नृत्य से निर्वाण तक... कथक की लय में मीरा का पुनर्जन्म, 'मिहिरा' में दिखी भक्ति, विद्रोह और समर्पण की गाथा
तबले की थाप और घुंघरुओं की झंकार जब एक ही लय में एकाकार हो जाती है, तो नृत्य केवल दृश्य नहीं रह जाता वह स्मृति बन जाता है. स्मृति उस समय की, उस स्त्री की और उस भक्ति की, जिसने प्रेम को विद्रोह और समर्पण को साधना बना दिया. कथक की परंपरा में सजी एक ऐसी ही संध्या में मीरा की गाथा ने मंच पर आकार लिया.