पासपोर्ट सिर्फ 'टिकट', वोटर आईडी बस एक 'पर्ची', आधार ‘निराधार’: फिर हम भारत के नागरिक कैसे?

एक आजाद देश की सबसे छोटी इकाई होती है उस देश के नागरिक, यानी सिटीजन. भारत में कहने को 140 करोड़ लोग निवास करते हैं. सब नागरिक हैं. लेकिन उनके पास नागरिकता का सबूत नहीं है. आजादी के करीब 80 साल बाद भी नागरिकता के सवाल पर कन्फ्यूजन क्यों है?

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भारतीयों के पास सरकारी दस्तावेजों की कमी नहीं, लेकिन नागरिकता का सबूत बताने वाला दस्तावेज एक भी नहीं. (फोटो - AI generated) भारतीयों के पास सरकारी दस्तावेजों की कमी नहीं, लेकिन नागरिकता का सबूत बताने वाला दस्तावेज एक भी नहीं. (फोटो - AI generated)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 26 जून 2026,
  • अपडेटेड 11:53 AM IST

क्या आप भारत के नागरिक हैं? आप कहेंगे- 'हां, बिल्कुल हूं! मेरे पास वोटर आईडी है, पासपोर्ट है, ड्राइविंग लाइसेंस है और टैक्स भरने के लिए पैन कार्ड भी है.' लेकिन जरा रुकिए. अगर सरकार कह दे कि आपके पास मौजूद इन दस्तावेजों में से कोई भी इस बात का कानूनी सबूत नहीं है कि आप भारत के नागरिक हैं, तो आपका सिर चकराएगा या नहीं?

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भारत के करोड़ों नागरिक तमाम तरह के सरकारी पहचान पत्रों के दम पर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी चला रहे हैं, चुनाव में वोट डाल रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि उनके पास अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कोई एक भी ऐसा 'सिंगल डेडिकेटेड' सरकारी दस्तावेज नहीं है, जिस पर साफ अक्षरों में लिखा हो- "यह प्रमाणित किया जाता है कि अमुक व्यक्ति भारत का नागरिक है."

यह सवाल और यह बहस हाल ही में तब और गंभीर हो गई, जब खुद भारत सरकार ने अपने आधिकारिक बयान में यह साफ किया कि पासपोर्ट केवल एक 'ट्रेवेल डॉक्यूमेंट' यानी यात्रा का दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण नहीं. सरकार का यह तर्क तकनीकी रूप से सही भी है क्योंकि भारत के पासपोर्ट का इस्तेमाल भारत में रह रहे निर्वासित तिब्बती नागरिक भी विशेष परिस्थितियों में यात्रा के लिए करते आए हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि हम जिस देश में पैदा हुए, पले-बढ़े, जहां की मिट्टी में हमारे पुरखों की अस्थियां मिलीं, वहां हमारी नागरिकता का अंतिम और पुख्ता सबूत क्या है?

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संविधान निर्माताओं का विजन और सरकारों का शॉर्टकट

जब 1947 में देश का विभाजन हुआ, तब स्थितियां बेहद अशांत और अनिश्चित थीं. लाखों लोग सीमा पार से इधर आ रहे थे, और लाखों यहां से उधर जा रहे थे. ऐसे माहौल में नागरिकता की कोई स्थायी और अंतिम परिभाषा तय करना लगभग असंभव था.

संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5 से 11) में नागरिकता को लेकर जो प्रावधान किए गए, वे मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित थे कि 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय कौन-कौन लोग भारत के नागरिक माने जाएंगे. इन अनुच्छेदों ने तत्कालीन परिस्थितियों के हिसाब से पात्रता तो तय कर दी, लेकिन उन्होंने 'नागरिकता' शब्द को भविष्य के लिए हमेशा-हमेशा के लिए परिभाषित नहीं किया. संविधान निर्माताओं को पता था कि समय बदलेगा, देश की जरूरतें बदलेंगी. इसलिए संविधान के अनुच्छेद 11 ने देश की संसद को यह विशेष शक्ति (पार्लियामेंट्री पावर) दे दी कि वह भविष्य में कानून बनाकर नागरिकता के अधिकार को रेगुलेट कर सकती है.

इस संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए संसद ने 'नागरिकता अधिनियम, 1955' (The Citizenship Act of 1955) पारित किया. यह कानून बताता है कि भारत की नागरिकता कैसे हासिल की जा सकती है (जैसे जन्म से, वंश से, पंजीकरण से या नेचुरलाइजेशन से) और यह कैसे खत्म हो सकती है. लेकिन इस कानून के बनने के बाद भी, आने वाली सरकारों ने कभी भी आम जनता को 'नागरिकता का प्रमाण पत्र' बांटने की जहमत नहीं उठाई. सरकारों ने तात्कालिक जरूरतों के लिए शॉर्टकट अपनाए. उन्होंने राशन कार्ड बनवाए ताकि अनाज मिल सके, वोटर आईडी कार्ड बनवाए ताकि वोट पड़ सकें. ड्राइविंग लाइसेंस दिए. लेकिन उन अधिकारों की बुनियाद यानी 'नागरिकता का मूल सर्टिफिकेट' देने की व्यवस्था को ठंडे बस्ते में डाल दिया.

