AI पर अमेरिका की ‘दादागिरी’! दुनिया के लिए बंद किए टॉप मॉडल्स, भारत पर क्या असर?

अमेरिकी AI कंपनियां भारतीय कस्टमर्स बटोरने के लिए साल भर का फ्री प्लान दे रही हैं. लेकिन जब बात आती है टॉप एआई टेक और टूल्स की तो उसे भारत में बैठे लोग यूज ही नहीं कर सकते हैं.

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भारतीय यूजर्स से मिलता है सबसे ज्यादा डेटा भारतीय यूजर्स से मिलता है सबसे ज्यादा डेटा

मुन्ज़िर अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 22 जून 2026,
  • अपडेटेड 2:36 PM IST

AI स्पेस में अमेरिका की मोनोपॉली.... या यों कहें की दादागिरी चल रही है! दुनिया भर में इस समय इस बात की चर्चा है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किल स्विच अमेरिका के हाथ में है? अगर ऐसा है तो ये भारत सहित दुनिया भर के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है. 

दरअसल अमेरिकी ट्रंप सरकार चाहती है कि अमेरिकी कंपनियां एडवांस्ड AI टूल्स दूसरे देशों को ना दें. हाल ही में ट्रंप सरकार ने एंथ्रोपिक के दो पावरफुल एआई मॉडल्स को दूसरे देशों के लिए ब्लॉक करा दिया है. यानी भारत के लोग पैसे दे कर भी एंथ्रोपिक का पावरफुल मॉडल यूज करना चाहें तो नहीं करेंगे. सिर्फ वही मॉडल एवेलेबल होगा जिससे अमेरिका को लगता है कि उनका नुकसान ना हो. 

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एनवीडिया इस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी चिपसेट कंपनी है और ऐपल को पीछे छोड़ चुकी है. चूंकि ये भी अमेरिका की कंपनी है, इसलिए एनवीडिया अपने बेस्ट AI चिपसेट (GPU) किसी दूसरे देश को नहीं देती है. ये भी अमेरिकी सरकार की तरफ से किया गया है.

ओपन एआई से लेकर एंथ्रोपिक तक, दुनिया की बड़ी AI कंपनियां अमेरिकी हैं. इन कंपनियों के बनाए गए AI मॉडल्स को अमेरिका वॉर में यूज करता है. हाल ही में ईरान पर अटैक के दौरान ओपन एआई और एंथ्रोपिक के मॉडल्स यूज किए गए हैं.

दुनिया तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तरफ बढ़ रही है. जो देश AI में आगे है, वही आने वाले समय में ताकतवर माना जाएगा.  हाल के दिनों में जो घटनाएं सामने आई हैं, उन्होंने इस बहस को और तेज कर दिया है.

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अमेरिकी सरकार ने AI कंपनी एंथ्रोपिक को आदेश दिया कि वह अपने सबसे एडवांस मॉडल्स, जैसे Fable 5 और Mythos 5, को विदेशी यूजर्स के लिए बंद कर दे. इसका मतलब साफ है कि जो टेक्नोलॉजी पूरी दुनिया इस्तेमाल कर सकती थी, उस पर अब लिमिट लगाई जा रही हैं.

अमेरिका अब AI को सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि स्ट्रैटिजिक हथियार की तरह देख रहा है. और जब कोई देश टेक्नोलॉजी को हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगे, तो बाकी दुनिया के लिए खतरे की घंटी बज जाती है.

दरअसल, AI का खेल अब डेटा, मॉडल और एक्सेस का खेल बन चुका है. जिनके पास डेटा है, वही मॉडल ट्रेन कर सकते हैं. और जिनके पास मॉडल हैं, वही दुनिया को दिशा दे सकते हैं.

अमेरिका के पास किल स्विच

इस पूरे इकोसिस्टम में अमेरिका सबसे आगे है. OpenAI, Google, Anthropic जैसी बड़ी कंपनियां वहीं की हैं. इनके मॉडल दुनिया भर में इस्तेमाल हो रहे हैं.

लेकिन अब जो हो रहा है, वह इस सिस्टम का बैंलेंस बिगाड़ सकता है. अगर अमेरिका तय करेगा कि कौन AI का इस्तेमाल करेगा और कौन नहीं, तो यह एक तरह से डिजिटल कंट्रोल हो जाएगा. इसे ही कई एक्सपर्ट्स ‘AI मोनोपॉली’ कह रहे हैं.

यूरोप इस पर खुलकर सामने आ चुका है. G7 समिट में भी यह मुद्दा प्रमुख रहा. यूरोपीय देश कह रहे हैं कि AI पर एक देश का कंट्रोल सही नहीं है. अगर ऐसा हुआ, तो टेक्नोलॉजी का बैलेंस बिगड़ जाएगा. इसलिए ‘सॉवरेन AI’ की बात तेजी से उठ रही है.

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सॉवरेन AI का मतलब है कि हर देश अपनी AI टेक्नोलॉजी खुद बनाए, खुद कंट्रोल करे और दूसरों पर निर्भर न रहे. लेकिन यह कहना जितना आसान है, करना उतना मुश्किल. क्योंकि AI बनाने के लिए भारी इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा और रिसर्च की जरूरत होती है. और यही तीनों चीजें अभी अमेरिका के पास सबसे ज्यादा हैं.

यहीं पर भारत की कहानी दिलचस्प और थोड़ी चिंताजनक हो जाती है. भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल मार्केट बन चुका है. करोड़ों यूजर्स रोज AI टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं. चैटबॉट्स से लेकर सर्च, वीडियो, सोशल मीडिया तक हर जगह AI है. लेकिन इन टूल्स का मालिक कौन है? ज्यादातर मामलों में जवाब अमेरिका ही है.

