PoK में नरसंहार! मुनीर की सेना के खिलाफ प्रोटेस्ट जारी, JAAC के नेताओं के खिलाफ बड़ा क्रैकडाउन

पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर के रावलकोट में रविवार रात हुई हिंसा के बाद क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है. JAAC के बंद और चक्का जाम के ऐलान के बावजूद प्रशासन ने बड़े प्रदर्शन को रोक दिया.

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PoK में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ प्रदर्श जारी है PoK में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ प्रदर्श जारी है

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 10 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:04 AM IST

पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoK) के रावलकोट में रविवार रात हुई भीषण हिंसा के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव का माहौल बना हुआ है. इस हिंसा में अब तक कई लोग मारे जा चुके हैं. रविवार को सात आम नागरिकों की मौत के बाद मंगलवार को जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने बंद और चक्का जाम का ऐलान किया था. बता दें कि JAAC को पाकिस्तान ने बैन किया है. प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों ने साफ कहा था कि किसी भी कीमत पर प्रदर्शनकारियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक मार्च निकालने या बड़े स्तर पर जुटान की अनुमति नहीं दी जाएगी.

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JAAC ने पहले घोषणा की थी कि उसका "लॉन्ग मार्च" दक्षिणी जिले भीमबर से शुरू होगा और मीरपुर, कोटली तथा पुंछ से होते हुए 10 जून को मुजफ्फराबाद पहुंचेगा. वहां विधानसभा भवन के बाहर धरना देने की योजना बनाई गई थी. लेकिन प्रशासन ने इस लॉन्ग मार्च को विफल करने की पूरी कोशिश की. सरकारी अधिकारियों के अनुसार, JAAC के खिलाफ अभियान चलाते हुए पूरे क्षेत्र से 200 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया. कई अन्य वर्कर्स और लोकल लीडर अंडरग्राउंड हो गए हैं. 


रावलकोट में हुई हिंसा के बाद आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, संघर्ष में कम से कम 11 लोगों की मौत हुई है, जिनमें चार पुलिसकर्मी और सात नागरिक शामिल हैं, जबकि 70 से अधिक लोग घायल हुए हैं, हालांकि, कई पाकिस्तानी पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्थानीय संगठनों का दावा है कि वास्तविक मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक है और यह आंकड़ा दो दर्जन से ऊपर पहुंच सकता है. इन दावों की पुष्टि नहीं हो सकी है.

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स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर प्रशासन को पूरे क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ानी पड़ी. मंगलवार को प्रतिबंधित घोषित किए जा चुके जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के प्रस्तावित 300 किलोमीटर लंबे मार्च को रोकने के लिए बड़े एक्शन लिए गए. यह मार्च भीमबर से शुरू होकर मीरपुर, कोटली और पुंछ होते हुए मुजफ्फराबाद पहुंचने वाला था, जहां प्रदर्शनकारियों ने विधानसभा के बाहर धरना देने की योजना बनाई थी.

हालांकि प्रशासन की सख्ती के कारण यह मार्च पूरी तरह आकार नहीं ले सका, लेकिन इसके बावजूद मुजफ्फराबाद, रावलकोट, दादयाल, सुधनोती, मीरपुर, भीमबर और गिलगित-बाल्टिस्तान के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए. कई बाजार बंद रहे और पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर भी इसका असर पड़ा. 

27 मौतों के दावे से बढ़ा विवाद

India Today TV की रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और विरोध प्रदर्शनों के दौरान 27 लोगों की मौत और 200 से अधिक लोगों के घायल होने का दावा किया गया है. सोशल मीडिया पर आ रहे वीडियो और स्थानीय कार्यकर्ताओं के पोस्ट में भी अधिक संख्या में हताहतों की बात कही जा रही है, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है.

इस बीच भारत ने भी घटनाक्रम पर रिएक्शन दिया है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पुलिस की बर्बरता और नागरिकों की मौत की खबरें चिंताजनक हैं. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान को उसके कृत्यों और मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए जवाबदेह ठहराना चाहिए.

