समुद्र का चेर्नोबिल: जहर उगल रहे 16 लाख टन विस्फोटक पर केकड़े और मछलियां क्यों बस गए?

बाल्टिक सागर में द्वितीय विश्व युद्ध के 16 लाख टन पुराने बारूद सड़ रहा हैं. वैज्ञानिकों को लगा था कि यहां कोई जीवन नहीं होगा, लेकिन ROV कैमरे ने हैरान कर दिया. केकड़े, मछलियां, स्टारफिश और एनिमोन इन जहरीले बमों और मिसाइलों पर आराम से रह रहे हैं. वैज्ञानिक इसे समुद्र का चेर्नोबिल कहते हैं.

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बाल्टिक सागर में सेकेंड वर्ल्ड वॉर के 16 लाख टन विस्फोटकों पर समुद्री जीवन पनप रहा है. (Photo: Getty) बाल्टिक सागर में सेकेंड वर्ल्ड वॉर के 16 लाख टन विस्फोटकों पर समुद्री जीवन पनप रहा है. (Photo: Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 18 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:44 PM IST

समुद्र की गहराई में एक अनोखा और हैरान करने वाला दृश्य देखा गया है. जर्मनी के बाल्टिक सागर में द्वितीय विश्व युद्ध के समय के लाखों टन पुराने गोला-बारूद पड़े हैं. ये विस्फोटक 80 साल से ज्यादा समय से पानी के अंदर सड़ रहे हैं. वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि इतने खतरनाक और जहरीले इलाके में कोई जीवन नहीं बचेगा. 

जब उन्होंने रिसर्च वेसल ALKOR से रिमोट कंट्रोल कैमरा (ROV) नीचे उतारा तो हैरानी हुई. केकड़े, मछलियां, स्टारफिश, एनिमोन, मसल्स और ब्रिसलवर्म जैसे जीव-जंतु इन पुराने मिसाइलों, बमों और माइन्स पर खुशी-खुशी रह रहे थे. वैज्ञानिक इसे समुद्र का चेर्नोबिल कह रहे हैं क्योंकि यहां प्रकृति ने मौत के ढेर पर जीवन बना दिया है.

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16 लाख टन गोला-बारूद कहां और क्यों डाला गया?

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी के पास बहुत सारा इस्तेमाल न हुआ गोला-बारूद बचा था. इसे समुद्र में फेंक दिया गया. जर्मनी के ल्यूबेक बे में हाफक्रुग और पेल्जरहाकेन नाम के दो जगहों के बीच 16 लाख टन विस्फोटक डाले गए. इनमें मिसाइलें, टॉरपीडो, बम और माइन्स शामिल हैं. 

उस समय लोग सोचते थे कि समुद्र इतना बड़ा है कि ये चीजें कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगी. लेकिन अब ये विस्फोटक सड़ रहे हैं. TNT (ट्रिनाइट्रोटॉल्यूइन) नाम का जहरीला केमिकल पानी में घुल रहा है. फिर भी इन पुरानी धातु की लाशों पर समुद्री जीवन फल-फूल रहा है.

जर्मनी के सेंकनबर्ग अम मीर रिसर्च इंस्टीट्यूट के मरीन बायोलॉजिस्ट आंद्रे वेदेनिन ने ROV से पूरे इलाके की तस्वीर ली. उन्होंने देखा कि ज्यादातर जीव-जंतु पुरानी मिसाइलों की धातु की बॉडी, ट्रांसपोर्ट पार्ट्स और वारहेड की खोल पर बस गए हैं. एनिमोन, स्टारफिश, हाइड्रॉइड पॉलीप्स और ब्रिसलवर्म सबसे ज्यादा दिखे. 

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कुछ जीव तो इन पुरानी धातुओं को प्राकृतिक चट्टानों से ज्यादा पसंद कर रहे थे. वेदेनिन ने कहा कि ज्यादातर जीव धातु की सतह पर चिपककर छिप रहे हैं. केवल वे जगहें खाली थीं जहां विस्फोटक पूरी तरह खुले हुए थे. उन पर बुलबुले बन रहे थे.वहां तक ब्रिसलवर्म भी नहीं गया.

केकड़े और मछलियां इन विस्फोटकों पर क्यों बस गए?

वैज्ञानिकों के मुताबिक समुद्र की गहराई में प्राकृतिक चट्टानें कम हैं. पुरानी धातु की चीजें इन जीवों को मजबूत जगह दे रही हैं जहां वे चिपक सकते हैं, छिप सकते हैं और भोजन पा सकते हैं. शिपरेक जैसे पुराने जहाजों पर भी यही होता है. लेकिन यहां तो विस्फोटक हैं. फिर भी केकड़े, मछलियां और दूसरे जीव इन पर आराम से रह रहे हैं. 

कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि ये धातु की सतह उन्हें सुरक्षित महसूस कराती है. हालांकि TNT का जहर आसपास के पानी में ज्यादा है, लेकिन सतह पर रहने वाले जीव अभी तक इससे बच रहे हैं. ये विस्फोटक अब भी बहुत खतरनाक हैं. धीरे-धीरे सड़ रहे हैं और TNT पानी में घुल रहा है. 

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ल्यूबेक बे में TNT की मात्रा बाल्टिक सागर के बाकी हिस्सों से कहीं ज्यादा है. मछलियां और केकड़े इस जहर के संपर्क में आ रहे हैं. अगर ये जहर खाद्य श्रृंखला में चला गया तो इंसानों तक पहुंच सकता है. वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि ऐसे पुराने विस्फोटक समुद्र को धीरे-धीरे जहर दे रहे हैं.

आंद्रे वेदेनिन का कहना है कि इन पुराने विस्फोटकों को हटाकर उनकी जगह सुरक्षित और मजबूत सतह वाली चीजें डाली जाएं. इससे समुद्री पर्यावरण बेहतर रहेगा और जहर रिसना भी रुक जाएगा. उन्होंने कहा कि नई कृत्रिम सतहें समुद्र के लिए संरक्षण का हथियार बन सकती हैं. हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि नई चीजें डालने से पर्यावरण बदल सकता है, लेकिन इस खास मामले में यह फायदेमंद होगा.

समुद्र ने एक बार फिर दिखा दिया कि प्रकृति मौत के ढेर पर भी जीवन बना सकती है. 16 लाख टन विस्फोटक अब केकड़ों, मछलियों और दूसरे जीवों का घर बन गए हैं. लेकिन ये घर जहर उगल रहे हैं. वैज्ञानिक अब सोच रहे हैं कि इन पुरानी मौत की चीजों को सुरक्षित तरीके से बदल दिया जाए ताकि समुद्र साफ रहे और जीव-जंतु सुरक्षित रहें.

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