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घुसपैठ का मुद्दा: जिसने पहचान को ही 'संदिग्ध' बना दिया

नागरिकता के इस पूरे विवाद और कन्फ्यूजन के पीछे जो सबसे बड़ा और कड़वा सच छिपा है, वह है- अवैध घुसपैठ. पिछले कुछ दशकों में बांग्लादेश-म्यांमार से लाखों की संख्या में अवैध घुसपैठिए भारत में दाखिल हुए और यहीं के समाज का हिस्सा बन गए.

इस घुसपैठ ने भारत में 'सिटीजनशिप सर्टिफिकेट' के सवाल को बेहद पेचीदा और चुनौतीपूर्ण बना दिया. जबकि, पड़ोसी देशों पाकिस्तान और बांग्लादेश में इसके लिए अलग से व्यवस्था है. घुसपैठियों ने भारत में टिके रहने के लिए सबसे पहले यहां के प्रशासनिक ढीलेपन का फायदा उठाया. स्थानीय दलालों, भ्रष्ट अधिकारियों और कुछ राजनीतिक दलों के वोट बैंक के लालच की बदौलत इन घुसपैठियों ने बहुत आसानी से राशन कार्ड, वोटर आईडी, आधार कार्ड और यहां तक कि पासपोर्ट भी हासिल कर लिए. नतीजा यह हुआ कि जो दस्तावेज एक वैध भारतीय नागरिक के होने चाहिए थे, वे घुसपैठियों के पास भी पहुंच गए.

सरकारों के सिस्टम और अधूरी सूचियों का खेल

समय-समय पर भारत की सरकारों ने नागरिकों की सूची बनाने और उनके डेटा को सहेजने के लिए कई तरह के सिस्टम और प्रयोग किए. चुनावी राजनीति के लिए 'वोटर लिस्ट' बनाई गई, जिसे हर चुनाव से पहले अपडेट किया जाता है. सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए पहचान पत्र जारी किए गए. टैक्स चोरी रोकने के लिए पैन कार्ड लाया गया. लेकिन इनमें से किसी भी सिस्टम को इस नीयत से डिजाइन ही नहीं किया गया था कि वह देश के वैध नागरिकों का एक अलग से डेटाबेस तैयार कर सके.

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वोटर आईडी कार्ड को ही ले लीजिए. बॉम्बे हाई कोर्ट से लेकर गुवाहाटी हाई कोर्ट तक कई मामलों में यह टिप्पणी कर चुके हैं कि महज वोटर लिस्ट में नाम होना या वोटर आईडी कार्ड होना इस बात का अचूक प्रमाण नहीं है कि आप भारत के नागरिक हैं. क्योंकि विदेशी घुसपैठिए भी स्थानीय सांठगांठ से ये कार्ड बनवा लेते हैं. सरकारों का पूरा सिस्टम हमेशा 'सर्विस डिलीवरी' और 'आइडेंटिटी' के इर्द-गिर्द घूमता रहा, 'नागरिकता' सर्टिफाई करने के इर्द-गिर्द नहीं.

NPR-NCR का नाम लेते ही बवाल

जब-जब सरकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर नागरिकों का एक प्रामाणिक रजिस्टर (जैसे NRC या NPR) बनाने की कोशिश की, देश में बवाल खड़ा हो गया. इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि सरकारें खुद तय नहीं कर पाईं कि नागरिकता साबित करने का पैमाना क्या होगा? क्या जमीन के पुराने कागजात, या दादा-परदादा के जन्म का सर्टिफिकेट? भारत जैसे देश में, जहां आज भी करोड़ों आबादी निरक्षर है, जहां बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं में लोगों के घर और कागजात बह जाते हैं, वहां दशकों पुराने दस्तावेजी सबूत मांगना अपने आप में एक प्रताड़ना बन जाता है. विवाद इसी बात पर आकर टिक जाता है कि आखिर देश में रह रहे इंसानों में से वैध नागरिक कौन है और अवैध कौन? और इस बारीक लकीर को खींचने का कोई पारदर्शी और सरल सिस्टम आज तक सरकारें नहीं बना सकी हैं.

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इस मुद्दे पर सरकार से ज्यादा कन्फ्यूजन लोगों में दिखा. देश के नागरिकों की पहचान के लिए मोदी सरकार ने जब NRC और NPR को लेकर भूमिका बनाई तो देशभर में बवाल हो गया. खूब प्रदर्शन हुए. कहा गया कि यह नागरिकों की पहचान से ज्यादा घुसपैठियों की आड़ में मुसलमानों को देश से बेदखल करने की मुहिम है. नतीजे में सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े.

नागरिकता सर्टिफिकेट देने वाला भारत अकेला नहीं

इस बहस का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि दुनिया के ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में नागरिकता का कोई एक 'सिंगल डेडिकेटेड डॉक्यूमेंट' अलग से नहीं दिया जाता. दुनिया की अधिकांश आबादी पर नागरिकता का यही कानून लागू होता है कि वे जिस देश की धरती पर पैदा हुए हैं (Jus Soli) या उनके माता-पिता जिस देश के नागरिक रहे हैं (Jus Sanguinis), वे स्वाभाविक रूप से वहां के नागरिक मान लिए जाते हैं.

