पहली बार इंसान को दी गई उम्र घटाने की दवा... क्या अब अमर हो जाएगा इंसान

वैज्ञानिकों ने पहली बार इंसानी आंख में 'ER-100' दवा इंजेक्ट कर बुढ़ापा हटाने का ऐतिहासिक ट्रायल शुरू किया है. इससे इंसानी उम्र के बढ़ने के असर को रोका जा सकेगा. बुढ़ापे को पलटा जा सकेगा.

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कम से कम 20 मरीजों को खोजकर उन्हें ये दवा दी गई है. (Photo: Pexel) कम से कम 20 मरीजों को खोजकर उन्हें ये दवा दी गई है. (Photo: Pexel)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 11 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:52 PM IST

मेडिकल साइंस में एक ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाया गया है, जिसे कल तक सिर्फ साइंस फिक्शन का हिस्सा माना जाता था. वैज्ञानिकों ने इंसानी उम्र के बढ़ते असर को रोकने और उसे वापस पलटने की दिशा में एक बेहद बड़ी सफलता हासिल की है. 

अमेरिका के बोस्टन में स्थित बायोटेक्नोलॉजी कंपनी 'लाइफ बायोसाइंसेज' ने घोषणा की है कि दुनिया के पहले 'पार्शियल सेलुलर रीप्रोग्रामिंग' क्लीनिकल ट्रायल के तहत पहले इंसानी मरीज को दवा की खुराक दे दी गई है. चिकित्सा इतिहास के इस ऐतिहासिक पड़ाव को 'ER-100' नाम के एक एक्सपेरीमेंटल ट्रीटमेंट के जरिए अंजाम दिया जा रहा है. 

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इसका प्राथमिक परीक्षण उन मरीजों पर किया जा रहा है जो ग्लूकोमा और उम्र से जुड़ी आंखों की अन्य बीमारियों के कारण अपनी आंखों की रोशनी खो रहे हैं. शोधकर्ताओं को पूरी उम्मीद है कि यह थेरेपी बूढ़ी हो चुकी कोशिकाओं को फिर से युवा और सक्रिय बना देगी, जिससे खोई हुई आंखों की रोशनी को वापस पाना संभव हो सकेगा.

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क्या है यह तकनीक और कैसे दिया गया पहला डोज?

इस प्रयोग के पहले चरण में ग्लूकोमा से पीड़ित एक मरीज की एक आंख में सीधे यह प्रयोगात्मक जीन थेरेपी इंजेक्ट की गई है. इस शुरुआती ट्रायल में बहुत ही सीमित संख्या (लगभग 20 से कम मरीज) को शामिल किया गया है, जिनका चयन बोस्टन, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और चार्ल्सटन जैसे बड़े शहरों के विशेष क्लीनिकों से किया गया है. 

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डॉक्टर और वैज्ञानिक आने वाले कई महीनों तक इन मरीजों की बारीकी से निगरानी करेंगे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह तकनीक इंसानी शरीर के लिए पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं. इस थेरेपी की प्रक्रिया बेहद अनोखी है; सबसे पहले मरीज की आंख में एक सिंगल जीन थेरेपी इंजेक्शन दिया जाता है, जिसके बाद मरीज को कुछ हफ्तों तक एंटीबायोटिक दवाओं का विशेष कोर्स कराया जाता है. 

यह एंटीबायोटिक दवा शरीर के भीतर जाकर उन तीन इलाज करने लायक जीनों के लिए एक केमिकल 'ऑन स्विच' का काम करती है, जो कोशिकाओं को रीप्रोग्राम करना शुरू करते हैं. इससे पहले चूहों और बंदरों पर किए गए सफल जानवरों के परीक्षणों में इस तकनीक ने बूढ़े हो चुके जीवों के ऑप्टिक नर्व (आंख की नस) के कनेक्शन को दोबारा जोड़कर उनकी रोशनी को सफलतापूर्वक वापस लौटा दिया था.

उम्र बढ़ने का 'इन्फॉर्मेशन थ्योरी' सिद्धांत और दवा का काम

इस पूरे ट्रायल की नींव हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध जेनेटिक्स वैज्ञानिक डेविड सिंक्लेयर द्वारा दी गई- इन्फॉर्मेशन थ्योरी ऑफ एजिंग पर टिकी है. इस सिद्धांत के अनुसार, हमारा शरीर बूढ़ा इसलिए नहीं होता कि उसकी कोशिकाएं खत्म हो जाती हैं, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि समय के साथ कोशिकाएं उस बायोलॉजिकल इंस्ट्रक्शन तक पहुंचने की क्षमता खो देती हैं जो उन्हें ठीक से काम करने में मदद करती है. 

