TMC के लिए भवानीपुर की हार से क्यों ज्यादा गंभीर है फलता का नतीजा

भवानीपुर सीट पर शुभेंदु अधिकारी का ममता बनर्जी को हरा देना वाकई बड़ी उपलब्धि थी. एक सीएम की अपनी सीट गंवा देना सरकार के खिलाफ नाराजगी का परिचय हो सकता है. लेकिन, फलता का नतीजा टीएमसी के संगठन की नाकामी का फल है. पार्टी ऑर्गेनाइजेशन में सबसे पावर अभिषेक बनर्जी के गढ़ में सेंध.

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फलता के नतीजे ने तृणमूल कांग्रेस संगठन की कमजोरी को और उजागर कर दिया. फलता के नतीजे ने तृणमूल कांग्रेस संगठन की कमजोरी को और उजागर कर दिया.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 25 मई 2026,
  • अपडेटेड 1:24 PM IST

पश्चिम बंगाल में फलता विधानसभा सीट पर हुए पुनर्मतदान के नतीजों ने पूरे राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार देबांशू पांडा ने इस सीट पर 1.09 लाख से भी ज्यादा वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की है. यह जीत सिर्फ भाजपा की मजबूती को नहीं दिखाती, बल्कि 15 साल सत्ता में बैठी रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए एक ऐसा बड़ा झटका है जिसने पार्टी के भीतर एक गंभीर संकट का इशारा कर दिया है. जहां टीएमसी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई. ये प्रत्याशी कोई और नहीं, टीएमसी संगठन में सबसे पावरफुल अभिषेक बनर्जी के राइट हैंड मैन कहे जाने वाले जहांगीर खान थे. जिन्होंने आखिरी वक्त मुकाबले से खुद को अलग कर लिया, और अपना वोट भी नहीं डाला.

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ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि टीएमसी के लिए ममता बनर्जी की सीट भवानीपुर की हार ज्यादा गंभीर थी, या फलता का नतीजा? भवानीपुर में होने वाले किसी भी राजनैतिक उतार-चढ़ाव को लोग अक्सर ममता बनर्जी के पर्सनल जादू और शहर के वोटर्स के मिजाज से जोड़कर देखते हैं, जहां हार-जीत का अंतर कभी-कभी पार्टी की ढिलाई की वजह से बदल सकता है. लेकिन फलता की हार तृणमूल कांग्रेस की उस 'ग्रासरूट मशीनरी' यानी जमीनी संगठन की नाकामी को सामने लाती है, जिसके दम पर पार्टी पिछले कई सालों से बंगाल पर राज कर रही है. यह हार इसलिए भी ज्यादा चुभने वाली है क्योंकि फलता सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के 'नंबर दो' और ममता के उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के लोकसभा क्षेत्र 'डायमंड हार्बर' का एक मुख्य हिस्सा है.

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इस क्षेत्र के पुराने इतिहास को देखें तो दक्षिण 24 परगना जिला हमेशा से टीएमसी का सबसे मजबूत और अभेद्य गढ़ रहा है. इस जिले ने हमेशा तृणमूल कांग्रेस का बढ़-चढ़कर साथ दिया है. साल 2024 के लोकसभा चुनावों में, जब अभिषेक बनर्जी ने डायमंड हार्बर सीट से रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की थी, तब इसी फलता विधानसभा क्षेत्र ने उन्हें अकेले 1.68 लाख वोटों की बड़ी लीड दी थी. उस चुनाव में अभिषेक बनर्जी का वोट शेयर फलता में लगभग 89% था, यानी  एकतरफा मुकाबला. लेकिन, सिर्फ दो साल के भीतर तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर सिर्फ 3.7% पर आ जाना और पार्टी उम्मीदवार का चौथे नंबर पर खिसककर अपनी जमानत तक गंवा देना, किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिए बहुत बड़ी नाकामी है. फलता सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है, बल्कि यह वह इंडस्ट्रियल और ग्रामीण इलाका है जहां टीएमसी का बूथ मैनेजमेंट सबसे अचूक माना जाता था. इस सीट पर मिली करारी हार यह साफ करती है कि पार्टी का वह जमीनी ढांचा, जो कभी हर वोटर के घर तक पकड़ रखता था, अब पूरी तरह से बिखर चुका है.