विकसित देशों में उनका 'बर्थ सर्टिफिकेट' या सोशल सिक्योरिटी नंबर ही उनकी नागरिकता और पहचान का सबसे बड़ा आधार बन जाता है. लेकिन भारत की समस्या यह है कि यहां जन्म और मृत्यु के रजिस्ट्रेशन का सिस्टम ही पिछले कुछ दशकों में दुरुस्त हुआ है. 1980 या उससे पहले पैदा हुए करोड़ों भारतीयों के पास आज भी कोई आधिकारिक बर्थ सर्टिफिकेट नहीं है. जब मूल ढांचा ही गायब हो, तो वैश्विक नियमों की दुहाई देकर पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता.

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संवैधानिक प्रस्तावना, मौलिक अधिकार और दस्तावेजों की पेंचीदगी

संविधान देश के नागरिकों के कल्याण की बात तो करता है और उन्हें कुछ बेहद खास मौलिक अधिकार (जैसे अनुच्छेद 15, 16, 19, 29 और 30) भी देता है, जो केवल और केवल भारत के नागरिकों को ही प्राप्त हैं; किसी विदेशी को नहीं. इन मौलिक अधिकारों के इस्तेमाल के लिए सरकारें कुछ ऐसे दस्तावेज जारी करती हैं जो सिर्फ नागरिकों के लिए ही आरक्षित हैं- जैसे वोट देने का अधिकार या संवैधानिक पदों पर बैठने की पात्रता.

लेकिन विडंबना देखिए, समय के साथ इन दस्तावेजों के साथ कानूनी और प्रशासनिक पेचीदगियां जुड़ती चली गईं. एक तरफ संविधान आपको नागरिक मानकर मौलिक अधिकार दे रहा है, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक व्यवस्था आपके पास मौजूद हर दस्तावेज पर संदेह कर रही है. पासपोर्ट को ट्रेवेल डॉक्यूमेंट बता दिया जाता है, वोटर आईडी को चुनावी दस्तावेज, और अन्य पहचान पत्रों को केवल पहचान का साधन. इस पेंचीदगी ने आम भारतीय नागरिक को एक ऐसी पार्टी में लाकर खड़ा कर दिया है, जिसे वे एंजॉय तो कर सकते हैं लेकिन उनके पास दिखाने के लिए इन्विटेशन कार्ड नहीं है.

सिटीजनशिप सर्टिफिकेट' देना क्यों मुश्किल है?

अब सवाल यह उठता है कि भारत सरकार के लिए देश के सभी नागरिकों को एक स्पष्ट 'नागरिकता प्रमाण पत्र' जारी करना इतना मुश्किल क्यों है? और क्यों देश के एक बड़े वर्ग को यह पूरी कवायद ही गैर-जरूरी और खतरनाक लगती है?

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विशाल आबादी और लचर रिकॉर्ड: 140 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले इस देश में हर व्यक्ति के वंशवृक्ष और जन्म के रिकॉर्ड की प्रामाणिकता जांचना एक ऐसा प्रशासनिक दुःस्वप्न है, जिसे पूरा करने में दशकों लग जाएंगे और अरबों रुपये स्वाहा हो जाएंगे.

ऐतिहासिक गलतियां और विस्थापन: देश ने विभाजन, आंतरिक विस्थापन, और कई तरह की आपदाएं देखी हैं. 1971 वॉर के दौरान बांग्लादेश से बड़ी आबादी का भारत में विस्थापन, और फिर असम जैसे राज्यों में दशकों से चली आ रही घुसपैठ की समस्या ने इस मामले को इतना संवेदनशील बना दिया है कि यहां कोई भी प्रशासनिक कदम सीधे तौर पर मानवाधिकारों और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करता है.

गैर-जरूरी का तर्क: कई विशेषज्ञों और नागरिकों का मानना है कि जब एक व्यक्ति पिछले 40-50 वर्षों से यहीं रह रहा है, यहीं टैक्स दे रहा है, यहीं राशन ले रहा है और सरकारें उसकी पहचान के आधार पर ही उसे योजनाएं दे रही हैं, तो अचानक एक नए कागज के टुकड़े के लिए उसे लाइनों में खड़ा करना पूरी तरह से गैर-जरूरी है. यह पैसे और प्रशासनिक ऊर्जा की बर्बादी तो है ही. साथ ही नागरिकों के मन में बेवजह अविश्वास पैदा करने जैसा है.

जब तक हमारी सरकारें और हमारा कानूनी तंत्र मिलकर एक ऐसा सरल, सर्वस्वीकार्य और पारदर्शी सिस्टम नहीं बनाते, जो बिना किसी आम नागरिक को प्रताड़ित किए, देश की सुरक्षा से समझौता किए बिना राष्ट्रीयता की अचूक गारंटी दे सके, तब तक हम तकनीकी रूप से 'सिटिजन ऑफ कन्फ्यूज नेशन' ही कहलाएंगे.

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