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ER-100 नामक यह थेरेपी जीन थेरेपी की मदद से आंख की प्रभावित कोशिकाओं में कुछ खास संशोधित रीप्रोग्रामिंग फैक्टर्स को भेजती है. ये फैक्टर्स कोशिका की मूल पहचान को पूरी तरह से बदले बिना, उसके भीतर जीन एक्सप्रेशन के उस पुराने और युवा पैटर्न को वापस सक्रिय कर देते हैं जो वर्षों पहले मौजूद था.

वैज्ञानिकों ने इस परीक्षण के लिए आंख को इसलिए चुना क्योंकि आंख हमारे शरीर के बाकी हिस्सों से काफी हद तक अलग और सुरक्षित होती है, जिससे दवा के असर और उसके संभावित साइड इफेक्ट्स पर नजर रखना बेहद आसान हो जाता है.

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सेलुलर रीप्रोग्रामिंग: क्या है इसका नोबेल पुरस्कार कनेक्शन?

सेलुलर रीप्रोग्रामिंग आज के समय में लंबी उम्र से जुड़े विज्ञान का सबसे चर्चित और लोकप्रिय विषय बन चुका है. इसके पीछे मूल विचार यह है कि भले ही कोई कोशिका कितनी भी बूढ़ी क्यों न हो जाए, उसके भीतर अपनी जवानी के दिनों का एक डीएनए रिकॉर्ड या याददाश्त हमेशा सुरक्षित रहती है, जिसे सही दिशा दिखाकर वापस पाया जा सकता है.

इस धारणा को साल 2006 और 2007 में तब वैश्विक पहचान मिली, जब जापानी वैज्ञानिक शिन्या यामानाका ने खोजा कि चार विशेष प्रोटीनों के मिश्रण का उपयोग करके किसी भी वयस्क कोशिका को वापस स्टेम सेल (Blank-slate Stem Cells) में बदला जा सकता है. 

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इन प्रोटीनों को आज 'यामानाका फैक्टर्स' के नाम से जाना जाता है, जो कोशिका की जैविक घड़ी को पूरी तरह से शून्य पर सेट कर देते हैं. इस खोज के लिए यामानाका को साल 2012 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया था, जिसने रीजेनरेटिव मेडिसिन के क्षेत्र को हमेशा के लिए बदल दिया.

'पार्शियल रीप्रोग्रामिंग' का रास्ता और इसका भारी जोखिम

कोशिकाओं को पूरी तरह से रिसेट करने या उन्हें वापस स्टेम सेल बनाने में मेडिकल साइंस के सामने एक बहुत बड़ा खतरा था. जब कोशिकाएं पूरी तरह से अपनी पुरानी पहचान खोकर स्टेम सेल बन जाती हैं, तो वे अनियंत्रित रूप से विभाजित होने लगती हैं, जिससे शरीर में ट्यूमर या कैंसर होने का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है.

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इसी जानलेवा समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने 'पार्शियल रीप्रोग्रामिंग' की नई तकनीक विकसित की. इसके तहत कोशिकाओं को पूरी तरह से कोरी स्लेट (स्टेम सेल) बनाने के बजाय, उनकी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को केवल कुछ कदम पीछे धकेला जाता है. 

इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य कोशिकाओं की मूल पहचान को सुरक्षित रखते हुए (जैसे ऑप्टिक नर्व सेल को ऑप्टिक नर्व सेल ही बनाए रखना) उन्हें युवा कोशिकाओं की तरह स्वस्थ और ऊर्जावान बनाना है. इस थेरेपी को चिकित्सा जगत में 'हाई-रिस्क' यानी बेहद जोखिम भरा माना जा रहा है क्योंकि यदि ये रीप्रोग्रामिंग जीन शरीर में जरूरत से ज्यादा समय तक सक्रिय रह गए, तो कोशिकाएं अपनी विशिष्टता खोकर कैंसर कोशिकाओं की तरह व्यवहार करना शुरू कर सकती हैं. 

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यही वजह है कि यह पहला चरण (Phase 1 Trial) केवल इंसानी सुरक्षा और सही डोज़ की मात्रा तय करने पर केंद्रित है. यदि यह परीक्षण पूरी तरह सुरक्षित साबित होता है, तो भविष्य में इसी तकनीक का उपयोग अल्जाइमर, गठिया और दिल की गंभीर बीमारियों जैसी उम्र से जुड़ी तमाम लाइलाज समस्याओं के इलाज में किया जा सकेगा.

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