ग्रीनलैंड पर कब्जा कर खनिज निकालने का ख्वाब देख रहे ट्रंप, लेकिन इन वजहों से साबित हो सकता है 'बुरा सपना'

डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड के खनिज का सपना राजनीतिक भाषणों में चमकता है, लेकिन वास्तव में यह खनन कंपनियों के लिए बुरा सपना है. यहां सदियों से जमी जमीन (पर्माफ्रॉस्ट), -50 डिग्री ठंड, महीनों का अंधेरा, कोई सड़क-रेल नहीं और सिर्फ 2-3 महीने की शिपिंग विंडो है. विशेषज्ञ कहते हैं, खनिज संभावना तो है, लेकिन निकालना लगभग असंभव और बहुत महंगा.

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ग्रीनलैंड से खनिज निकालने का सपना आसानी से पूरा होने वाला नहीं है. (Photo: ITG/Vaani Gupta) ग्रीनलैंड से खनिज निकालने का सपना आसानी से पूरा होने वाला नहीं है. (Photo: ITG/Vaani Gupta)

शिबू त्रिपाठी

  • नई दिल्ली,
  • 09 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 7:00 PM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को खरीदने या जरूरत पड़ने पर जबरन कब्जा करने के बयानों ने दुनिया का ध्यान फिर से इस आर्कटिक द्वीप पर खींचा है. ट्रंप इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और खनिज संपदा का महत्वपूर्ण हिस्सा बता रहे हैं, ताकि चीन पर निर्भरता कम हो. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रीनलैंड के खनिज सपने ज्यादा राजनीतिक भाषणों में चमकते हैं, वास्तविकता में यह खनन कंपनियों के लिए एक बुरा सपना है.  

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ट्रंप का दावा और ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत

ट्रंप बार-बार कहते हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए जरूरी है. वजह...

  • रूस और चीन के जहाज आर्कटिक में बढ़ रहे हैं.
  • ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य बेस पहले से हैं (थुले एयर बेस).
  • यह द्वीप डेनमार्क के अधीन है, लेकिन स्वायत्त है.

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ट्रंप ने कहा कि जरूरत पड़ी तो बल प्रयोग भी किया जा सकता है. इस पर डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय ने पुराना नियम दोहराया कि कोई विदेशी ताकत डेनमार्क क्षेत्र पर हमला करे तो सैनिक बिना आदेश के गोली चला सकते हैं. यह बयान बर्लिंग्सके अखबार ने रिपोर्ट किया है. 

ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड में खजाना है – रेयर अर्थ एलिमेंट्स, बेस मेटल्स और हाइड्रोकार्बन – जो चीन पर निर्भरता कम कर सकता है. लेकिन भूवैज्ञानिक विशेषज्ञ इसे भ्रम कह रहे हैं.

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भूवैज्ञानिक विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

आईआईटी दिल्ली के एमेरिटस प्रोफेसर और प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक प्रो. के. शेषगिरी राव कहते हैं कि लोग ग्रीनलैंड के खनिज धन पर भ्रम में हैं. ग्रीनलैंड में पृथ्वी की सबसे पुरानी चट्टानें हैं (3.8 अरब साल पुरानी), जो भारत की धारवाड़ क्रेटन (कर्नाटक), अरावली रेंज और कडप्पा बेसिन जैसी हैं.

ऐसी चट्टानों में खनिज बनने की संभावना होती है. लेकिन अभी तक बहुत कम खनिज साबित हुए हैं. पुष्टि के लिए 2-5 साल तक भू-भौतिकीय और तकनीकी अध्ययन चाहिए.

खनन क्यों है माइनर्स के लिए काल?

भले ही खनिज हों, लेकिन आर्कटिक की कठिन परिस्थितियां खनन को लगभग असंभव बना देती हैं

पर्माफ्रॉस्ट (हमेशा जमी जमीन): ज्यादातर जमीन सदियों से जमे हुए हैं. ड्रिलिंग बहुत मुश्किल, नींव अस्थिर हो जाती है. लागत बहुत बढ़ जाती है.

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बर्बर ठंड: तापमान -40 से -50 डिग्री सेल्सियस तक. धातु टूटने लगती है. मशीनरी के लिए खास मिश्रित धातु और हीटिंग जरूरी. ईंधन और लुब्रिकेंट जम जाते हैं.

अंधेरा और लंबी रातें: सर्दियों में महीनों तक सूरज नहीं निकलता. फ्लडलाइट्स में 24 घंटे काम करना पड़ता है, जिससे दुर्घटनाएं बढ़ती हैं. काम की गति कम होती है.

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लॉजिस्टिक्स की मार: ग्रीनलैंड में कोई सड़क या रेल नहीं. सब कुछ हेलीकॉप्टर, छोटे विमान या मौसमी जहाजों से लाना-ले जाना पड़ता है.

शिपिंग की सीमित खिड़की: केवल 2-3 महीने में जहाज आ-जा सकते हैं. एक तूफान पूरे साल का उत्पादन बर्बाद कर सकता है.

प्रोसेसिंग की समस्या: खनिज निकालने के बाद उसे प्रोसेस करने के लिए विदेश भेजना पड़ता है, क्योंकि ग्रीनलैंड में कोई स्मेल्टर (गलाने की फैक्ट्री) नहीं.

समय और जोखिम: खोज से उत्पादन तक 10-15 साल लगते हैं. इस दौरान कीमत गिर गई तो निवेशक का पैसा डूब सकता है.

उदाहरण: सिट्रॉन फियॉर्ड जिंक-लीड प्रोजेक्ट – दुनिया के सबसे बड़े अनडेवलप्ड जिंक डिपॉजिट में से एक. 83° उत्तर में स्थित, नूक से 2100 किमी दूर. एक तूफान पूरे साल का प्लान बर्बाद कर सकता है.

जलवायु परिवर्तन भी नहीं दे रहा राहत

कुछ लोग कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से बर्फ पिघलेगी और खनन आसान होगा. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि पर्माफ्रॉस्ट पिघलने से इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान हो रहा है. मौसम और खराब हो रहा है, जिससे लागत बढ़ रही है.

राजनीतिक सपना vs वास्तविकता

ट्रंप का ग्रीनलैंड खनिज सपना बहुत आकर्षक लगता है, लेकिन भूवैज्ञानिक और खनन विशेषज्ञ इसे माइनर्स का नाइटमेयर कह रहे हैं. अभी तक बहुत कम खनिज साबित हुए हैं. आर्कटिक की कठिनाइयां इतनी बड़ी हैं कि बड़े पैमाने पर खनन सालों तक सपना ही रहेगा. ग्रीनलैंड की असली ताकत उसकी रणनीतिक स्थिति और आर्कटिक में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव में है, न कि आसानी से निकलने वाले खनिजों में.

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