इस समय देश के कई हिस्सों में भीषण लू का प्रकोप जारी है, लेकिन विदर्भ (महाराष्ट्र) और बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश) के इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित दिख रहे हैं.
नीचे दी गई टेबल IMD की 20 मई 2026 की रिपोर्ट को दर्शाती है...
27 हीटवेव प्रभावित शहरों में से 6 विदर्भ के (वर्धा, नागपुर, अमरावती, चंद्रपुर, अकोला, यवतमाल) और 4 बुंदेलखंड क्षेत्र के (बांदा, खजुराहो, दमोह, सतना आदि) हैं. बांदा में तापमान 48.0°C तक पहुंच गया, जो पूरे देश और दुनिया में सबसे अधिक है.
सवाल यह है कि इन इलाकों में गर्मी बाकी जगहों से ज्यादा क्यों है? इसके पीछे जियोग्राफी, भूमि की स्थिति, जंगलों की कटाई, खनन, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी कई वजहें हैं.
यह भी पढ़ें: भारत की नई अग्नि-5 मिसाइल के जवाब में पाकिस्तान और चीन के पास क्या है?
विदर्भ और बुंदेलखंड की भूगोल और भूमि की स्थिति
ये दोनों क्षेत्र मध्य भारत के सूखे और अर्ध-सूखे पठारी इलाकों में आते हैं. विदर्भ सतपुड़ा पर्वतमाला के दक्षिण में स्थित है, जहां गर्म हवाएं आसानी से प्रवेश करती हैं. बुंदेलखंड में चट्टानी जमीन, कम वाटर स्टोरेज कैपेसिटी और तेज जल निकासी होती है. दोनों जगहों पर मिट्टी नमी को लंबे समय तक नहीं रोक पाती, जिससे सतह तेजी से गर्म हो जाती है.
जंगलों की कटाई सबसे बड़ी वजह
जंगलों की भारी कटाई इन क्षेत्रों में स्थानीय तापमान को काफी बढ़ा रही है. वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (WRI) के 2023 की स्टडी के मुताबिक, ट्रॉपिकल इलाकों में जंगलों की कटाई से दैनिक अधिकतम तापमान 4.4°C तक बढ़ सकता है. विदर्भ में औद्योगिक विस्तार और खनन के कारण फॉरेस्ट कवरेज तेजी से घटा है. बुंदेलखंड में कृषि विस्तार और खदानों ने जंगलों को नुकसान पहुंचाया है.
यह भी पढ़ें: आग की भट्टी बना उत्तर भारत... बांदा में 48, 26 शहरों में पारा 45 डिग्री पार, जानिए इनका हाल
खनन गतिविधियों का विनाशकारी प्रभाव
बुंदेलखंड में बड़े पैमाने पर पत्थर खनन, बालू निकासी और खदानों ने पूरे इलाके को हीट ट्रैप बना दिया है. खदानों से पेड़ कटते हैं. मिट्टी उजड़ती है. भूजल स्तर गिरता है, जिससे प्राकृतिक तौर पर ठंडा करने की प्रक्रिया पूरी तरह बिगड़ जाती है. विदर्भ में कोयला खदानें और अन्य खनन गतिविधियां भी जंगलों को नष्ट कर रही हैं.
उद्योगों, खदानों और वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण हवा को गर्म रखता है. हीट आइलैंड प्रभाव पैदा करता है. नागपुर और आसपास के शहरों में उद्योगों का घनत्व भी गर्मी बढ़ाने में सहायक है.
यह भी पढ़ें: दिल्ली, "दिल्ली, UP और MP... अगले 7 दिन गर्मी का रेड अलर्ट, मौसम वैज्ञानिक दे रहे ये चेतावनी
जलवायु परिवर्तन का योगदान
IPCC की रिपोर्ट्स और CEEW (Council on Energy, Environment and Water) की हीटवेव रिस्क स्टडी के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग इन सूखाग्रस्त क्षेत्रों को और संवेदनशील बना रही है. पिछले 20-30 वर्षों में इन इलाकों में हीटवेव की संख्या और तीव्रता दोनों बढ़ी हैं.
विदर्भ और बुंदेलखंड में पड़ रही भीषण गर्मी केवल मौसम की मार नहीं है, बल्कि जंगलों की कटाई, अनियंत्रित खनन, प्रदूषण और भूमि क्षरण का संयुक्त परिणाम है, जो जलवायु परिवर्तन से और बढ़ गया है. यदि इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, खनन पर सख्त नियंत्रण, भूजल संरक्षण और सस्टेनेबल विकास की नीतियां नहीं अपनाई गईं तो भविष्य में गर्मी का प्रकोप और तेज हो सकता है.
ऋचीक मिश्रा