Eiffel Tower Controversy: एफिल टावर इन दिनों सुर्खियों में बना हुआ है. पेरिस की इस मशहूर पहचान को लेकर एक ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने लैंगिक समानता और धार्मिक मान्यताओं को लेकर बहस छेड़ दी है. दरअसल, हिंदू धार्मिक प्रतिनिधिमंडल BAPS के दौरे के दौरान महिला कर्मचारियों को कुछ जगहों से हटने को कहा गया. विरोध में कर्मचारियों ने हड़ताल की, जिससे टावर अस्थायी रूप से बंद किया गया था, BAPS ने भी घटना पर माफी मांगी है और जांच जारी है.
मगर क्या आप जानते हैं कि आज जो एफिल टावर पेरिस की पहचान बना हुआ है. इसे देखने के लिए दुनियाभर से लोग पहुंचते हैं और इसकी तस्वीरें खींचते हैं. लेकिन एक समय ऐसा भी था जब पेरिस के कई बड़े आर्टिस्ट और लेखक इसके खिलाफ थे.
जी हां, शुरुआत में पेरिस के सबसे चर्चित एफिल टावर का वही के लोगों ने विरोध किया था. उन्हें लगता था कि लोहे का यह विशाल टावर शहर की खूबसूरती खराब कर देगा. इतना ही नहीं, इसे बेकार और राक्षसी तक कहा गया था.
क्यों बनाया गया था एफिल टावर?
एफिल टावर को साल 1889 की पेरिस वर्ल्ड फेयर के लिए बनाया गया था. इसका मकसद दुनिया को फ्रांस की नई इंजीनियरिंग और तकनीकी ताकत दिखाना था. इसका डिजाइन इंजीनियर गुस्ताव एफिल की कंपनी ने तैयार किया था. एफिल को इस जगह पर टावर बनाने और उसका इस्तेमाल करने का अधिकार सिर्फ 20 साल के लिए मिला था. यानी शुरुआत में यह तय नहीं था कि टावर हमेशा पेरिस में रहेगा.
निर्माण शुरू होते ही क्यों हुआ विरोध?
टावर का निर्माण जनवरी 1887 में शुरू हुआ. उस टाइम पेरिस अपनी खूबसूरत पत्थर की इमारतों और पुराने ऐतिहासिक स्मारकों के लिए जाना जाता था. ऐसे में लोहे का इतना बड़ा और खुला ढांचा लोगों को बिल्कुल अलग लगा. ऐसे में लोगों को डर था कि करीब 300 मीटर ऊंचा यह टावर पेरिस की पूरी खूबसूरती और स्काईलाइन को बिगाड़ देगा. उन्हें लगता था कि यह शहर की ऐतिहासिक इमारतों पर भारी पड़ेगा.
बड़े कलाकारों और लेखकों ने किया विरोध
14 फरवरी 1887 को फ्रांसीसी न्यूजपेपर ले टेम्प्स (Le Temps) में एक विरोध-पत्र पब्लिश हुआ. इसमें करीब 40 से ज्यादा कलाकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने टावर के खिलाफ आवाज उठाई. इनमें गाय द मोपासां, सुली प्रुधोम, चार्ल्स गार्नियर, फ्रांस्वा कोपे, चार्ल्स गूनो, विलियम बुगेरो और अर्नेस्ट मेसोनिए जैसे कई बड़े नाम शामिल थे.
विरोध करने वालों ने कहा कि यह टावर पेरिस की कला और खूबसूरती को नुकसान पहुंचाएगा. उन्होंने इसे बेकार और राक्षसी एफिल टावर तक कह दिया. कुछ लोगों ने इसकी तुलना टावर ऑफ बैबेल से भी की. जो लोग नहीं जानते, उन्हें बता दें कि टावर ऑफ बैबेल बाइबिल की उत्पत्ति पुस्तक में बताई गई एक मशहूर कहानी है. इसे बाबेल की मीनार कहा जाता है और यह इंसानों के एक विशाल टावर बनाने की कोशिश से जुड़ी कहानी है. इसी वजह से टावर ऑफ बैबेल का इस्तेमाल अक्सर बहुत ऊंची, अहंकार से जुड़ी इमारत के प्रतीक के तौर पर भी किया जाता है.
कलाकारों को क्या खराब लगता था?
सबसे बड़ी परेशानी इसका डिजाइन था. उस दौर में खूबसूरत इमारतों में पत्थर, नक्काशी और सजावट को लोग ज्यादा महत्व देते थे. वहीं एफिल टावर में लोहे का पूरा ढांचा खुला दिखाई देता था. कई कलाकारों को यह किसी खूबसूरत इमारत से ज्यादा फैक्ट्री की बड़ी चिमनी जैसा लगता था. उन्हें डर था कि इसका बड़ा आकार पेरिस के पुराने स्मारकों की खूबसूरती को दबा देगा.
गुस्ताव एफिल ने क्या कहा?
एफिल टावर के लगातार हो रही आलोचना के बावजूद गुस्ताव एफिल अपने प्रोजेक्ट पर कायम रहे. उन्होंने कहा था कि इंजीनियरिंग और खूबसूरती एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं.
एफिल का मानना था कि टावर का डिजाइन सिर्फ मजबूती के लिए नहीं, बल्कि अपनी तरह की खूबसूरती के लिए भी खास है. उन्होंने यह भी समझाया कि इसकी घुमावदार शेप एयर प्रेशर को ध्यान में रखकर बनाई गई है.
1889 में बदल गई लोगों की सोच
1889 की वर्ल्ड फेयर शुरू होते ही एफिल टावर देखने के लिए लोगों की भीड़ लगने लगी. क्योंकि उस समय यह दुनिया की सबसे ऊंची मानव निर्मित संरचना थी. लिफ्ट शुरू होने से पहले भी लोग 1,700 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाने के लिए तैयार थे. वर्ल्ड फेयर के दौरान करीबन 20 लाख लोगों ने टावर देखा. ऐसे ही धीरे-धीरे लोगों को यह लोहे का ढांचा अच्छा लगने लगा और इसका विरोध कम होता गया.
20 साल बाद हटाया जाना था टावर
एफिल टावर को 20 साल का अधिकार खत्म होने के बाद हटाया जाना था. मगर इसकी पॉपुलैरिटी और बाद में इसके इस्तेमाल ने इसका भविष्य बदल दिया. समय के साथ यह टावर पेरिस के लिए इतना खास हो गया कि इसे हटाने का सवाल ही खत्म हो गया.
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क