आर्कटिक क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बर्फ बहुत तेजी से पिघल रही है. समुद्र का पानी गर्म हो रहा है. जानवरों का रहना-खाना सब बदल रहा है. एक नई स्टडी बताती है कि रिंग्ड सील अब भूख के आगे डर को भूल जाती हैं.
वे अपने सबसे बड़े शिकारी ध्रुवीय भालू के खतरे को नजरअंदाज करके बेहतर भोजन की तलाश में जोखिम उठाती हैं. ये स्टडी कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया के वैज्ञानिकों ने की है. इकोलॉजी लेटर्स जर्नल में छपी है.
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सील और ध्रुवीय भालू का खेल
ध्रुवीय भालू सील का सबसे बड़ा दुश्मन है. लेकिन सील अब इतनी भूखी हैं कि वे अच्छी मछलियां मिलने पर भालू के पास भी ज्यादा समय बिताती हैं. वैज्ञानिकों ने जीपीएस ट्रैकर और गोताखोरी के डेटा से देखा कि सील कहां जाती हैं. कितनी देर गोता लगाती हैं. जहां भालू ज्यादा होते हैं, वहां सील जल्दी निकल जाती हैं. लेकिन अगर वहां अच्छी मछलियां ज्यादा हों तो वे रुक जाती हैं और जोखिम उठाती हैं.
खाना या डर – सील का फैसला
सील सिर्फ डर से नहीं भागतीं. वे भोजन की क्वालिटी देखती हैं. सुरक्षित जगहों पर जहां भालू कम होते हैं, वहां सील कम समय गोता लगाती हैं क्योंकि वहां भोजन आसानी से मिल जाता है. लेकिन खतरनाक जगहों पर भी वे अच्छा भोजन मिलने पर ज्यादा देर रुक जाती हैं.
वैज्ञानिक इसे पोर्टफोलियो इफेक्ट कहते हैं – जैसे निवेश में एक ही जगह पर सारा पैसा नहीं लगाते, वैसे ही सील एक ही तरह की मछली पर निर्भर नहीं रहतीं. वे कई तरह की मछलियां खाती हैं ताकि भोजन हमेशा मिलता रहे.
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किलर व्हेल का खतरा
जलवायु परिवर्तन से आर्कटिक में नई प्रजातियां आ रही हैं. किलर व्हेल अब उन इलाकों में पहुंच रही हैं जहां पहले नहीं आती थीं. ध्रुवीय भालू से बचना सील के लिए आसान है क्योंकि वे तेज तैर सकती हैं, लेकिन किलर व्हेल बहुत तेज और चालाक होती हैं.
इसलिए सील की पुरानी रणनीति अब कम काम कर रही है. जैसे-जैसे बर्फ कम हो रही है, ध्रुवीय भालुओं की संख्या भले ही कम हो, लेकिन बचे हुए छोटे बर्फीले इलाकों में वे ज्यादा हो जाते हैं. इससे सील के लिए खतरा और बढ़ जाता है.
कंजरवेशन के लिए क्या सीख मिली?
ये स्टडी बताती है कि कंजरवेशन में सिर्फ भोजन की जगह देखना काफी नहीं. शिकारी-शिकार का रिश्ता भी समझना जरूरी है. अगर हम गलत इलाके बचाएंगे तो असली मदद नहीं होगी. स्थानीय समुदायों की आजीविका भी सील और मछलियों पर निर्भर है. इसलिए इन जानवरों के व्यवहार को सही से समझना बहुत जरूरी है.
आजतक साइंस डेस्क