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ग्रीनलैंड के सर्वोच्च शिखर पर पहली बार बारिश, बर्फ पिघलने का बड़ा खतरा

aajtak.in
  • नूक,
  • 23 अगस्त 2021,
  • अपडेटेड 11:30 AM IST
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ग्रीनलैंड के इतिहास में पहली बार उसके सर्वोच्च बर्फीले शिखर पर मूसलाधार बारिश हुई है. जिसकी वजह से वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ गई है. यहां पर अप्रत्याशित तौर पर 7 करोड़ टन पानी गिरा, जिससे बर्फ की चादरें टूट कर बिखर गई है. पिछले हफ्ते 9 घंटों तक हुई इस घटना से ग्रीनलैंड के शिखर पर एक दशक के अंदर तीसरी बार फ्रीजिंग प्वाइंट से ज्यादा तापमान हुआ है. यह आंकड़ें नेशनल साइंस फाउंडेशन समिट स्टेशन ने दिये हैं. (फोटोःगेटी)

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नेशनल साइंस फाउंडेशन समिट स्टेशन के अनुसार 10,551 फीट ऊंचे शिखर पर इससे पहले कभी इतनी बारिश रिकॉर्ड नहीं की गई. इसके पहले भी बारिश हुई है लेकिन शिखर के ऊपर कभी नहीं. आसपास के इलाकों में 1995, 2012 और 2019 में भी बारिश हुई थी, जिसकी वजह से तापमान शून्य के ऊपर चला गया था. तापमान बढ़ने का मतलब होता है ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरों का टूटना, बिखरना और पिघलना. (फोटोःगेटी)

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यूएस नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर (NSIDC) के अनुसार 14 अगस्त को हुई बारिश की वजह से 8.72 लाख वर्ग किलोमीटर के इलाके में बर्फ पिघली थी. 15 अगस्त को यह घटकर 7.54 लाख वर्ग किलोमीटर तक हो गई जबकि 16 अगस्त को घटकर 5.12 लाख वर्ग किलोमीटर तक बर्फ पिघली. यानी इन तीन दिनों में कुल मिलाकर 2.13 करोड़ वर्ग किलोमीटर इलाके में फैली बर्फ के पिघलने की घटना घटी है. तीन दिनों में यहां पर इतना पानी गिरा है, जितना 1981 से 2010 के बीच 1.86 करोड़ वर्ग किलोमीटर इलाके में फैली बर्फ पिघली थी. (फोटोःगेटी)

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NSIDC के शोधकर्ता टेड स्कैमबोस ने कहा कि 10,551 फीट ऊंचे इस शिखर पर इससे पहले इतनी ज्यादा बारिश इतिहास में कभी नहीं हुई. इस बारिश की वजह से जितनी बर्फ एक दिन में पिघली है, वह आमतौर पर ग्रीनलैंड में एक हफ्ते या साल के इसी समय में इतनी पिघलती है. बारिश में ग्लेशियर और बर्फीली जगहों की बर्फ पिघलती है. ये एक सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है लेकिन पर्यावरण में बदलाव की वजह से ग्रीनलैंड काफी तेजी से पिघल रहा है. पिछली बारिश के बाद बर्फ काफी ज्यादा पिघली जो हैरतअंगेज था. (फोटोःगेटी)

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टेड स्कैमबोस ने कहा कि पिछले एक-दो दशकों में जलवायु का पैटर्न इतना ज्यादा बदला है कि तापमान, बारिश जैसे फैक्टर्स का सही अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है. हम जलवायु और पर्यावरण दोनों को गर्म करने की सीमा पार कर चुके हैं. हम लगातार वायु प्रदूषण इतना ज्यादा बढ़ा रहे हैं कि बर्फीले इलाकों के लिए खतरा हो चुका है. (फोटोःगेटी)

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अंटार्कटिका की बर्फ की चादरें साल 2021 में भी खतरे में है. ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ की चादरें दुनिया में मौजूद साफ पानी का 99 फीसदी बनाते हैं. यानी यहां पर इतना ज्यादा साफ पानी है जो पूरी दुनिया के 99 फीसदी हिस्से को पानी की सप्लाई की जा सकती है. इस साल फरवरी में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी कि ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरें तेजी से पिघल रही हैं. इसकी वजह वैश्विक स्तर पर बढ़ रहा तापमान है. (फोटोःगेटी)

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जुलाई में ग्रीनलैंड में भयानक स्तर पर बर्फ पिघली. करीब 937 करोड़ टन बर्फ हर रोज पिघली. यह गर्मी के मौसम में सामान्य पिघलाव से दोगुना ज्यादा था. पिघलाव का यह दर करीब एक हफ्ते तक बना रहा. अगर ग्रीनलैंड की सारी बर्फ पिघल जाए तो धरती पर मौजूद सभी सागरों का पानी 20 फीट तक बढ़ जाएगा. यानी न जाने कितने द्वीप और देश डूब जाएंगे. (फोटोःगेटी)

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वैज्ञानिकों ने बताया कि ग्रीनलैंड के सर्वोच्च शिखर पर हुई बारिश की वजह है एंटीसाइक्लोन (Anticyclone). यह एक ऐसा दबाव वाला क्षेत्र होता है जिसमें हवा नीचे की तरफ दबने लगती है, जिससे वह गर्म होती चली जाती है. इसकी वजह से बारिश होती है. एंटीसाइक्लोन की वजह से किसी भी एक इलाके में गर्म मौसम काफी दिनों तक टिक सकता है. इसकी वजह से हीटवेव भी चलने लगती है. (फोटोःगेटी)

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हाल ही में यूएन के इंटरगर्वनमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) ने एक रिपोर्ट जारी की थी कि अगले 20 सालों में धरती का औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. ऐसा सिर्फ इंसानों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन की वजह से होगा. (फोटोःगेटी)
यहां पढ़ें IPCC की रिपोर्टः 20 साल में इतनी गर्मी बढ़ेगी कि इंसानों का जीना होगा मुश्किल

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इस रिपोर्ट में यूएन सेक्रेटरी जनरल एंतोनियो गुटेरेस ने कहा कि यह इंसानियत के लिए खतरे का लाल निशान है. हमें हर हालत में प्रदूषण और बढ़ते तापमान को कम करना होगा. नहीं तो पूरी दुनिया में ऐसी अलग-अलग प्राकृतिक घटनाएं होंगी जिनका अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो जाएगा. ये प्राकृतिक हादसे का रूप भी ले सकते हैं. (फोटोःगेटी)

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