मिडिल-ईस्ट में तनाव एक बार फिर चरम पर है. हाल ही में हुई अमेरिकी स्ट्राइक के बाद आग भड़क उठी है. लंबे सीजफायर के बाद अचानक होर्मुज स्ट्रेट के पास कुछ ऑयल और गैस टैंकरों पर ईरान की ओर से हमले किए गए, जिसके नतीजे में अमेरिका ने खाड़ी से सटे ईरान के कई शहरों-कस्बों पर बम बरसाए. लेकिन, इसके आगे दिलचस्प रही ईरान की प्रतिक्रिया. जाहिर है उसने जवाबी हमला तो किया, लेकिन इस बार उसके टारगेट बदल गए.
इस बार ईरान के गुस्से का शिकार वे देश नहीं बने हैं जो आमतौर पर सुर्खियों में रहते हैं. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और इजरायल जैसे पारंपरिक विरोधी इस बार सीधे तौर पर सामने नहीं हैं, बल्कि पर्दे के पीछे चले गए हैं. यूएस-ईरान के इस ताजा टकराव में अचानक कुवैत और बहरीन ईरान के मुख्य टारगेट पर आ गए हैं.
ईरान इन दोनों छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण गल्फ देशों पर लगातार हमले कर रहा है या उन्हें धमका रहा है. आखिर कुवैत और बहरीन में ऐसा क्या है जो ईरान यहां अपना गुस्सा उतार रहा है? अमेरिका के साथ इनकी पार्टनरशिप कैसी है? और गल्फ की राजनीति में इनका क्या रोल है? आइए इस पूरे मामले को बारीकी से समझते हैं.
1. UAE और इजरायल पर्दे के पीछे, कुवैत-बहरीन बने नए टारगेट
पिछले महीनों में जब भी अमेरिका और ईरान के बीच टकराव बढ़ा, तो इजरायल और यूएई हमेशा ईरान के निशाने पर रहे. इजरायल के साथ ईरान की पुरानी दुश्मनी है, और यूएई-इजरायल के बीच हुए 'अब्राहम अकॉर्ड' के बाद से ईरान और भड़का हुआ था.
लेकिन इस ताजा अमेरिकी स्ट्राइक के बाद समीकरण बदल गए हैं. यूएई और इजरायल ने इस बार बेहद सावधानी बरतते हुए खुद को सीधे टकराव से थोड़ा पीछे कर लिया है. यूएई अपनी आर्थिक स्थिति और बिजनेस हब वाली छवि को बचाने के लिए इस युद्ध में सीधे नहीं कूदना चाहता. वहीं, इजरायल भी रणनीतिक रूप से इस वक्त फ्रंट पर आने के बजाय बैक-एंड से ऑपरेट कर रहा है. और अपना पूरा ध्यान लेबनान में एंटी-हिजबुल्लाह ऑपरेशन पर लगाए हुए है.
इस वैक्यूम के बीच कुवैत और बहरीन अचानक ईरान के रडार पर आ गए हैं. ईरान को लगता है कि अमेरिका ने उस पर जो हमला किया है, उसमें इन दोनों देशों की धरती, एयरस्पेस या इंटेलिजेंस का इस्तेमाल हुआ है. यही वजह है कि ईरान ने अपना पूरा फोकस इन दोनों छोटे देशों पर शिफ्ट कर दिया है.
2. कुवैत और बहरीन में ऐसा क्या है, जिससे ईरान भड़का हुआ है?
ईरान के बेतहाशा हमलों और धमकियों के पीछे सबसे बड़ा कारण इन दोनों देशों की 'जियोग्राफिकल लोकेशन' है. बाकी गल्फ देशों (जैसे ओमान या कतर) के मुकाबले अमेरिका की कुवैत और बहरीन के साथ जो मिलिट्री और रणनीतिक पार्टनरशिप काफी खुल्लमखुल्ला है. अमेरिका ने इन दोनों देशों को अपना 'मेजर नॉन-नाटो साझेदार' घोषित कर रखा है. और यही समीकरण ईरान को चुभते हैं.
