नए गठबंधनों की कवायद, जातीय समीकरण दुरुस्त करने की कोशिशें… यूपी चुनाव में बीजेपी का मुकाबला किससे

यूपी के विधानसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम समय बाकी रह गया है. नए गठबंधनों की कवायद अंगड़ाई ले रही है, तो वहीं जातीय समीकरण दुरुस्त करने की कोशिशें भी शुरू हो गई हैं.

Advertisement
2027 की शुरुआत में होने हैं यूपी चुनाव (Photo: PTI) 2027 की शुरुआत में होने हैं यूपी चुनाव (Photo: PTI)

बिकेश तिवारी

  • नई दिल्ली,
  • 18 जून 2026,
  • अपडेटेड 4:43 PM IST

'दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है और लखनऊ की सत्ता का पूर्वांचल से' यह सिर्फ कहावत नहीं अतीत रहा है. इस अतीत को आईने की तरह देखें, तो नजरें टिक जाती हैं 2027 के यूपी चुनाव पर. कुछ ही महीने बचे हैं, जब यूपी की चुनावी बिसात पर सियासत के प्रमुख चेहरे एक-दूसरे को मात देने के लिए पूरा जोर लगाते नजर आएंगे. यह चुनाव 2029 के आम चुनाव से पहले यूपी और केंद्र की सत्ता पर काबिज राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की अगुवाई कर रही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए बड़ा टेस्ट माना जा रहा है.

Advertisement

अब सवाल है कि महारथियों से सजी बीजेपी का मुकाबला यूपी में आखिर किससे है. आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे में 2017 से ही बीजेपी की सरकार है. लोकसभा चुनाव में चार सौ पार का नारा देकर मैदान में उतरी बीजेपी अकेले दम 250 का आंकड़ा भी नहीं छू सकी थी और 240 सीट पर सिमट गई थी. तब भी सबसे ज्यादा चर्चा यूपी की ही हुई थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में अकेले दम सूबे की 80 में 71 और 2019 में 62 सीटें जीतने वाली बीजेपी 2024 में 33 सीटों पर आ गई. प्रदेश में विपक्षी इंडिया ब्लॉक की अगुवाई कर रही सपा 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी.

तब ऐसा कहा जाने लगा कि मोदी मैजिक अब फीका पड़ने लगा है. धारणा बनने लगी कि 2014 के चुनाव में जीत के बाद विजय रथ पर सवार बीजेपी को चुनावी शिकस्त देने का फॉर्मूला विपक्षी दलों ने खोज लिया है. विपक्षी दल बढ़े मनोबल के साथ राज्यों के चुनाव में गए. बीजेपी ने पहले हरियाणा, फिर महाराष्ट्र में बड़ी जीत के साथ नैरेटिव की दिशा ही मोड़ दी. इसके बाद तो जैसे बीजेपी के चुनावी अश्वमेध का घोड़ा फिर से निर्बाध दौड़ पड़ा. हाल ही में असम में बीजेपी ने जीत की हैट्रिक लगाई और पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार बनाई. 

Advertisement

एक के बाद जीत से बढ़े मनोबल के साथ बीजेपी का पूरा ध्यान अब लगातार तीसरी बार यूपी फतह पर है. लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव का पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूला सफल रहा था और बीजेपी ने पंकज चौधरी के रूप में दलित नेता को यूपी में संगठन की कमान सौंप रखी है. इसे दलित समाज को संदेश देने की रणनीति से जोड़कर भी देखा जाता है. लखनऊ के कंसा पासी किला विवाद से भी सपा पीडीए के डी और ए के बीच फंसती नजर आ रही है. सपा के साथ गठबंधन है, फिर भी कांग्रेस असदुद्दीन ओवैसी और चंद्रशेखर के साथ गठबंधन के विकल्प तलाश रही है.

ओवैसी ने गठबंधन के लिए अपने दरवाजे खुले रखे हैं, लेकिन यह शर्त भी रख दी है- हमें पूरा सम्मान और बराबरी का दर्जा मिले. अखिलेश यादव की अगुवाई वाली सपा अब विजन इंडिया के जरिये युवा, उद्यमी और महिला मतदाताओं को अपने पाले में करने की रणनीति पर भी काम करते दिख रही है. विपक्षी दलों के बीच वोटों का नया गणित गढ़ने की छटपटाहट नजर आ रही है, लेकिन गठबंधन के उलझे गणित और कांग्रेस की ताजा कवायद से भ्रम की स्थिति बन गई है. बीजेपी के नेताओं के सुर कुछ वैसे लग रहे हैं, जैसे मोटिवेशन के लिए यह लाइन बोली जाती है- मेरा मुकाबला सिर्फ मुझसे है, किसी और से हारना मेरी फितरत नहीं.

Advertisement

लोकसभा चुनाव 2024 के बाद हुए चुनावों में नतीजे कुछ ऐसे ही रहे भी हैं, लेकिन यूपी में कहानी थोड़ी अलग है. पूर्वांचल हो या पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड हो या अवध, यूपी के हर रीजन का मिजाज अलग है. अलग-अलग जिलों में वर्चस्व की लड़ाई पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है. डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने 2024 की चुनावी जंग में पिछड़ने के बाद कहा था- संगठन, सरकार से बड़ा होता है. इसे संगठन और सरकार के बीच भी वर्चस्व की जंग से जोड़ा गया. बीजेपी के सामने 10 साल की सरकार के खिलाफ एंटी इन्कम्बेंसी होगी ही, विपक्ष के व्यूह को भेदने और तीसरी बार यूपी फतह करने के लिए संगठन और सरकार के चेहरों में वर्चस्व की जंग से भी पार पाना होगा.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »