अमेरिका पर निर्भरता कम कर रहा कनाडा! अल्बर्टा से ओंटारियो तक तेल पाइपलाइन बनाने की तैयारी

यह परियोजना जहां अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करने की कोशिश है, वहीं अल्बर्टा की लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक और आर्थिक नाराजगी को शांत करने का प्रयास भी मानी जा रही है.

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अल्बर्टा से ओंटारियो तक 3,300 किमी लंबी तेल पाइपलाइन अल्बर्टा से ओंटारियो तक 3,300 किमी लंबी तेल पाइपलाइन

हुमरा असद

  • टोरंटो,
  • 07 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 10:32 AM IST

अमेरिका के साथ लगातार बढ़ते व्यापारिक तनाव और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंताओं के बीच कनाडा अपनी रणनीति बदलता नजर आ रहा है. दशकों से अमेरिकी बाजार पर काफी हद तक निर्भर रहे कनाडा ने अब देश के भीतर ही तेल आपूर्ति नेटवर्क मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. इसी कड़ी में अल्बर्टा और ओंटारियो की सरकारों ने करीब 3,300 किलोमीटर लंबी नई क्रूड ऑयल पाइपलाइन बनाने का प्रस्ताव दिया है. यह परियोजना सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि बदलती कनाडाई आर्थिक और राजनीतिक सोच का संकेत भी मानी जा रही है.

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कनाडा दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में शामिल है, लेकिन विडंबना यह है कि उसके पश्चिमी प्रांत अल्बर्टा में निकाला गया अधिकांश कच्चा तेल सालों से अमेरिका भेजा जाता रहा है. वहीं, पूर्वी कनाडा के कई हिस्से अपनी जरूरतों के लिए विदेशी या आयातित तेल पर निर्भर रहे हैं। अब सरकार इस व्यवस्था को बदलना चाहती है.

इसी उद्देश्य से अल्बर्टा और ओंटारियो ने Northern Shield Energy Corridor परियोजना का प्रस्ताव रखा है. इसके तहत अल्बर्टा के हार्डिस्टी से ओंटारियो के सार्निया तक लगभग 3,300 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई जाएगी. शुरुआत में इसके जरिए प्रतिदिन करीब पांच लाख बैरल कच्चा तेल भेजा जाएगा, जिसे बाद में बढ़ाकर आठ लाख बैरल प्रतिदिन तक किया जा सकता है.

क्यों बदल रही है कनाडा की रणनीति?

कनाडा की इस नई सोच के पीछे सबसे बड़ा कारण हाल के महीनों में अमेरिका के साथ बढ़ा व्यापारिक तनाव माना जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कनाडाई स्टील, एल्युमिनियम और अन्य उत्पादों पर नए टैरिफ लगाने के फैसलों ने दोनों देशों के रिश्तों में तनाव पैदा किया.

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जवाब में कनाडा ने भी अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाए और बार-बार यह संकेत दिया कि उसे केवल अमेरिकी बाजार पर निर्भर रहने की बजाय अपने घरेलू उद्योग और नए व्यापारिक साझेदारों पर ज्यादा ध्यान देना होगा. यही वजह है कि कनाडा अब ऐसी परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रहा है, जिनसे ऊर्जा, सप्लाई चेन और अर्थव्यवस्था देश के भीतर अधिक मजबूत हो सके.

अल्बर्टा क्यों है सबसे अहम?

अल्बर्टा कनाडा के तेल उद्योग का केंद्र है. देश के सबसे बड़े ऑयल सैंड्स और कच्चे तेल के भंडार इसी प्रांत में हैं. लेकिन सालों से अल्बर्टा के नेताओं और वहां की जनता का एक वर्ग यह शिकायत करता रहा है कि संघीय सरकार की पर्यावरण नीतियां और पाइपलाइन परियोजनाओं में देरी के कारण प्रांत की अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ है.

इसी नाराजगी ने समय-समय पर 'Alberta Separation' या 'Wexit' जैसे आंदोलनों को भी जन्म दिया. इन आंदोलनों से जुड़े कुछ समूहों का कहना है कि अगर अल्बर्टा को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक नियंत्रण और उचित आर्थिक लाभ नहीं मिलता, तो उसे कनाडा से अलग होने के विकल्प पर विचार करना चाहिए.

हालांकि, यह मांग अभी मुख्यधारा की नीति नहीं है और अधिकांश अल्बर्टावासी अलग देश बनने के पक्ष में नहीं हैं. फिर भी हाल के सालों में इस मुद्दे ने राजनीतिक बहस को जरूर तेज किया है. प्रीमियर डेनियल स्मिथ ने प्रांत को अधिक स्वायत्तता देने और संघीय सरकार के साथ संबंधों की समीक्षा की बात कई बार उठाई है, लेकिन उन्होंने कनाडा से अलग होने का समर्थन नहीं किया है. हालांकि, उनकी सरकार ने कुछ परिस्थितियों में भविष्य में जनमत संग्रह (रेफरेंडम) का रास्ता आसान करने वाले कानूनों का समर्थन किया है.

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पाइपलाइन से क्या बदलेगा?

अगर यह परियोजना पूरी होती है तो पश्चिमी कनाडा का तेल सीधे ओंटारियो की रिफाइनरियों तक पहुंचेगा. इससे विदेशी आयात कम हो सकता है और अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता भी घट सकती है. सरकार का दावा है कि इससे हजारों रोजगार पैदा होंगे, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और भविष्य में इस पाइपलाइन को क्यूबेक तथा अटलांटिक प्रांतों तक भी बढ़ाया जा सकता है.

लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं

यह परियोजना फिलहाल शुरुआती चरण में है. इसकी फीजिबिलिटी स्टडी शुरू की जा रही है. इसके बाद संघीय सरकार की मंजूरी, पर्यावरणीय मूल्यांकन, स्वदेशी समुदायों से परामर्श और अरबों डॉलर के निजी निवेश की जरूरत होगी.

पर्यावरण संगठन पहले ही इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि नई तेल पाइपलाइन कनाडा के जलवायु लक्ष्यों के विपरीत होगी, जबकि कई विशेषज्ञों का सवाल है कि इतनी महंगी परियोजना में निवेश करने के लिए निजी कंपनियां आगे आएंगी या नहीं.

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