अभिषेक का 'डायमंड हार्बर मॉडल' ध्वस्त

यह हार सीधे तौर पर टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की राजनैतिक साख और उनकी लीडरशिप पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है. अभिषेक बनर्जी लगातार खुद को पार्टी के मॉडर्नाइजेशन और पार्टी ऑर्गेनाइजेशन में खुद को नए के लीडर के रूप में पेश करते रहे हैं. उन्होंने बार-बार 'डायमंड हार्बर मॉडल' की तारीफ की है. एक ऐसा मॉडल जिसे वे अच्छे गवर्नेंस, तुरंत एक्शन और अचूक चुनावी रणनीति का प्रतीक बताते थे. चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में, 2 मई को अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय नेतृत्व और भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कहा था कि भाजपा को उनके डायमंड हार्बर मॉडल में एक मामूली खरोंच लगाने के लिए भी 10 जन्म लेने होंगे, और अगर हिम्मत है तो दिल्ली से अपने नेताओं को बुलाकर फलता में मुकाबला करके दिखाएं. इस तरह की आक्रामक चुनौती के बाद जब नतीजे पूरी तरह उल्टे आते हैं, तो राजनैतिक नुकसान सिर्फ एक सीट का नहीं होता, बल्कि नेता की साख पूरी तरह प्रभावित हो जाती है.

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शुभेंदु अधिकारी ने इस नतीजे के तुरंत बाद तंज कसते हुए कहा कि कुख्यात 'डायमंड हार्बर' मॉडल अब तृणमूल के 'हार-बार' मॉडल में बदल चुका है. फलता की हार ने यह साबित कर दिया है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की 35 कंपनियों की तैनाती और कड़े इलेक्शन मैनेजमेंट के बीच, जब सरकारी मशीनरी का अनुकूल सहयोग मुमकिन नहीं हो पाता, तब संगठन की असली परीक्षा होती है. यह नतीजा अभिषेक बनर्जी के उस दावे को कमजोर करता है कि उनका संगठन बिना किसी अतिरिक्त मदद के भी अजेय है.

अंतर्कलह का अंत नहीं

इसके साथ ही, फलता के नतीजे टीएमसी के भीतर पिछले काफी समय से चल रहे 'पुराने वफादार बनाम नए कॉर्पोरेट-शैली के रणनीतिकार' के अंदरूनी संघर्ष को और ज्यादा तेज करेंगे. ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा से संघर्ष करने, सड़क पर उतरकर आंदोलन करने और जमीनी स्तर के पुराने नेताओं को साथ लेकर चलने पर टिकी रही है. इसके उलट, अभिषेक बनर्जी पर उन्हीं की पार्टी के लोग आरोप लगा रहे हैं कि उनका मॉडल कॉर्पोरेट इलेक्शन मैनेजमेंट, डेटा एनालिटिक्स और पारंपरिक नेताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को आगे बढ़ाने की वकालत करता है. फलता की इस ऐतिहासिक पराजय से पार्टी के भीतर ममता बनर्जी के पुराने खेमे को अभिषेक के खिलाफ मुंह खोलने का एक और मौका मिल गया है. पार्टी के भीतर यह आवाजें उठने लगी हैं कि संगठन के फैसलों से पुराने और जमीनी नेताओं को साइडलाइन करने का नतीजा ही फलता में देखने को मिला है.

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ममता की चुनौती अभिषेक को बचाना

चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में टीएमसी उम्मीदवार का अचानक पीछे हटने की घोषणा करना यह इशारा करता है कि लोकल लीडरशिप और शीर्ष नेतृत्व के रणनीतिकारों के बीच गहरा अविश्वास था. ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है. एक तरफ उन्हें अपने घोषित उत्तराधिकारी की साख को बचाना है, तो दूसरी तरफ पार्टी के बिखरते जा रहे कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं की नाराजगी को दूर करना है. भवानीपुर की जीत या हार ममता के अपने कंट्रोल में होती है, लेकिन फलता का बिखरना यह दिखाता है कि पार्टी पर उनकी पकड़ के बावजूद ऑर्गेनाइजेशन पर कंट्रोल कमजोर हो रहा है.