अमेरिकी AI कंपनियों के लिए टेस्टिंग ग्राउंड है भारत

फिलहाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भारत यूजर है, लेकिन मालिक नहीं. और यही सबसे बड़ा खतरा है. अमेरिका सहित चीन और दूसरे देशों के एआई कंपनियों के लिए भारत एक टेस्टिंग लैब या प्लेग्राउंड जैसा बन चुका है. चूंकि भारत में लोग और डायवर्सिटी ज्यादा है, इसलिए कंपनियों के लिए एआई मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए भारत नंबर-1 स्पॉट है. दूसरे मुल्कों के मुकाबले भारतीय यूजर्स में अवेरनेस की काफी कमी है. यही वजह है कि यहां लोग दिल खोल कर अपना डेटा किसी भी कंपनी को दे देते हैं. इसके ठीक उलट, अमेरिका या यूरोपिय देशों के यूजर्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को बायकॉट कर रहे हैं.

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अमेरिका में डेटा सेंटर बनने का विरोध हो रहा है और सड़कों पर एआई के खिलाफ प्रोटेस्ट हो रहे हैं. हाल ही में गूगल फाउंडर एक कॉलेज में एआई पर कुछ बोल रहे थे तो स्टूडेंट्स ने प्रोटेस्ट करके हंगामा कर दिया. लेकिन भारत में फिलहाल डेटा सेंटर्स को लेकर काफी उत्साह दिख रहा है.

गूगल और माइक्रोसॉफ्ट सहित कई कंपनियां अब भारत में बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर खोलने की तैयारी में है. इससे देश में निवेश आएगा और विकास भी होगा, लेकिन किस कॉस्ट पर? डेटा सेंटर्स में जितना बिजली और पानी की खपत होती है उतने में कई स्टेट का बिजली पानी चल जाए. 

भारत में डेटा बहुत है. यूजर बेस बहुत बड़ा है. यही वजह है कि अमेरिकी कंपनियां यहां अपने मॉडल्स टेस्ट करती हैं, ट्रेन करती हैं और बेहतर बनाती हैं. लेकिन जब बात कंट्रोल की आती है, तो भारत पीछे रह जाता है.

अब अमेरिकी कंपनियां भारत को ना सिर्फ टेस्टिंग ग्राउंड समझ रही हैं, बल्कि अब डेटा सेंटर सेटअप किए जा रहे हैं. क्योंकि अमेरिका जैसे देशों में AI डेटा सेंटर लगाने का विरोध हो रहा है. हां, एक बात है अगर इंडिया में ज्यादा डेटा सेंटर्स होते हैं और सरकार डेटा लोकलाइजेशन को लेकर सख्त होती है तो कम से कम डेटा भारत में रहेगा जो अच्छी बात है. 

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AI टूल्स पर निर्भर भारत, फायदा अमेरिका का

Anthropic के मॉडल्स पर लगा यह नया प्रतिबंध एक बड़ा संकेत है. आज उन्होंने कुछ मॉडल्स बंद किए हैं, कल और भी कर सकते हैं. अगर ऐसा होता है, तो भारत जैसे देशों के पास विकल्प क्या होगा? या तो वे उसी पर निर्भर रहें, या फिर खुद का सिस्टम खड़ा करें.

यहां एक और खतरा है, जो अक्सर नजरअंदाज हो जाता है. अगर AI का कंट्रोल कुछ देशों के पास ही रहा, तो वह सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि सोच को भी कंट्रोल कर सकता है. कौन सी जानकारी दिखेगी, कौन सी नहीं, किस तरह की भाषा को बढ़ावा मिलेगा, यह सब AI तय कर सकता है. इसका सीधा असर लोकतंत्र, समाज और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.

यही वजह है कि G7 में ‘ट्रस्टेड पार्टनर्स’ की बात भी सामने आई. यानी कुछ देशों को ही एडवांस AI तक पहुंच दी जाएगी. सवाल यह है कि इसमें कौन शामिल होगा और कौन बाहर रह जाएगा. अगर यह सिस्टम लागू होता है, तो यह एक तरह का डिजिटल क्लब बन जाएगा, जिसमें हर देश की एंट्री नहीं होगी.

भारत के लिए यह मौका भी है और चुनौती भी. मौका इसलिए क्योंकि भारत के पास टैलेंट है, डेटा है और बाजार है. अगर सही दिशा में काम हुआ, तो भारत अपना AI बना सकता है. लेकिन चुनौती इसलिए क्योंकि इसमें देरी हुई, तो भारत हमेशा दूसरों पर निर्भर रह जाएगा.

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सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम जरूर उठाए हैं. ‘इंडिया AI मिशन’ जैसी पहल हो रही है. लेकिन यह अभी शुरुआत है. असली काम अभी बाकी है. आज की सच्चाई यह है कि AI सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि पावर है. जिस देश के पास AI होगा, वही फ्यूचर तय करेगा. और अगर यह पावर कुछ देशों तक सीमित रह गई, तो दुनिया में असमानता और बढ़ जाएगी.

भारत और बाकी देशों को अब यह समझना होगा कि सिर्फ यूजर बनकर काम नहीं चलेगा. अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में AI की दुनिया में वही होगा जो पहले तेल और इंटरनेट के साथ हुआ था, कुछ देश आगे, बाकी पीछे. 

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