समुद्री सरहद, पहाड़ों का घेरा और रेगिस्तान... इस तरह दुश्मनों से लोहा ले रहा है ईरान, जानें इनसाइड स्टोरी

ईरान की भौगोलिक स्थिति यानी पहाड़ों, रेगिस्तान और होर्मुज स्ट्रेट ने उसे दुनिया की ताकतवर ताकतों के सामने अजेय बना दिया है. ये सब कैसे मुमकिन हुआ? जानिए ईरान की रणनीति और असीम ताकत की पूरी कहानी.

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ईरान की ताकत को आंकने में ट्रंप ने गलती कर दी (फोटो-ITG) ईरान की ताकत को आंकने में ट्रंप ने गलती कर दी (फोटो-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:22 PM IST

अमेरिका और इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को ईरान के साथ जंग की शुरुआत की थी, अब उस जंग के 24 दिन हो चुके हैं. पूरी दुनिया हैरान है कि आखिर ईरान इस जंग को इतनी लंबी कैसे खींच ले गया? ना सिर्फ खींच ले गया, बल्कि इतने बड़े पैमाने पर अमेरिका और इजरायल को नुकसान कैसे पहुंचा दिया? ईरान इजरायल के उन तमाम ठिकानों पर बम बरसा रहा है, जिसके बारे में इससे पहले कोई सोच भी नहीं सकता था. 

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अमेरिका के सबसे अजूबे F-35 फाइटर जेट से लेकर F-15 तक को गिरा देने वाला ईरान ने अपनी सरहद से चार हजार किलोमीटर दूर हिंद महासागर के बीचो बीच डिएगो गार्सिया पर मौजूद अमेरिकी और ब्रिटेन के संयुक्त हवाई अड्डे पर बैलिस्टिक मिसाइल से हमले कर वैसे ही दुनिया को चौंका दिया है. ये सब ईरान कैसे कर रहा है? किस तरह वो अमेरिका और इजरायल से लोहा ले रहा है? कैसे उसके मिसाइल हर गुजरते दिन के साथ अमेरिका और इजरायल को चौंका रहे हैं? 

जंग शुरु होने के 24 घंटे बाद ही ट्रंप ने कहा था कि ईरान का सब कुछ खत्म हो चुका है. उनकी नेवी खत्म, एयरफोर्स खत्म, सारे जंगी जहाज खत्म, रडार खत्म, उनके लीडर खत्म, उनके उत्तराधिकारी खत्म, उसके बाद के भी ज्यादातर लीडर खत्म और अब ईरान में कोई लीडर बनने को भी तैयार नहीं. अब हम उनसे बात करने को तैयार हैं, लेकिन बात करने वाला कोई है ही नहीं.

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तो कायदे से ट्रंप के हिसाब से ईरान की नेवी, एयरफोर्स, एयरक्राफ्ट, रडार, लीडरशिप, सेकेंड लीडरशिप सब खत्म हो चुकी थी. अब ऐसे में जाहिर है ईरान से जंग का कोई मतलब ही नहीं था. क्योंकि ईरान जंग लड़ने लायक तो बचा ही नहीं था. पर सवाल ये है कि सब कुछ खत्म हो जाने के बावजूद ईरान जैसे जैसे जंग आगे बढ़ रही थी और ज्यादा ताकत के साथ इजरायल के अलग अलग शहरों और खाड़ी के देशों पर फिर हमले कैसे कर रहा था? 

ईरान की जिस नेवी और एयरफोर्स को डोनाल़्ड ट्रंप 7 मार्च को ही मुर्दा करार दे चुके थे, वही ट्रंप 10 दिन बाद ये कह रहे हैं कि ईरान पलटवार कर रहा है. खाड़ी के देशों पर हमले कर रहा है जिसके बारे में किसी ने सोचा नहीं था. जिस ईरान की ताकत को डोनाल़्ड ट्रंप जंग के पहले हफ्ते ही खत्म करने का दावा कर चुके थे वही ईरान मिडिल ईस्ट के देशों के साथ साथ इजरायल के रेलवे और ट्रेनों तक को निशाना बना रहा था. इजरायल के गैस फैसिलिटी पर हमले कर रहा था. 