कुवैत के साथ अमेरिका के रिश्ते: कुवैत की सीमाएं इराक और सऊदी अरब से मिलती हैं और यह पर्शियन गल्फ के बिल्कुल ऊपरी हिस्से पर स्थित है. ईरान के बेहद करीब होने के कारण कुवैत सामरिक रूप से बहुत संवेदनशील जगह पर है.
1990 में जब इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला किया था, तब अमेरिका ने 'ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म' चलाकर कुवैत को आजाद कराया था. तब से कुवैत और अमेरिका का रिश्ता बेहद मजबूत है.
कुवैत में अमेरिका का 'कैम्प अरिफजान' (Camp Arifjan) है, जो मिडल ईस्ट में अमेरिकी सेना का एक बहुत बड़ा बेस है.
इसके अलावा 'अली अल सलेम एयर बेस' (Ali Al Salem Air Base) भी कुवैत में है, जहां अमेरिकी वायुसेना के फाइटर जेट्स और ड्रोन्स तैनात रहते हैं. कुवैत में हजारों की संख्या में अमेरिकी सैनिक हमेशा मौजूद रहते हैं.
बहरीन के साथ अमेरिका के रिश्ते: बहरीन एक छोटा सा आइलैंड है, जो पर्शियन गल्फ के बीच में स्थित है. इसके एक तरफ सऊदी अरब है और दूसरी तरफ ईरान. बहरीन के साथ अमेरिका की पार्टनरशिप तो और भी ज्यादा संवेदनशील है.
बहरीन में अमेरिकी नौसेना (US Navy) का फिफ्थ फ्लीट (Fifth Fleet) का हेडक्वार्टर है. यह फिफ्थ फ्लीट पूरे पार्सियन गल्फ, रेड सी और अरब सागर में अमेरिकी समुद्री ताकतों को कंट्रोल करती है.
ईरान के तेल टैंकरों और जहाजों पर नजर रखने के लिए अमेरिका इसी फिफ्थ फ्लीट का इस्तेमाल करता है.
ईरान को अच्छे से पता है कि अगर उसे अमेरिका को चोट पहुंचानी है, तो उसे बहरीन के नेवल बेस या कुवैत के मिलिट्री बेस को डराना होगा. बाकी गल्फ देश जैसे सऊदी अरब अब अमेरिका पर अपनी निर्भरता थोड़ी कम कर रहे हैं, लेकिन कुवैत और बहरीन आज भी पूरी तरह अमेरिकी सुरक्षा कवच पर टिके हैं. और इन दोनों देशों में बने अमेरिकी बेस ईरान को हमेशा सॉफ्ट टारगेट बनाए रखेंगे.
3. गल्फ पॉलिटिक्स में कहां हैं कुवैत और बहरीन?
गल्फ पॉलिटिक्स में कुवैत और बहरीन का स्टैंड हमेशा से ईरान को खटकता रहा है.
बहरीन गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) का एक ऐसा सदस्य है, जिसने ईरान की विस्तारवादी नीतियों का हमेशा खुलकर विरोध किया है. बहरीन ने सऊदी अरब का हमेशा साथ दिया है और ईरान समर्थित ग्रुप्स को अपने देश में बैन कर रखा है. बहरीन ने इजरायल के साथ भी अपने रिश्ते सामान्य किए हैं, जिससे ईरान बेहद नाराज है.
कुवैत आमतौर पर मिडल ईस्ट की राजनीति में एक न्यूट्रल या मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश करता है. वह विवादों से दूर रहता है. लेकिन जब बात सुरक्षा की आती है, तो कुवैत चुपचाप अमेरिका और सऊदी अरब के पाले में खड़ा हो जाता है. ईरान को कुवैत का यह 'दोमुंहा रुख' पसंद नहीं है. ईरान का मानना है कि कुवैत खुद को न्यूट्रल कहता है, लेकिन अमेरिकी सेना को अपने यहां पनाह देकर ईरान के खिलाफ साजिश रचता है.
