Ground Report: पहले दोस्ती, फिर ऑनलाइन जाल! आगरा की गलियों में फैला धर्मांतरण नेटवर्क

आगरा में फैले कन्वर्जन नेटवर्क को लेकर जांच एजेंसियों ने कई अहम खुलासे किए हैं. यह सिर्फ जमीन पर सक्रिय नेटवर्क नहीं था, बल्कि मोबाइल स्क्रीन के जरिए लोगों के दिमाग तक पहुंच बनाने वाला एक पूरा डिजिटल सिस्टम माना जा रहा है.

Advertisement
जानकारी के मुताबिक, ऑनलाइन ग्रुप्स के जरिए युवाओं को जोड़ा जाता था. (Photo: ITG) जानकारी के मुताबिक, ऑनलाइन ग्रुप्स के जरिए युवाओं को जोड़ा जाता था. (Photo: ITG)

आशीष श्रीवास्तव

  • आगरा,
  • 15 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:21 PM IST

आगरा पहुंचते ही मुझे सबसे पहले जो चीज महसूस हुई, वो थी एक अजीब-सी खामोशी. लेकिन उस खामोशी के भीतर कई सवाल दबे हुए थे. जिन गलियों से मैं गुजरा, जिन चेहरों से मिला, और जिन दस्तावेजों को देखा, हर तरफ एक ऐसा नेटवर्क दिखाई दे रहा था, जो सिर्फ नामों और जगहों तक सीमित नहीं था, बल्कि लोगों की सोच, भरोसे और रिश्तों तक पहुंच चुका था.

Advertisement

जांच एजेंसियों के दावों के मुताबिक, यह पूरा नेटवर्क बेहद सुनियोजित तरीके से काम कर रहा था. प्रोफेसरों, आर्मी अधिकारियों और बड़े बिजनेसमैन परिवारों की बेटियों को कथित तौर पर खास तौर पर टारगेट किया जाता था. जब मैं उन परिवारों तक पहुंचा, तो वहां डर, गुस्सा और बेबसी एक साथ दिखाई दी.

कुछ बच्चों और युवाओं के पास से ऐसी किताबें मिलने का दावा किया गया, जिनमें अपने ही परिवार और दोस्तों को रिवर्ट करने की बातें लिखी थीं. उन किताबों के पन्ने पलटते वक्त ऐसा लग रहा था जैसे किसी की सोच को धीरे-धीरे बदलने की पूरी स्क्रिप्ट तैयार की गई हो.

जांच में यह भी सामने आया कि पढ़ाने आने वाले कुछ लोग सिर्फ शिक्षक बनकर नहीं आते थे, बल्कि कथित तौर पर विचार बदलने का काम भी करते थे. आगरा के कुछ इलाकों में घूमते हुए मुझे बताया गया कि किस तरह भरोसे का रिश्ता बनाकर धीरे-धीरे युवाओं को इस नेटवर्क से जोड़ा जाता था.

Advertisement

जब मैंने इस मामले पर डीसीपी आदित्य से बात की, तो उन्होंने पूछताछ में सामने आए कई नामों और संगठनों का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि जांच में तब्लीगी जमात, निजामुद्दीन मरकज और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों के नाम सामने आने का दावा किया गया है.

लॉकडाउन के दौरान कई सेंटर बंद जरूर हुए, लेकिन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और दूसरे ठिकानों से गतिविधियां जारी रहने की बात भी सामने आई. शाहीन बाग, ओखला और कई अन्य इलाकों के नाम जांच में उभरे हैं.

रात गहरी हो चुकी थी, लेकिन कमिश्नर दीपक कुमार से मुलाकात के दौरान जो बातें सामने आईं, उन्होंने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया. उन्होंने बताया कि अब्दुल रहमान, डावर आदिल, तिलमिज उर रहमान, नासिर और सिलीगुड़ी से जुड़े कुछ लोगों के नाम जांच में सामने आए हैं. 

आरोप है कि कई युवतियों को सिलीगुड़ी, असम, जम्मू-कश्मीर, बंगाल, जालंधर और उत्तर-पूर्व के दूसरे इलाकों में ले जाया गया. कुछ मामलों में मस्जिदों में रुकवाने, पहचान छिपाने और अलग-अलग आईडी के इस्तेमाल के आरोप भी लगे हैं. जांच एजेंसियां अब भूटान और बांग्लादेश कनेक्शन की भी पड़ताल कर रही हैं.

