बेगानी शादी में पाक दीवाना, डील ट्रंप और पेजेश्कियान के बीच हुई तो कौन सा पेपर साइन कर रहे थे शहबाज

ईरान-यूएस डील की पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान ने एक बार अपनी जमीन पर वार्ता की मेजबानी की. लेकिन इससे निकला परिणाम पूरी तरह सतही था. इसके बाद पाकिस्तान सिर्फ चिट्ठियों को ले जाने और ले आने का काम करता रहा. शर्तें तय कराने में उसकी कोई भूमिका नहीं रही.

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शहबाज शरीफ ने बतौर गारंटर और गवाह डील पर साइन किया है. (Photo: X/@PakPMO) शहबाज शरीफ ने बतौर गारंटर और गवाह डील पर साइन किया है. (Photo: X/@PakPMO)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 18 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:32 PM IST

ईरान और अमेरिका में डील हुई तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ सबसे ज्यादा उत्साहित नजर आए. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपने नाम पर इस डील की मार्केटिंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं.

प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने मध्यस्थ के तौर पर इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं. पाकिस्तान का दावा है कि इस हस्ताक्षर से ईरान और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक शांति समझौते पर औपचारिक रूप से मोहर लग गई है. 

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प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी एक बयान के मुताबिक प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मध्यस्थ के तौर पर इस्लामाबाद MoU पर हस्ताक्षर किए, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने अपने-अपने देशों की ओर से इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए. 

शहबाज शरीफ ने इस्लामाबाद में एक औपचारिक समारोह आयोजित कर “ऐतिहासिक शांति समझौते” का समर्थन करते हुए एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए. 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा है कि प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने गारंटर के तौर पर इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग पर हस्ताक्षर किए. इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के हस्ताक्षर मौजूद हैं. 

पाकिस्तान की राजनीति पर नजर रखने वाले एक्सपर्ट का कहना है कि आर्थिक संकट, आईएमएफ की किस्तों और घरेलू राजनीतिक दबाव से जूझ रहे शहबाज शरीफ किसी भी अंतरराष्ट्रीय मुद्दे में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर घरेलू स्तर पर छवि सुधारना चाहते हैं. 

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दरअसल, पाकिस्तान की चिंता केवल पड़ोसी प्रेम नहीं है. ईरान उसका पड़ोसी है, दोनों की सीमा साझी है और क्षेत्रीय राजनीति में दोनों देशों के हित कई जगह टकराते भी हैं और मिलते भी हैं. यदि अमेरिका और ईरान के बीच रिश्तों में नरमी आती है, तो मध्य पूर्व का पूरी शक्ति-समीकरण बदल सकता है. ऐसे में पाकिस्तान को डर है कि कहीं वह क्षेत्रीय समीकरणों में हाशिये पर न चला जाए.

दिलचस्प बात यह है कि जब भी ईरान-अमेरिका वार्ता आगे बढ़ती है, पाकिस्तान खुद को किसी न किसी रूप में चर्चा का हिस्सा बनाने की कोशिश करता है. कभी मध्यस्थता की पेशकश, कभी क्षेत्रीय स्थिरता की चिंता और कभी मुस्लिम दुनिया की एकजुटता का हवाला. लेकिन वास्तविकता यह है कि बातचीत की मेज पर उसकी कुर्सी लगी ही नहीं होती. 

इस डील में पाकिस्तान का एक मात्र रोल इतना रहा कि उसकी राजधानी में कुछ घंटे की वार्ता हुई, लेकिन वो भी वार्ता फेल रही. जी-7 के जिस मंच पर डील पर समझौता किया गया, वहां पाकिस्तान को न्योता भी नहीं था. पहले पाकिस्तान को ये कहा गया कि आखिरी डील को स्विटजरलैंड के जेनेवा में साइन किया जाएगा. लेकिन वर्चुअली इस डील को साइन करने के बाद अब स्विटजरलैंड का पूरा प्रोग्राम ही कैंसिल कर लिया गया है. 

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क्षेत्रीय राजनीति में प्रासंगिक बने रहने की पाकिस्तान की यह बेचैनी नई नहीं है. अफगानिस्तान से लेकर खाड़ी देशों तक, इस्लामाबाद अक्सर खुद को हर बड़े समीकरण का अनिवार्य हिस्सा साबित करने की कोशिश करता रहा है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में महत्व बयान देने से नहीं, प्रभाव पैदा करने से मिलता है.

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