4. मजहबी खींचतान
कुवैत और बहरीन का जो धार्मिक और राजनीतिक ढांचा है, वह बाकी अरब दुनिया से काफी अलग और पेचीदा है. यही पेचीदगी ईरान को इन देशों के अंदर दखल देने का मौका देती है.
बहरीन की सबसे बड़ी खासियत (या कमजोरी) यह है कि यहां की बहुसंख्यक आबादी (लगभग 60-65%) शिया मुस्लिम है, लेकिन यहां का सल्तनत सुन्नी अल-खलीफा परिवार के पास है. उधर, ईरान एक शिया बहुल देश है और वह खुद को दुनिया भर के शियाओं का लीडर मानता है.
ईरान हमेशा बहरीन की शिया आबादी को वहां की सुन्नी सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश करता रहता है. 2011 की 'अरब स्प्रिंग' के दौरान भी बहरीन में शियाओं ने बड़ा विद्रोह किया था, जिसे सऊदी अरब की सेना ने आकर कुचला था. ईरान को लगता है कि बहरीन पर हमला करके या वहां तनाव बढ़ाकर वह वहां की शिया जनता की हमदर्दी जीत सकता है.
उधर, कुवैत में सुन्नी मुस्लिम बहुमत में हैं, लेकिन वहां की कुल आबादी में लगभग 30% शिया मुस्लिम भी रहते हैं. बाकी खाड़ी देशों (जैसे सऊदी अरब) के मुकाबले कुवैत में शिया और सुन्नियों के बीच रिश्ते काफी बेहतर रहे हैं और कुवैत की संसद में शियाओं को प्रतिनिधित्व भी मिला हुआ है.
कुवैत की एक और खासियत है वहां की पार्लियामेंट. बाकी खाड़ी देशों में बादशाह का हुक्म चलता है, लेकिन कुवैत में खाड़ी देशों की सबसे मजबूत और एक्टिव संसद है, जहां खुलकर बहस होती है.
ईरान को डर रहता है कि कुवैत का यह लोकतांत्रिक और थोड़ा खुला हुआ ढांचा कहीं अमेरिका के प्रभाव में आकर ईरान के खिलाफ कोई बड़ा कानून या प्रस्ताव पास न कर दे. साथ ही, कुवैत की शिया आबादी को अपने पाले में करने के लिए ईरान वहां भी अपने स्लीपर सेल्स और प्रॉक्सी नेटवर्क को एक्टिव करने की कोशिश करता रहता है.
5. शिफ्ट हुआ डेंजर जोन
यूएस स्ट्राइक के बाद ईरान का गुस्सा कुवैत और बहरीन पर निकलना कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है. ईरान ने उन कमजोर कड़ियों को चुना है जहां अमेरिकी सेना के सबसे महत्वपूर्ण ठिकाने मौजूद हैं.
कुवैत के अमेरिकी एयर बेस और बहरीन में मौजूद यूएस नेवी का फिफ्थ फ्लीट अमेरिका के लिए लाइफलाइन की तरह हैं. इन दोनों देशों पर दबाव बनाकर ईरान असल में अमेरिका को यह संदेश देना चाहता है कि अगर ईरान पर कोई और हमला हुआ, तो अमेरिका के ये दोनों सबसे करीबी गल्फ पार्टनर्स सुरक्षित नहीं रहेंगे. बहरीन का नाजुक शिया-सुन्नी बैलेंस और कुवैत की अमेरिकी निर्भरता ने इन दोनों देशों को इस वक्त मिडल ईस्ट के सबसे खतरनाक डेंजर जोन में लाकर खड़ा कर दिया है.
धीरेंद्र राय