ऑनलाइन ग्रुप्स से किए युवा टारगेट

जैसे-जैसे मैं इस नेटवर्क की परतें समझने की कोशिश कर रहा था, एक चीज साफ महसूस हो रही थी, यह सिर्फ जमीन पर चलने वाला नेटवर्क नहीं था, बल्कि मोबाइल स्क्रीन के जरिए दिमाग तक पहुंचने वाला एक पूरा डिजिटल सिस्टम भी था. जांच एजेंसियों के मुताबिक रिवर्ट्स ऑफ़ इंडिया, कनेक्टिंग जैसे ऑनलाइन ग्रुप्स के जरिए युवाओं को जोड़ा जाता था. 

Advertisement

पहले दोस्ती फिर लगातार बातचीत, उसके बाद ऑनलाइन क्लासेज, वीडियो और धार्मिक कंटेंट के जरिए कथित तौर पर मानसिक रूप से प्रभावित करने की कोशिश की जाती थी. डॉक्टर इसरार और जाकिर नाइक के वीडियो और भाषण भी कथित तौर पर शेयर किए जाते थे.

मुझे जांच से जुड़े सूत्रों ने बताया कि इस नेटवर्क में लड़कियों के लिए अलग हैंडलर्स होते थे और लड़कों के लिए अलग. ऑनलाइन निकाह, नौकरी, शादी और पैसों का लालच देकर संपर्क मजबूत किया जाता था. बेरोजगार और आर्थिक तंगी से जूझ रहे युवाओं को कथित तौर पर आर्थिक मदद देकर नेटवर्क का हिस्सा बनाने की बात भी सामने आई है.

24 मार्च 2025 को एक युवती के गायब होने का मामला इस पूरी जांच का बड़ा टर्निंग पॉइंट बना. परिवार की शिकायत के बाद कई राज्यों में सर्च ऑपरेशन चलाया गया. जांच एजेंसियों का दावा है कि जम्मू, हावड़ा, जालंधर समेत कई जगहों से अब तक 12 लड़कियों को रेस्क्यू किया गया है. जिन परिवारों से मैं मिला, वहां सिर्फ एक सवाल था. आखिर उनकी बेटियां इस जाल में फंसी कैसे?

पूछताछ में यह भी सामने आया कि बंगाल में कथित तौर पर कन्वर्जन सर्टिफिकेट बनवाए जाते थे और दिल्ली में ठहरने की व्यवस्था होती थी. कई मामलों में युवतियों को अलग-अलग राज्यों में भेजने और ऑनलाइन निकाह कराने के आरोप लगे हैं.

Advertisement

इस पूरी कहानी का सबसे अहम हिस्सा फंडिंग का है. जांच एजेंसियों के मुताबिक विदेशों, खासकर दुबई से आर्थिक मदद भेजे जाने के इनपुट मिले हैं. सईद दाऊद और परवेज अख्तर जैसे नाम एजेंसियों के रडार पर बताए जा रहे हैं. QR कोड वाले पम्पलेट, धार्मिक किताबें और डिजिटल प्रचार सामग्री भी बरामद होने का दावा किया गया है.

सूत्र बताते हैं कि 2020-21 में सरफराज जाफरी सिद्दीकी और कलीम सिद्दीकी से जुड़े नेटवर्क की जांच के दौरान कई मुलाकातें और संपर्क सामने आए थे. दावा यह भी किया जा रहा है कि कलीम सिद्दीकी के जेल जाने के बाद नेटवर्क की जिम्मेदारी दूसरे लोगों को सौंप दी गई.

आगरा की उन गलियों से लौटते वक्त मेरे मन में सिर्फ एक बात थी, यह मामला सिर्फ धर्मांतरण या किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि उन तरीकों का है जिनके जरिए किसी इंसान की सोच, पहचान और रिश्तों तक पहुंच बनाई जाती है. 

अब एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क के ऑनलाइन मॉड्यूल, फंडिंग चैनल, सोशल मीडिया ग्रुप्स और बहु-राज्यीय कनेक्शन की जांच में जुटी हैं. महाराष्ट्र ATS, NIA और दूसरी एजेंसियों के इनपुट भी खंगाले जा रहे हैं, लेकिन इस पूरी कहानी के बीच सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है, आखिर कितने लोग इस नेटवर्क की परतों में अब भी छिपे हुए हैं?

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »