19 दिन... 6 हार... और आखिरकार जीत की बारी. बेलफास्ट से शुरू हुआ भारत का आयरलैंड और फिर इंग्लैंड का दौरा बर्मिंघम पहुंचकर रंग लाया. टी20 में लगातार मिली हार ने इस युवा टीम के आत्मविश्वास और रणनीति, दोनों पर सवाल खड़े कर दिए थे. आलोचना सिर्फ हार की नहीं थी, बल्कि खेलने के तरीके की भी थी. लेकिन एजबेस्टन में फॉर्मेट बदला, तो टीम इंडिया का मिजाज भी बदल गया. शुभमन गिल की कप्तानी में भारत ने पहले वनडे में इंग्लैंड को 6 विकेट से हराकर यह याद दिलाया कि 50 ओवरों के क्रिकेट में अनुभव, धैर्य और परिस्थितियों को पढ़ने की कला अब भी सबसे बड़ी ताकत है.
यह जीत सिर्फ सीरीज में 1-0 की बढ़त नहीं थी, बल्कि पिछले तीन हफ्तों से उठ रहे सवालों पर पहला ठोस जवाब भी थी, यह उस टीम का जवाब भी थी, जो पिछले तीन हफ्तों से लगातार सवालों के घेरे में थी. आयरलैंड के खिलाफ 0-2 और इंग्लैंड के खिलाफ 0-4 से टी20 सीरीज गंवाने के बाद टीम इंडिया को लेकर कई तरह की बहस शुरू हो गई थी. क्या युवा खिलाड़ियों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया गया? क्या बल्लेबाज सिर्फ आक्रामक क्रिकेट खेलने की कोशिश में अपना स्वाभाविक खेल भूल गए? एजबेस्टन में इन सवालों के जवाब पूरी तरह नहीं मिले, लेकिन टीम ने सही दिशा जरूर पकड़ ली.
टी20 सीरीज की सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि भारतीय बल्लेबाजी में धैर्य और परिस्थितियों के मुताबिक खेलने का धागा कहीं टूट गया था. बल्लेबाज शुरुआत से ही मैच खत्म करने की जल्दबाजी में दिखे. विकेट गिरते गए और दबाव बढ़ता गया.
वनडे में तस्वीर बिल्कुल अलग थी. भारतीय बल्लेबाजों ने शुरुआत में जोखिम कम लिया, गेंद को पुराना होने दिया, स्ट्राइक रोटेट की और फिर मौके मिलने पर रन गति बढ़ाई. यही 50 ओवर के क्रिकेट की मांग भी है. एजबेस्टन में भारत ने आक्रामकता और धैर्य के बीच वही संतुलन बनाया, जो टी20 सीरीज में गायब था.
कप्तान गिल ने दिखाई मैच पढ़ने की कला
शुभमन गिल की नाबाद 80 रनों की पारी स्कोरकार्ड में शायद बहुत विस्फोटक नहीं दिखे, लेकिन मैच के संदर्भ में उसका महत्व कहीं ज्यादा था. यह ऐसी पारी थी जिसमें चौकों-छक्कों की चमक से ज्यादा नियंत्रण दिखाई दिया. गिल ने इंग्लैंड के तेज गेंदबाजों को शुरुआत में सम्मान दिया, गलत गेंद का इंतजार किया और फिर रन बनाने की गति बढ़ाई.
सबसे अहम बात यह रही कि कप्तान के तौर पर उन्होंने मैच को कभी हाथ से निकलने नहीं दिया. शुरुआती विकेट गिरने के बाद भी उनके हावभाव में घबराहट नहीं दिखी. उन्होंने साझेदारियां बनाईं, स्ट्राइक रोटेट की और इंग्लैंड को वापसी का मौका नहीं दिया. यही परिपक्वता उनकी कप्तानी की सबसे बड़ी पहचान बनकर सामने आई.
अगर बल्लेबाजी ने जीत पर मुहर लगाई, तो उसकी नींव गेंदबाजों ने रखी. जसप्रीत बुमराह ने एक बार फिर दिखाया कि नई गेंद उनके हाथ में आते ही बल्लेबाजों का रवैया क्यों बदल जाता है. उनकी गेंदबाजी सिर्फ विकेट लेने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह दूसरे छोर से गेंदबाजी करने वाले साथियों का काम भी आसान कर देते हैं.
एजबेस्टन में भी कुछ ऐसा ही हुआ. बुमराह ने शुरुआत से दबाव बनाया. बल्लेबाज खुलकर शॉट नहीं खेल सके. प्रसिद्ध कृष्णा ने अपनी अतिरिक्त उछाल का फायदा उठाया, जबकि अक्षर पटेल ने भी फिरकी से अपनी छाप छोड़ी. भारत ने शुरुआती झटकों से इंग्लैंड को बैकफुट पर जरूर धकेल दिया था, लेकिन लियाम डॉसन और जो रूट ने सातवें विकेट के लिए 121 रनों की साझेदारी कर मेजबान टीम की वापसी कराई. इसी साझेदारी की बदौलत इंग्लैंड 250 रनों के पार पहुंचने में सफल रहा.
जल्दबाजी नहीं, समझदारी बनी जीत की वजह
259 रनों का लक्ष्य बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन इंग्लैंड की परिस्थितियों में आसान भी नहीं कहा जा सकता. खासकर तब, जब सामने जोफ्रा आर्चर जैसे तेज गेंदबाज हों.
भारत ने यहां वही गलती नहीं दोहराई जो टी20 सीरीज में बार-बार देखने को मिली थी. बल्लेबाजों ने शुरुआती स्पेल निकालने पर ध्यान दिया. नई गेंद को सम्मान दिया और विकेट बचाए रखे. जैसे-जैसे गेंद पुरानी हुई, रन बनाना आसान होता गया. यही वजह रही कि भारत ने लक्ष्य 4.4 ओवरों पहले ही हासिल कर लिया.
यह मैच एक और संकेत भी छोड़ गया. अगर भारतीय बल्लेबाज नई गेंद पर आर्चर जैसे गेंदबाजों को विकेट नहीं देते, तो इंग्लैंड का आक्रमण पहले जितना खतरनाक नहीं रह जाता.
पिछले कुछ समय से भारतीय टीम लगातार अलग-अलग संयोजनों के साथ उतर रही थी. टी20 में युवा खिलाड़ियों को ज्यादा मौके दिए गए, लेकिन वनडे में अनुभवी खिलाड़ियों की वापसी ने टीम को अलग संतुलन दिया.
यही शायद इस जीत का सबसे बड़ा सबक भी है. हर फॉर्मेट की अपनी अलग जरूरत होती है. टी20 का टेम्पो और वनडे का टेम्पो एक जैसा नहीं हो सकता. 50 ओवरों के क्रिकेट में सिर्फ ताकत नहीं, बल्कि धैर्य, साझेदारी और मैच की रफ्तार को नियंत्रित करने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी होती है. एजबेस्टन में भारत ने यही क्रिकेट खेला.
अभी जश्न नहीं... असली चुनौती बाकी है
पहला वनडे जीतने के बाद भारत ने सीरीज में बढ़त जरूर बना ली है, लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं हुई. इंग्लैंड अगले मुकाबले में ज्यादा आक्रामक रणनीति के साथ उतरेगा. भारतीय टीम के लिए जरूरी होगा कि वह इस जीत को आत्मसंतोष में न बदलने दे.
रोहित शर्मा और विराट कोहली जैसे वरिष्ठ बल्लेबाजों से अभी बड़ी पारियों का इंतजार है. अगर शीर्ष क्रम और मजबूत होता है, शुभमन गिल इसी तरह जिम्मेदारी निभाते हैं और जसप्रीत बुमराह नई गेंद से दबाव बनाए रखते हैं, तो इंग्लैंड के लिए वापसी आसान नहीं होगी.
एजबेस्टन की यह जीत सिर्फ सीरीज में 1-0 की बढ़त नहीं है. इसने यह भी याद दिलाया कि क्रिकेट में हर फॉर्मेट की अपनी अलग भाषा होती है. टी20 की आक्रामकता हमेशा वनडे में काम नहीं आती. यहां धैर्य, अनुशासन और सही समय पर सही फैसला मैच जिताते हैं.
तीन हफ्तों तक आलोचनाओं के बीच घिरी टीम इंडिया ने एजबेस्टन में यही सबक सबसे बेहतर तरीके से मैदान पर उतारा. अगर यही संतुलन आगे भी बना रहा, तो बर्मिंघम की यह जीत सिर्फ एक मैच की जीत नहीं, बल्कि पूरे दौरे का टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती है.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क