खबर तो ये भी है कि ईरान ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के घर तक पर बम गिराए. इजरायल पर लगातार ईरानी मिसाइली हमलों को देखते हुए इजरायल में मौजूद अमेरिकी एंबेसी को अमेरिकी नागरिको के लिए ये एडवाइजरी जारी करनी पड़ी कि वो तुरंत इजरायल छोड़ दे, वो भी सड़क के रास्ते. 

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पर जिन दो चीजों ने दुनिया समेत खुद अमेरिका को चौंका दिया उनमें से एक था दुनिया का सबसे अजूबा फाइटर जेट जिसे कोई रडार तक नहीं पकड़ सकता. जिसे बनाने के लिए अमेरिका ने 30 साल मेहनत की और जिस प्रोजेक्ट पर 400 अरब डॉलर खर्च किए और जिसे दुनिया का सबसे बेशकीमती हथियार माना गया. उस फाइटर जेट F-35 को मार गिराना. ईरान ने इस एक F-35 को गिराकर दुनिया भर के देशों को बेचैन कर दिया. जिन देशों ने ये सोच कर कि F-35 जैसा फाइटर जेट दूसरा कोई है ही नहीं, अमेरिका के साथ इसे खरीदने की डील की थी अब वो देश इस सौदे पर दोबारा गौर करने लगे हैं. ईरान के सिर्फ एक मिसाइल ने F-35 को ढूंढ कर उसे कैसे मार गिराया. इस पर खुद अमेरिका स्ट़डी करने को मजबूर हो गया है.

ईरान के एक दूसरे हमले ने तो हरेक को चौंका कर रख दिया. किसी ने सोचा ही नहीं था कि ईरान अपनी सरहद से चार हजार किलोमीटर दूर डिएगो गार्सिया में मौजूद अमेरिका और ब्रिटेन के ज्वॉइंट हवाई अड्डे पर भी मिसाइल दाग सकता है. ईरान ने दो मिसाइल इस हवाई अड्डे पर दागी. हालांकि अमेरिका ने दावा किया है कि पहली मिसाइल हवा में ही खराब हो गई जबकि दूसरी मिसाइल को एक अमेरिकी युद्धपोत ने रोक दिया. लेकिन ईरान के इस हमले से ये पता चलता है कि उसकी बैलिस्टिक मिसाइल कितनी दूरी तक मार कर सकती हैं.

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जंग के पहले 23 दिनों में अमेरिकी सेना को भारी नुकसान हुआ है. एक रिपोर्ट के मुताबिक इस जंग के दौरान अमेरिका ने कम से कम 16 मिलिट्री एयरक्राफ्ट खो दिए हैं. इनमें 12 ड्रोन और 4 विमान शामिल हैं. सबसे ज्यादा नुकसान ड्रोन का हुआ. अमेरिका के सभी 12 ड्रोन जिनका नुकसान हुआ वो MQ9 रीपर आर्म्ड ड्रोन थे. ये ड्रोन ईरान और दूसरे दशों के खिलाफ अमेरिका, पश्चिमी एशिया में बार बार इस्तेमाल करता रहा है. 

रीपर ड्रोन में हेलफायर मिसाइले लगी होती हैं. ये 27 घंटे तक लगातार उड़ सकता है. दुश्मन के ठिकानों पर हमले कर सकता है. ईरान की एयर डिफेंस और मिसाइलों ने इन्हीं 12 ड्रोन को मार गिराया. अमेरिका के ऐसे एक रीपर ड्रोन की कीमत करीब 250 करोड़ रुपये है. ये ड्रोन ईरान के मिसाइल साइट्स और रेवोल्यूशनरी गार्ड के कैंप पर हमले के लिए भेजे गए थे. 

