सेना की मदद से होगी CBSE की 21 जून की री-नीट परीक्षा, ये सिस्टम का 'सरेंडर' नहीं तो और क्या है?

21 जून की परीक्षा की जो तैयार‍ियां हो रहीं, उससे एक नजर में तो ऐसा लगता है कि सरकार परीक्षा की शुचिता को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' मोड में है. लेकिन अगर इस व्यवस्था की तह में जाकर देखें, तो यह किसी सुधार की जीत नहीं, बल्कि हमारे समूचे सिविलियन परीक्षा तंत्र का 'लीक-तंत्र' के सामने किया गया सबसे बड़ा 'सरेंडर' है.

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ABVP के NTA दफ्तर पर मई माह में हुए प्रदर्शन की एक तस्वीर. (Photo: Hindustan Times) ABVP के NTA दफ्तर पर मई माह में हुए प्रदर्शन की एक तस्वीर. (Photo: Hindustan Times)

मानसी मिश्रा

  • नई दिल्ली ,
  • 02 जून 2026,
  • अपडेटेड 7:50 AM IST

हथियारों और सेना के दम पर सरहदों की रक्षा की जाती है, देश की शिक्षा व्यवस्था की नहीं. लेकिन जब आम जनता के साथ साथ स‍िस्टम का ही अपने सिस्टम से यकीन उठ जाए तो यही होता है जो 21 जून को होने जा रहा है.  नीट-यूजी (NEET-UG) री-टेस्ट की इस तारीख की जो प्रशासनिक तैयारियां सामने आ रही हैं, वो कोई नॉर्मल एकेडमिक सुधार का संकेत तो नहीं लग रहा. खबर है कि प्रश्नपत्रों की सुरक्षा और परिवहन के लिए इस बार नागरिक प्रशासन पर नहीं, बल्कि भारतीय वायुसेना (IAF) के विमानों और परीक्षा केंद्रों पर सीआरपीएफ (CRPF) जैसी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कड़े पहरे पर भरोसा किया जा रहा है.

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एक मजबूत लोकतांत्रिक देश के लिए पहली नजर में ये कदम बहुत आश्वस्त करने वाला लग सकता है कि सरकार परीक्षा की शुचिता को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' मोड में है. लेकिन अगर इस व्यवस्था की तह में जाकर देखें, तो यह किसी सुधार की जीत नहीं, बल्कि हमारे समूचे सिविलियन परीक्षा तंत्र का 'लीक-तंत्र' के सामने किया गया सबसे बड़ा 'सरेंडर' है.

सोचिए, हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां हम पूरी दुनिया में 'डिजिटल इंडिया' का डंका बजाना चाहते है. हम चांद के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा फहराने की तकनीक रखते हैं, हम दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल पेमेंट नेटवर्क चलाते हैं, लेकिन जब देश के 23 लाख बच्चों के लिए एक ट्रांसपेरेंट और सेफ एग्जाम कराने की बात आती है, तो हमारा पूरा हाई-टेक दावा ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है.

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क्या यह विरोधाभास नहीं है कि जिस देश को तकनीकी महाशक्ति बनने का गौरव हासिल है, उसे एक अदद तीन घंटे के पेपर को लीक सिंडिकेट और व्हाट्सएप-टेलीग्राम के गिरोहों से बचाने के लिए एयरफोर्स के विमानों और मिल‍िट्री लॉज‍िस्ट‍क्स का सहारा लेना पड़ रहा है?

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यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जैसी सिविलियन संस्थाओं का अपना डिजिटल और फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर इस कदर जर्जर और खोखला हो चुका है कि वे अपराधियों से दो कदम आगे रहने के बजाय उनके डर से सहमी लग रही हैं.
अब जब 21 जून को देश के लाखों मासूम अभ्यर्थी परीक्षा केंद्रों में प्रवेश करेंगे, तो क्या उनका सामना इनविजीलेटर्स के मुस्कुराते चेहरों से नहीं, बल्कि संगीनों के साए और अर्धसैनिक बलों के कड़े बूटों की आवाज से होगा. परीक्षा का माहौल जो कभी मेधा और एकाग्रता का उत्सव होना चाहिए था, उसे हमने एक कोई स्ट्रेटजिक डिफेंस ऑपरेशन में तब्दील कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान 30 मई को जजों ने बहुत पते की बात कही कि असली समस्या तब तक खत्म नहीं होगी जब तक वास्तविक जवाबदेही तय नहीं होती. हम चाहे जितने पहरे बिठा दें, चाहे आसमान से पेपर गिराएं या जमीन पर बख्तरबंद गाड़ियां तैनात कर दें, जब तक सिस्टम के भीतर बैठे 'विभीषणों' और प्राइवेट वेंडर्स की आउटसोर्सिंग चेन को नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक हर सुरक्षा चक्र नाकाफी साबित होगा.

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वैसे हथियारों और सेना के दम पर सरहदों की रक्षा की जाती है, शिक्षा व्यवस्था की नहीं. सरकार का यह 'मेगा-सुरक्षा मॉडल' असल में एक पैनिक रिएक्शन (घबराहट में उठाया गया कदम) लग रहा है. यह दिखाता है कि सरकार इस कदर डरी हुई है कि वह दोबारा किसी भी तरह का जोखिम नहीं ले सकती, क्योंकि दांव पर अब सिर्फ एनटीए की साख नहीं, बल्कि देश के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व की साख लगी है.

लेकिन सवाल वही है कि क्या हम हर साल, हर परीक्षा को इसी 'सैन्य मॉडल' पर कराएंगे? क्या कल को बारहवीं के बोर्ड एग्जाम या यूनिवर्सिटी एंट्रेंसेस के लिए भी हमें सेना को बुलाना पड़ेगा? वायुसेना के विमानों से पेपर भेजना इस बात की स्वीकारोक्ति है कि हमारा प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह फेल हो चुका है और अब वह अपनी इज्जत बचाने के लिए फौज के पीछे छिप रहा है.

देश के युवाओं को परीक्षा केंद्रों पर 'बॉर्डर' जैसा खौफ नहीं, बल्कि एक ऐसा पारदर्शी 'सिस्टम' चाहिए जो बिना किसी सेना के भी उनकी मेहनत के साथ न्याय कर सके. जब तक हम एक स्वतंत्र, वैधानिक और तकनीकी रूप से अभेद्य डिजिटल परीक्षा प्रणाली का निर्माण नहीं करते, तब तक ये बख्तरबंद गाड़ियां और हवाई जहाज सिर्फ हमारी प्रशासनिक विफलता का विज्ञापन बनकर रह जाएंगे.

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