आखिर क्यों रातोरात जंतर-मंतर पहुंचे हजारों युवा? वजह न वांगचुक, न दीपके

20 जुलाई का संसद मार्च भले ही बैरिकेड्स, आंसू गैस और लाठियों के साथ खत्म हो गया हो, फिर भी जंतर-मंतर पर कई प्रदर्शनकारियों का मानना है कि इस सख्ती ने वही काम कर दिखाया, जिसे रोकने के लिए यह कार्रवाई की गई थी.

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CJP की ओर से आयोजित संसद मार्च हिंसक हो गया और सुरक्षाकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया (Photo-PTI) CJP की ओर से आयोजित संसद मार्च हिंसक हो गया और सुरक्षाकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया (Photo-PTI)

अविनाश कटील

  • नई दिल्ली ,
  • 23 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 3:10 PM IST

जब 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने जून में अपने विरोध-प्रदर्शन का ऐलान किया तो 26 साल के अमिनुल हक भी दूर बैठकर इस पर नजर रखने वालों में शामिल थे. असम में रहते हुए, उन्होंने इस आंदोलन को ऑनलाइन बढ़ावा दिया क्योंकि उनका मानना था कि NEET-UG पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्र पूरी तरह जायज सवाल उठा रहे हैं. जब सोनम वांगचुक इस आंदोलन में शामिल हुए और बाद में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की घोषणा की, तो अमिनुल का समर्थन और गहरा हो गया.

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लेकिन वांगचुक का यह अनशन नहीं था जो आखिरकार उन्हें दिल्ली खींच लाया, वह तो 20 जुलाई के वीडियो थे, जिन्होंने यह काम किया, संसद की ओर मार्च करने के दौरान CJP के प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस के लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले दागने के वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर फैले, अमिनुल ने अपना मन बना लिया. दो दिनों के भीतर ही उन्होंने दिल्ली के लिए उड़ान पकड़ ली,

बुधवार को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर इंडिया टुडे डिजिटल से बात करते हुए अमिनुल हक ने गुस्से और दृढ़ संकल्प से भरी आवाज में कहा, "उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हमला किया, मैं असम से यहां यह दिखाने आया हूं कि उन्होंने गलत पीढ़ी से पंगा ले लिया है."

अमिनुल का यह सफर प्रदर्शन स्थल पर बड़े पैमाने पर हो रहे बदलाव को दर्शाता है, हफ्तों तक, जंतर-मंतर पर छात्रों और कार्यकर्ताओं का एक सीमित लेकिन नियंत्रित जमावड़ा देखा गया, जो परीक्षा में हुई कथित अनियमितताओं पर जवाबदेही तय करने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे, किसी भी समय भीड़ शायद ही दो हजार का आंकड़ा पार करती थी, लेकिन सोमवार की पुलिस कार्रवाई के बाद, हालात पूरी तरह बदल गए.

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बुधवार दोपहर तक हालात ऐसे हो गए थे कि कोई भी यह नहीं गिन पा रहा था कि कितने लोग, खासकर युवा, अलग-अलग दिशाओं से जंतर-मंतर पहुंच रहे थे, संसद मार्ग और टॉल्स्टॉय रोड से आने वाली संकरी सड़कें विरोध-प्रदर्शन वाली जगह की ओर बढ़ रहे लोगों से खचाखच भरी हुई थीं. हालांकि CJP आयोजकों के लिए भी लोगों की संख्या का अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा था, लेकिन जमीनी स्तर पर एक बात साफ थी, विरोध-प्रदर्शन एक नए चरण में पहुंच गया था.

जंतर-मंतर पहुंचने वाले कई लोगों ने कहा कि उन्होंने पहले कभी विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लिया था, वे इसलिए आए थे क्योंकि उन्होंने पिछले दो दिनों में अपने फोन की स्क्रीन पर जो कुछ देखा था, उससे वे प्रभावित हुए थे, भीड़ के बीच चलते हुए, बातचीत, भाषणों और नारों में एक बात बार-बार सुनाई दे रही थी- "बच्चों को नहीं मारना चाहिए था."

जंतर-मंतर पर कैसे निराशा, गुस्से में तब्दील हो गई

20 जुलाई को हुई पुलिस के एक्शन ने कई लोगों की निराशा को सीधे गुस्से में तब्दील कर दिया. 'इंडिया टुडे डिजिटल' से बात करते हुए हॉक ने पूछा, "प्रदर्शनकारियों की मांग ही क्या थी? वे सिर्फ जवाबदेही चाहते थे, अगर सवाल पूछने की कीमत छात्रों को पिटकर चुकानी पड़ेगी, तो सड़कों पर उतरने वालों की तादाद बढ़ेगी ही. सरकार को अब उनकी आवाज सुननी ही होगी." मुख्य मंच से लेकर पूरे प्रदर्शन स्थल पर मौजूद सैकड़ों युवाओं के आक्रोश में यही भावना साफ झलक रही थी.

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तीखी धूप के बीच स्वयंसेवकों को पानी की बोतलें बांटते हुए देख रहे दिल्ली के एक 20 वर्षीय बीटेक छात्र ने कहा, "उन्हें लगा था कि लाठीचार्ज के बाद छात्र डर जाएंगे, लेकिन आज वे गलत साबित हुए हैं." छात्र ने यह भी कहा कि छात्रों की मांग बहुत सीधी थी. "छात्र जवाबदेही के तौर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे,  लेकिन आप संवाद के बजाय ताकत से उसका जवाब दे रहे हैं,  शर्म आनी चाहिए. '

लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल पर दिल्ली पुलिस ने क्या कहा

भीड़ को तितर-बितर करने और आंदोलन को कमजोर करने के लिए दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों द्वारा की गई कार्रवाई का, विडंबना यह रही कि, बिल्कुल उल्टा असर होता दिखा. भीड़ कम होने के बजाय और बढ़ गई. आंदोलन मंद पड़ने के बजाय और तेजी पकड़ चुका है. हालांकि, दिल्ली पुलिस का अभी भी यही रुख है कि उसका लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल करना जरूरी था.