ड्रोन के अलावा F35 और F15 फाइटर जेट्स को भी नुकसान हुआ. इतना ही नहीं अमेरिका के 3 F15 फाइटर जेट्स कुवैत की एयरफोर्स ने गलती से मार गिराया. ये तीनों जेट्स ईरान के मिशन पर थे. कुवैत ने उन्हें दुश्मन समझ कर मिसाइल दाग दी. इस हमले में तीनों पायलट की भी मौत हो गई. कुल 16 विमान के नष्ट होने से अमेरिका को करीब 500 मिलियन डॉलर यानि 4 हजार करोड़ रुपये का सीधा नुकसान हुआ है. ईरान के साथ जंग में अमेरिका अब तक अपने 20 से ज्यादा सैनिक भी खो चुका है. एक्सपर्ट्स की मानें तो अगर जंग लंबी चली तो अमेरिका को और ज्यादा विमान और सैनिक खोने पड़ सकते हैं.

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अब सवाल ये है कि जिस ईरान की पूरी सैन्य ताकत जंग के पहले हफ्ते में ही बकौल ट्रंप खत्म हो चुकी थी, वो ही ईरान जंग को तीसरे हफ्ते तक कैसे खींच ले गया. क्या ट्रंप ईरानी सैन्य ताकत के खात्मे को लेकर झूठी जानकारी दे रहे थे या फिर उन्हें ईरान के बारे में गलत जानकारी दी गई. सवाल ये भी है कि क्या अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए तक को ईरानी मिसाइलों के बारे में सही जानकारी नहीं थी. तो चलिए आज आपको ईरान की असली ताकत के बारे में बताते हैं. वो ताकत जिसके आगे दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकत ईरान को जीतने में नाकाम रही.

दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है ईरान. पिछले 500 सालों से ईरान अपनी मौजूदा सरहद के साथ इसी तरह दुनिया के नक्शे पर मौजूद है. अलग अलग दौर में दुनिया की हर बड़ी ताकत ने ईरान को जीतने की कोशिश की. रोमन, अरब, मंगोल, तुर्क, रूसी, ब्रिटिश और अब अमेरिका. लेकिन कभी कोई ईरान को हरा नहीं सका. इसकी एक बड़ी वजह है, ईरान की भौगोलिक स्थिति यानि लोकेशन.

दरअसल, ईरान तीन महाद्वीपो यानि कॉन्टिनेंट एशिया, यूरोप और अफ्रीका के संगम इलाके में मौजूद है. ईरान की सरहद कुल 7 देशों से मिलती है. पूर्व में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और तुर्केमेनिस्तान. पश्चिम में ईराक, तुर्की, आर्मेनिया और अजरबैजान. इसके अलावा ईरान तीन समुद्री इलाकों से भी जुड़ा हुआ है. उत्तर में कैस्पियन सागर और दक्षिण में फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी. दक्षिण में दुनिया के सबसे अहम और खतरनाक जगह में से एक है होर्मुज स्ट्रेट. दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल और गैस इसी रास्ते से होकर गुजरता है. इसी होर्मुज के पास तीन द्वीप है. अबू मूसा, ग्रेटर टुंब और लेसर टुंब. इन पर 1971 से ही ईरान का कंट्रोल है. हालांकि संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई भी इन पर अपना दावा ठोकता है. कैस्पियन सागर में मौजूद अशूरादेह द्वीप पर भी ईरान का कंट्रोल है.

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ईरान की भौगोलिक बनावट ही उसे एक प्राकृतिक किले में बदल देती है. दक्षिण पश्चिम में जागरोस पर्वतमाला करीब 1500 किलोमीटर तक फैली हुई है. जो फारस की खाड़ी से ईराक होते हुए तुर्किए तक जाती है. ये पूरा पथरीला और बेहद दुश्वार इलाका पार करना बेद मुश्किल है. यही वो इलाका है जो सदियों से ईरान को दुश्मनों से बचाता रहा है. उत्तर में कैस्पियन सागर के पास मौजूद अलबोर्ज पर्वतमाला ईरान को एक्स्ट्रा सुरक्षा प्रदान करती है. ये पहाड़ सिर्फ ईरान का सुरक्षा कवच ही नहीं बल्कि इनके पास यूरेनियम, चांदी, सोना और जस्ता जैसे बेशकीमती खनिज भी पाए जाते हैं. ईरान के पास दुनिया का सबसे बड़ा जस्ता भंडार है. जस्ता यानि जिंक.

