अजित पवार के कमजोर होते सियासी हाथों में ढीली पड़ती जा रही है 'घड़ी'

शरद पवार के खिलाफ बगावत के बाद से अजित पवार बड़े मजे में लग रहे थे, लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों ने सारा मजा किरकिरा कर दिया. सहयोगी तो साथ छोड़ने ही लगे हैं, बीजेपी की भी दिलचस्पी कम हो गई है - और चुनावी पछाड़ के बाद शरद पवार अब कानूनी पटखनी देने की तैयारी कर रहे हैं.

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अब तो अजित पवार का हर नुकसान शरद पवार के लिए फायदा ही फायदा है अब तो अजित पवार का हर नुकसान शरद पवार के लिए फायदा ही फायदा है

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 30 जुलाई 2024,
  • अपडेटेड 2:38 PM IST

लोकसभा चुनाव से पहले तक अजित पवार के इर्द गिर्द सब ठीक चल रहा था. 4 जून को नतीजे आने के बाद मालूम हुआ कि वास्तव में तो कुछ भी ठीक नहीं था. हकीकत पर पर्दा लगा हुआ था, इसलिए सब ठीक ठाक नजर आ रहा था.

चुनावी नुकसान के बाद भी कुछ कुछ संभल जाता तो चिंता की कोई बात नहीं होती, लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद ताकतवर होकर उभरे शरद पवार की सक्रियता अजित पवार की मुसीबतें लगातार बढ़ाने लगी हैं - और उसमें एक बड़ी और नई मुसीबत सुप्रीम कोर्ट से मिला नोटिस है. 

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सुप्रीम कोर्ट ने अजित पवार के गुट को असली NCP मानने के महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के फैसले के खिलाफ शरद पवार की याचिका पर महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार और उनके 40 विधायकों से जवाब तलब किया है. ध्यान रहे अजित पवार घड़ी चुनाव निशान का इस्तेमाल भी अदालत का आखिरी फैसला आने तक ही कर रहे हैं, और अदालत के आदेश पर लोकसभा चुनाव में उनको मीडिया में विज्ञापन देकर लोगों को ये बताना भी पड़ा था. 

बेशक अजित पवार महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम बने हुए हैं, बारामती लोकसभा सीट से चुनाव हारकर भी उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार भी राज्यसभा पहुंच गई हैं, लेकिन बाकी सारी चीजें संभलने का नाम ही नहीं ले रही हैं. बगावत के साथी भी साथ छोड़ने लगे हैं, और बीजेपी को भी अजित पवार में पहले जैसी खास दिलचस्पी नहीं रह गई है. 

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1. लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन

लोकसभा चुनाव में अजित पवार की एनसीपी का सबसे खराब प्रदर्शन रहा. महाराष्ट्र में वो महज एक ही लोकसभा सीट जीत पाई. शरद पवार के खिलाफ बगावत के बाद अजित पवार ने बारामती सीट पर सुनेत्रा पवार को उतार कर सबसे बड़ी चुनौती दी थी, लेकिन चूक गये. 

शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने बारामती सीट पर पिता के आशीर्वाद से कब्जा बरकरार रखते हुए, अपनी भाभी सुनेत्रा पवार को शिकस्त दे डाली थी. देखा जाये तो शरद पवार और सुप्रिया सुले दोनो के लिए बारामती का मोर्चा काफी मुश्किल था, क्योंकि अजित पवार तो सिर्फ मोहरा की भूमिका में थे असली खेल तो बीजेपी खेल रही थी.

लेकिन शरद पवार ने जैसे 2019 में बारिश में भीगते हुए रैली कर सतारा उपचुनाव में बीजेपी को शिकस्त दी थी, एक बार फिर अजित पवार के हाथों में हार का तोहफा थमा दिया - बीजेपी के आंखों के तारे अजित पवार तो तभी तक थे, जब तक वो शरद पवार को नुकसान पहुंचा सकें, अगर ये काम उनसे नहीं हो रहा तो वो भला वो किस काम के. 

अब तो अजित पवार को लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन की कीमत भी हर रोज चुकानी पड़ रही है, और खामियाजा भी कदम कदम पर भुगतना पड़ रहा है.

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2. भरोसेमंदों का छिटककर शरद पवार खेमे में जाना

पहले तो अजित पवार खेमे के जिला स्तर के नेताओं के ही साथ छोड़ने की खबरें आ रही थी, लेकिन अब अजित पवार वाली एनसीपी के कई विधायकों के भी शरद पवार गुट के नेताओं के संपर्क में होने की चर्चा सुनने को मिल रही है. 

एनसीपी के बड़े मुस्लिम चेहरों में से एक माने जाने वाले बाबाजानी दुर्रानी के अजित पवार का साथ छोड़ने के बाद से कई नेता कतार में बताये जाते हैं. बाबजानी ने हाल ही में संभाजीनगर दौरे के समय शरद पवार से मुलाकात की थी.