पुलिस के मुताबिक, सोमवार के प्रदर्शन के दौरान कई वरिष्ठ अधिकारियों सहित 118 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए, जबकि लगभग 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. एक आधिकारिक बयान में, दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया कि बार-बार चेतावनी और कानून के मुताबिक बिखरने के निर्देशों के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने "उपद्रवी, आक्रामक और हिंसक व्यवहार" किया. बयान में कहा गया कि प्रदर्शनकारियों ने धारा 144 का उल्लंघन किया, बैरिकेड्स तोड़ने की कोशिश की, पुलिसकर्मियों पर पत्थरों और अन्य वस्तुओं से हमला किया, पुलिस और सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ की और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, जिससे कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया.

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अब ये दो अलग-अलग दावे इस आंदोलन की दिशा तय कर रहे हैं. एक तरफ पुलिस का पक्ष है, जिसके मुताबिक उग्र हुई भीड़ ने अधिकारियों को कार्रवाई करने पर मजबूर किया. दूसरी तरफ हजारों छात्र हैं, जिनका जोर इस बात पर है कि पुलिसिया कार्रवाई ही खुद इस आंदोलन के विस्तार की वजह बन गई है. जंतर-मंतर पर यह अंतर न केवल भाषणों में, बल्कि वहां मौजूद लोगों के चेहरों पर भी साफ देखा जा सकता है.

'आपके इस प्यार के लिए शुक्रिया': दिल्ली पुलिस के लिए प्रदर्शनकारी का संदेश

एक प्रदर्शनकारी बिल्कुल खामोश खड़ा था, उसके हाथ में लगे पोस्टर पर लिखा था "आपके इस प्यार के लिए शुक्रिया." शब्द भले ही शुक्रिया के थे, लेकिन निशाना सीधा तंज था. चेहरे से लेकर बाहों और कंधों तक फैले चोट के गहरे-काले निशान उसकी कहानी खुद बयां कर रहे थे, 'इंडिया टुडे डिजिटल' से बातचीत में उसने बिना किसी हिचकिचाहट के इन चोटों की तरफ इशारा करते हुए कहा, "यह मेरे प्रति उनका प्यार है." उसका सीधा आरोप था कि 20 जुलाई की पुलिसिया कार्रवाई में उसे यह चोट आई.

उसके आसपास, छात्र दिल्ली पुलिस और आरएएफ के खिलाफ नारेबाजी करने से पहले उस पोस्टर की तस्वीरें खींच रहे थे. हर कुछ मिनटों में विरोध स्थल के अलग-अलग कोनों से जवाबदेही की मांग करने वाले नारे गूंजते और फिर एक बड़े स्वर में तब्दील हो जाते. पिछले दिनों के मुकाबले यहां का माहौल एक अलग ऊर्जा से भरा था. वहां साफ तौर पर गुस्सा तो दिख ही रहा था, लेकिन साथ ही एक अटूट संकल्प भी था.

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कई प्रदर्शनकारियों के लिए सोशल मीडिया गवाह और गोलबंदी का जरिया दोनों बन चुका है, जिन वीडियोज में 20 जुलाई की झड़पों को दिखाया गया था, उन्हीं वीडियोज ने कई लोगों को अपने घरों को छोड़कर दिल्ली आने के लिए प्रेरित किया. ज़मीन पर शायद यह सबसे बड़ा और हैरान करने वाला बदलाव था.

छात्रों पर लाठीचार्ज ने आंदोलन को कैसे दी नई ताकत

20 जुलाई तक, विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और मंत्री के इस्तीफे की मांग के इर्द-गिर्द ही घूम रहा था, लेकिन पुलिस कार्रवाई के बाद से, चर्चाएं अब तेजी से विरोध करने के अधिकार पर केंद्रित हो गई हैं. जिन छात्रों ने पहले कभी किसी प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लिया था, वे भी अब नागरिक स्वतंत्रता, असहमति के अधिकार और सरकार के रुख पर खुलकर बात कर रहे थे. जैसे-जैसे दोपहर ढलकर शाम में बदली, भीड़ कम होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे थे. जंतर-मंतर पर भोजन की पर्याप्त व्यवस्था थी और हर तरह का खाना उपलब्ध था.

बिहार, उत्तर प्रदेश और कई अन्य राज्यों से छात्रों के नए जत्थे लगातार पहुंच रहे थे, कई लोगों के पास रात बिताने वाले बैग थे, जिससे साफ लग रहा था कि वे लंबे समय तक टिकने के इरादे से आए हैं, बुधवार को विरोध स्थल पर एक निष्कर्ष को नजरअंदाज करना बेहद मुश्किल था. 

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आंदोलन को खत्म करने के बजाय, इसने इसे एक नया नारा और नया मकसद दे दिया. सूरज ढलने के काफी देर बाद भी जब विरोध स्थल पर नारे गूंज रहे थे, तब हजारों छात्र अपना एक संदेश देने के लिए पूरी तरह डटे हुए दिखे, जिस पीढ़ी का सामना संवाद के बजाय ताकत से किया गया, उसने पीछे हटने के बजाय और अधिक संख्या में वापस लौटने का रास्ता चुना है.

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