ईरान के पास ढाई हजार किलोमीटर से अधिक लंबी समुद्री सरहद यानि तट रेखा है. ईरान का प्रमुख बंदरगाह, बंदर अब्बास होर्मुज स्ट्रेट से सिर्फ 70 किलोमीटर की दूरी पर है. ये बेहद संकरा समुद्री रास्ता ईरान का सबसे बड़ा भू राजनीतिक हथियार है. अगर ईरान चाहे तो अपनी नौसेना के जरिए होर्मुज के इस रास्ते को पूरी तरह बंद कर सकता है. जिससे दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई ठप्प पड़ सकती है.

अब अगर कोई दुश्मन देश ईरान की समुद्री सरहद और पहाड़ों को पार भी कर ले तो उसके सामने एक और बड़ी चुनौती आती है. दो विशाल रेगिस्तान. दश्त-ए-लूत और दश्त-ए-कबीर. लूत रेगिस्तान धरती के सबसे गर्म जगहों में से एक है. जहां साल 2005 में 70 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया था. इन रेगिस्तानों को पार करना लगभग नामुमकिन है. बस इसी वजह से ईरान पर जमीनी हमला लगभग नामुमकिन है. यानि ईरान की भौगोलिक बनावट उसके पहाड़, रेगिस्तान और समुद्री सरहद हमेशा उसके लिए एक ढाल का काम करते हैं.

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ईरान की इसी भौगोलिक स्थिति चालाक प्रॉक्सी रणनीति और एडवांस ड्रोन टेक्नोलॉजी ने उसे मिडिल ईस्ट का एक ताकतवर देश बना दिया है. उसके न्यूक्लियर प्रोग्राम और बैलिस्टिक मिसाइलें पश्चिमी देशों को सीधा हमला करने से पहले सोचने पर मजबूर करती हैं. ऊपर से रूस और चीन का सपोर्ट ईरान को और भी मजबूत बना देता है. हालांकि पिछले 23 दिनों की जंग में रूस या चीन खुलकर ईरान को मदद नहीं कर पाए हैं लेकिन इसके बावजूद अकेला ईरान पिछले 23 दिनों से अमेरिका और इजरायल दोनों से लोहा ले रहा है. यहां तक की ईरान के विदेश मंत्री खुलेआम ये कह रहे हैं कि ईरान अमेरिका से ना बातचीत के मूड में है और ना सीजफायर करने के. जब तक भी लड़ाई चले ईरान लड़ने को तैयार है.

चौतरफा दबाव, खुद अमेरिकी जनता की नाराजगी और ईरान का यूं डटे रहना ही शायद ये वजह थी कि 23 मार्च की सुबह डोनाल़्ड ट्रंप सोशल मीडिया पर एक बयान के जरिए ये एलान करते हैं कि अगले 5 दिनों के लिए अमेरिका ईरान के साथ सीजफायर कर रहा है. ट्रंप का दावा था कि बीते दो दिनों से ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत चल रही थी और इसी बातचीत के बाद ये तय हुआ कि अमेरिका और ईरान एक दूसरे के तेल, गैस, बिजली के ठिकानों पर कोई हमला नहीं करेंगे. लेकिन हैरानी की बात ये है कि ठीक 10 मिनट के बाद डोनाल़्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया से ये बयान हटा भी दिया. हालांकि फिर कुछ देर बाद उन्होंने ये पोस्ट वापस भी डाल दिया. ट्रंप की टीम की तरफ से कहा गया है कि पहले पोस्ट में कुछ शब्दों की गलतियां थी इसलिए हटाया गया था.

हालाकिं, इधर जैसे ही ट्रंप का पोस्ट सामने आया तो उस पर ईरानी सरकार ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी. ईरानी सरकार ने कहा कि हमारी ट्रंप से कोई बातचीत नहीं हुई. ईरान की सरकारी मीडिया फारस न्यूज एजेंसी ने जानकारी दी कि दोनों पक्षों में कोई बातचीत नहीं हुई. ईरान ने यहां तक कह दिया कि हमने किसी मध्यस्थ के जरिए भी अमेरिका से कोई बात नहीं की है. ईरान का कहना है कि ये फैसला ईरान की कड़ी चेतावनी के बाद लिया है और इसीलिए वह पीछे हट गए हैं.

(आजतक ब्यूरो)

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