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आखिर शुरू कैसे हुआ विवाद?

हिंसा की शुरुआत उस समय हुई जब JAAC से जुड़े एक कार्यकर्ता की सुरक्षा बलों के साथ हुई झड़प में मौत हो गई. इसके बाद बड़ी संख्या में समर्थक रावलकोट के अस्पताल के बाहर जमा हो गए, जहां मृतक का शव रखा गया था. देखते ही देखते स्थिति तनावपूर्ण हो गई और प्रदर्शनकारियों तथा सुरक्षा बलों के बीच हिंसक टकराव शुरू हो गया.

पुंछ डिवीजन के आयुक्त सरदार वहीद खान ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों ने आग्नेयास्त्रों और पेट्रोल बमों का इस्तेमाल किया. उनके अनुसार, हमले गुरिल्ला शैली में किए गए और सुरक्षा बलों को संकरी गलियों से निशाना बनाया गया. उन्होंने दावा किया कि चार पुलिसकर्मियों और एक राहगीर की मौत प्रदर्शनकारियों की गोलीबारी में हुई. दूसरी ओर JAAC नेतृत्व ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि सुरक्षा बलों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की. JAAC नेता शौकत नवाज मीर ने सोशल मीडिया पर जारी वीडियो संदेश में आरोप लगाया कि राज्य ने रावलकोट में "अपने ही लोगों के खिलाफ नरसंहार" शुरू कर दिया है.

मानवाधिकार संगठनों ने उठाए सवाल

घटनाओं के बाद पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (HRCP) ने भी चिंता जताई है. आयोग ने JAAC को आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंधित करने के फैसले पर सवाल उठाए और कहा कि राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए ऐसे कानूनों का इस्तेमाल चिंताजनक है. ब्रिटेन में रहने वाली पाकिस्तानी मूल की मानवाधिकार वकील सबीन कायानी ने भी पाकिस्तान की सेना और सत्ता प्रतिष्ठान की आलोचना की है.

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उन्होंने कहा कि रोटी, बिजली और सम्मान की मांग करने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों का जवाब गोलियों और आंसू गैस से दिया गया. उनके अनुसार रावलकोट की घटना कश्मीरियों के साथ गहरा अन्याय है. जर्मनी में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के मानवाधिकार कार्यकर्ता अलाउद्दीन ने भी सोशल मीडिया पर पाकिस्तान सरकार को निशाने पर लिया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान जिस तरह भारत पर कश्मीरियों के दमन का आरोप लगाता है, उससे कहीं अधिक गंभीर स्थिति पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्रों में दिखाई दे रही है.

लंबे समय से सुलग रहा है असंतोष

विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा संकट अचानक पैदा नहीं हुआ. पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में महंगाई, बिजली दरों, आटे की कीमतों, बेरोजगारी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक विफलताओं को लेकर असंतोष बढ़ता रहा है. JAAC इसी जन असंतोष के बीच एक प्रभावशाली आंदोलन के रूप में उभरा था. हाल के महीनों में संगठन ने विधानसभा में जम्मू-कश्मीर से आए शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को समाप्त करने की मांग भी तेज कर दी थी. यही मुद्दा सरकार और JAAC के बीच टकराव का बड़ा कारण बना. 

क्या आगे और बढ़ेगा संकट?

प्रशासन ने 200 से अधिक लोगों को हिरासत में लेने का दावा किया है और कहा है कि किसी भी कीमत पर बड़े पैमाने पर जुटान की अनुमति नहीं दी जाएगी. इसके बावजूद JAAC समर्थक आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मुजफ्फराबाद की ओर प्रस्तावित मार्च केवल टला है या पूरी तरह रुक गया है. अगर आंदोलन जारी रहता है तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में राजनीतिक संकट और गहरा सकता है.

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