह प्रस्तुति केंद्र डांस रेपर्टरी द्वारा की जा रही है, जो श्रीराम भारतीय कला केंद्र की पेशेवर नृत्य मंडली है. इसकी कोरियोग्राफ्री शशिधरन नायर द्वारा की गई है, जिन्हें सहयोग मिला है उनके प्रमुख शिष्य और रेर्पटरी इंचार्ज राजकुमार शर्मा का. इस वर्ष कुछ नए युवा कलाकारों को भी टीम में शामिल किया गया है, जिससे प्रस्तुति और भी ऊर्जा से भर गई है. ‘कृष्ण’ नृत्य-नाटिका में शास्त्रीय और लोक नृत्य शैलियों का सुंदर संगम है. पारंपरिक परिधान, आभूषण, संगीत और प्रतीकात्मक दृश्य इसे एक संपूर्ण सांस्कृतिक अनुभव बनाते हैं. पिछले 49 वर्षों से ‘कृष्ण’ नाटक हर उम्र के दर्शकों को प्रेम, करुणा, धर्म और सत्य का संदेश देता आया है. यह प्रस्तुति कला और अध्यात्म का अनूठा संगम है.
 

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