बाबाजानी ने एनसीपी के कई बड़े नेताओं के अजित पवार से नाराजगी का दावा किया है. बाबाजानी दुर्रानी अब तक अजित पवार गुट की एनसीपी के परभणी जिले के अध्यक्ष थे, और विधान परिषद सदस्य हैं. उनका कार्यकाल कुछ दिनों बाद खत्म होने वाला है. बाबाजानी के बाद अजित पवार के तीन साथी विधायकों के भी शरद पवार वाले खेमे में चले जाने की संभावना जताई गई है. 

हालांकि, बीच बीच में अजित पवार के लिए कुछ राहत भरी घटनायें भी हो रही हैं. शरद पवार को तो नहीं, लेकिन अजित पवार ने कांग्रेस को एक बड़ा झटका जरूर दिया है, छत्रपति संभाजीनगर में कन्नड़ निर्वाचन क्षेत्र के पूर्व कांग्रेस विधायक नितिन पाटिल ने अजित पवार से मिलकर हाथ पर 'घड़ी' बांध ली है. घड़ी, दरअसल, अजित पवार वाली एनसीपी का चुनाव निशान है. 

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3. अब असली NCP के दावे पर कोर्ट में गर्म होती बहस

घड़ी चुनाव निशान भी अजित पवार के पास तभी तक है जब तक कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता. ये बात सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा चुनाव से पहले ही अजित पवार को बता दी थी. साथ ही, ये हिदायत भी दी थी कि वो मीडिया में विज्ञापन देकर लोगों को साफ साफ बतायें कि घड़ी चुनाव उनके पास अस्थाई तौर पर ही है, जब तक कि केस में अदालत का फैसला नहीं आ जाता - अब सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस देकर अजित पवार से इस मामले में जवाब देने को कहा है.

अजित पवार के अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ बगावत करके एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बनी बीजेपी गठबंधन की महाराष्ट्र सरकार में शामिल हो गये थे. अजित पवार के साथ काफी संख्या में विधायकों ने भी शरद पवार का साथ छोड़ दिया था. 15 फरवरी, 2024 को महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर ने फैसला सुनाया कि अजित पवार के नेतृत्व वाला गुट ही असली एनसीपी है - औऱ उसके साथ ही दोनो गुटों की तरफ से एक-दूसरे के खिलाफ विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग भी खारिज कर दी थी. 

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सुप्रीम कोर्ट में शरद पवार की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि महाराष्ट्र विधानसभा के बचे हुए कार्यकाल को ध्यान में रखते हुए याचिका पर तत्काल सुनवाई की जाये. महाराष्ट्र विधानसभा का कार्यकाल नवंबर, 2024 में खत्म होने जा रहा है. 

शरद पवार की तरफ से स्पीकर राहुल नार्वेकर के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है - और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने डिप्टी सीएम अजित पवार और उनके 40 विधायकों से भी जवाब तलब किया. 

4. अजित पवार का नुकसान, शरद पवार का फायदा

चाचा भतीजे की लड़ाई में आलम ये है कि अजित पवार का हर नुकसान शरद पवार के लिए फायदे का सौदा है. महाराष्‍ट्र चुनाव के मुहाने पर खड़े अजित पवार के पास खोने के लिए बहुत कुछ है, जबकि शरद पवार के हिस्से पाना ही पाना है.

लोकसभा चुनाव के बाद अजित पवार के लिए अगला नुकसान सीटों के बंटवारे में उठाना पड़ सकता है, बशर्ते विधानसभा चुनाव तक अजित पवार और बीजेपी का साथ बरकरार रहे. अब तो बीजेपी कम से कम सीटों में ही अजित पवार को निबटा देगी. 

हो सकता है जिस लोकसभा सीट पर एनसीपी को जीत मिली है, वहां की विधानसभा सीटें अजित पवार को बीजेपी बख्श भी दे, तो बारामती और आस पास के इलाकों में तो जोखिम उठाने से पहले वो बार बार सोचेगी भी.

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अगर शरद पवार अपने बूते महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी लोकसभा वाला प्रदर्शन कायम रख लेते हैं, तो चुनाव बाद अजित पवार की क्या स्थिति होगी कल्पना ही की जा सकती है - और अगर अजित पवार बीजेपी को किसी काम के नहीं लगे तो डिप्टी सीएम का ओहदा भी ज्यादा दिनों तक देने से रही. 

5. बीजेपी में भी अजित पवार से पीछा छुड़ाने की मांग होने लगी

अभी तक बीजेपी नेतृत्व या शरद पवार की तरफ से अजित पवार से पीछा छुड़ाने को लेकर कोई संकेत तो नहीं मिला है, लेकिन निचले स्तर पर या संघ खेमे से ऐसी मांग तो होने ही लगी है. संघ के मिजाज वाली साप्ताहिक पत्रिका विवेक की एक रिपोर्ट में तो बताया गया था कि अजित पवार के साथ गठबंधन को लेकर बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में ही नहीं, समर्थकों के बीच भी नाराजगी महसूस की जा रही है. 

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