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू मतगणना के दिन तृणमूल की गैरमौजूदगी रही. टीएमसी जैसी मजबूत पार्टी का मतगणना केंद्रों पर अपने काउंटिंग एजेंट तक तैनात न कर पाना कार्यकर्ताओं के मनोबल के पूरी तरह टूटने का सबूत है. हालांकि अभिषेक बनर्जी ने हार के बाद इलेक्शन कमीशन पर गड़बड़ी का आरोप लगाया और दावा किया कि टीएमसी कार्यकर्ताओं को परेशान किया गया. कार्यकर्ताओं के बीच संदेश यह गया है कि अगर लीडरशिप उनके अपने ही सबसे सुरक्षित गढ़ में उनकी सुरक्षा और राजनैतिक अस्तित्व पक्का नहीं कर सकती, तो आने वाले बड़े चुनावों में वे पूरी तरह असुरक्षित हैं. जब एक मजबूत किले में पार्टी का वोट शेयर 89% से गिरकर सिर्फ 3.7% हो जाता है, तो कार्यकर्ता इसे सिर्फ एक चुनावी हार नहीं, बल्कि नेतृत्व का सरेंडर मानते हैं. इससे दक्षिण 24 परगना सहित दूसरे जिलों में भी नीचे के स्तर के कार्यकर्ताओं में निष्क्रियता या पार्टी छोड़ने (दलबदल) की प्रवृत्ति बढ़ने की प्रबल आशंका है.

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लेफ्ट और कांग्रेस का उभार

फलता के नतीजों ने पश्चिम बंगाल की विपक्षी राजनीति के समीकरण को भी पूरी तरह से बदल दिया है. इस उपचुनाव में माकपा (सीपीआई-एम) का दूसरे स्थान पर आना और कांग्रेस का तीसरे स्थान पर रहना टीएमसी के कोर वोट बैंक में सेंधमारी का साफ संकेत है. टीएमसी की सत्ता मुस्लिम और ग्रामीण वोटों के एकतरफा ध्रुवीकरण पर टिकी रही. लेकिन, लेफ्ट और कांग्रेस का उभार यह दिखाता है कि सत्ता विरोधी (एंटी-इंकंबेंसी) मत अब केवल भाजपा तक सीमित नहीं हैं. बल्कि वे एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प की ओर भी मुड़ रहे हैं. यह टीएमसी के लिए एक बड़ा रणनीतिक खतरा है. दूसरी ओर, भाजपा के लिए फलता की यह जीत एक संजीवनी बूटी की तरह है, जिसने उनके कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंक दिया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस जीत को 'डराने-धमकाने पर लोकतंत्र की विजय' बताया है, जो यह दिखाता है कि भाजपा इस बेहद लोकल नतीजे का उपयोग राज्य स्तर पर टीएमसी के खिलाफ एक बड़े हथियार के रूप में करने जा रही है.

आखिर में, भवानीपुर की हार या जीत केवल ममता बनर्जी के प्रभाव तक सीमित होती है, लेकिन फलता की हार टीएमसी की जमीनी मशीनरी की 'फेलियर' यानी ऑर्गेनाइजेशन की नाकामी का सबूत बन जाती है. यह नतीजा साबित करता है कि पार्टी का अंदरुनी सिस्टम भीतर से कमजोर हो रहा है और बीजेपी के कड़े इलेक्शन मैनेजमेंट के सामने टिकने में नाकाम है. यह हार एक बड़ी चेतावनी है कि राजनीति में सिर्फ आक्रामक बयानबाजी नहीं, बल्कि जमीनी वफादारी और संगठन में तालमेल ही पार्टी की साख को बचाए रखता है.

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