'बाबरी के फैसले जैसी समानताएं', धार भोजशाला पर HC के फैसले पर बोले असदुद्दीन ओवैसी

धार की भोजशाला को हिंदू मंदिर मानने वाले मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. ओवैसी ने X पर लिखा कि इस फैसले में बाबरी मस्जिद जजमेंट जैसी स्पष्ट समानताएं हैं और उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट इसे पलटेगा.

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हाईकोर्ट ने ASI की 98 दिन चली सर्वे रिपोर्ट को सही मानते हुए कहा कि परिसर में मंदिर से जुड़े कई प्रमाण मिले हैं. (File Photo- Social Media) हाईकोर्ट ने ASI की 98 दिन चली सर्वे रिपोर्ट को सही मानते हुए कहा कि परिसर में मंदिर से जुड़े कई प्रमाण मिले हैं. (File Photo- Social Media)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 मई 2026,
  • अपडेटेड 9:09 PM IST

धार भोजशाला मामले पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले ने देश की राजनीति और धार्मिक विमर्श को फिर गरमा दिया है. अदालत ने ASI की 98 दिन चले सर्वेक्षण की रिपोर्ट को सही मानते हुए भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर के तौर पर मान्यता दी है. फैसले में कहा गया कि परिसर में मिले स्थापत्य और पुरातात्विक साक्ष्य मंदिर स्वरूप की ओर इशारा करते हैं.

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इसी फैसले को लेकर अब AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. ओवैसी के बयान ने भोजशाला विवाद को सीधे बाबरी मस्जिद फैसले की बहस से जोड़ दिया है. उनका कहना है कि इस आदेश में बाबरी मस्जिद मामले जैसी समानताएं दिखाई देती हैं. 

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, 'हमें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इसे ठीक करेगा और इस आदेश को रद्द कर देगा. इसमें बाबरी मस्जिद के फैसले के साथ स्पष्ट समानताएं दिखती हैं.'

इसके अलावा उन्होंने कहा कि पिछले 700 सालों से यहां नमाज अदा की जा रही थी. यह फैसला 'पूजा स्थल अधिनियम' के विरुद्ध है. इस अधिनियम के तहत आप पूजा के स्वरूप को नहीं बदल सकते. ASI ने इसे स्पष्ट रूप से एक मस्जिद बताया है. हमारा मानना ​​है कि यह फैसला त्रुटिपूर्ण है.

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?

हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने अपने फैसले में कहा कि विवादित परिसर का धार्मिक चरित्र देवी वाग्देवी सरस्वती के मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र भोजशाला के रूप में स्थापित होता है. अदालत ने यह भी माना कि यहां हिंदू पूजा की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई.

ASI सर्वे में मंदिर की दीवारों और खंभों पर कमल, घंटियां, कलश, देवी-देवताओं की आकृतियां, संस्कृत श्लोक और शिलालेख मिलने की बात कही गई. जमीन के नीचे भी मंदिर से जुड़े प्रमाण मिलने का उल्लेख किया गया है. परिसर में यज्ञकुंड मिलने की बात भी फैसले का हिस्सा बनी.

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस अशोक अवस्थी की पीठ ने 2003 के उस ASI आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें हिंदुओं के पूजा अधिकार सीमित थे जबकि मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी गई थी. साथ ही अदालत ने कहा कि यदि मुस्लिम पक्ष चाहे तो मस्जिद के लिए धार या आसपास वैकल्पिक जमीन की मांग सरकार से कर सकता है. फैसले में राजा भोज की आराध्या वाग्देवी सरस्वती की प्रतिमा को ब्रिटिश म्यूजियम से वापस लाने की मांग पर भी सरकार को ज्ञापन देने की बात कही गई है.

ASI की रिपोर्ट पर कोर्ट ने जताया भरोसा

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ASI की सर्वे रिपोर्ट पर भरोसा जताते हुए हाईकोर्ट ने धार स्थित विवादित भोजशाला परिसर को देवी वाग्देवी सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र माना है. अदालत ने कहा कि ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्य और ASI की वैज्ञानिक जांच यह स्थापित करती है कि भोजशाला मूल रूप से राजा भोज के समय का संस्कृत अध्ययन केंद्र था.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पुरातत्व एक विज्ञान है और अदालत वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों पर सुरक्षित रूप से भरोसा कर सकती है. कोर्ट ने कहा कि उसने उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री, सर्वे रिपोर्ट और सभी पक्षों की दलीलों पर विचार किया है.

अदालत ने कहा कि हर सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह प्राचीन स्मारकों, ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाली संरचनाओं तथा धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करे. कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारों की जिम्मेदारी केवल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि तीर्थयात्रियों के लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है.

1305 ईस्वी में खिलजी ने भोजशाला को किया था ध्वस्त

इतिहास की बात करें तो हजार साल पहले धार में परमार वंश का शासन था. यहां पर 1000 से 1055 ईस्वी तक राजा भोज ने शासन किया. राजा भोज सरस्वती देवी के अनन्य भक्त थे. उन्होंने 1034 ईस्वी में यहां पर एक महाविद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में 'भोजशाला' के नाम से जाना जाने लगा. इसे हिंदू सरस्वती मंदिर भी मानते थे. 

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ऐसा कहा जाता है कि 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला को ध्वस्त कर दिया. बाद में 1401 ईस्वी में दिलावर खान गौरी ने भोजशाला के एक हिस्से में मस्जिद बनवा दी. 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी ने दूसरे हिस्से में भी मस्जिद बनवा दी. 1875 में यहां पर खुदाई की गई थी. इस खुदाई में सरस्वती देवी की एक प्रतिमा निकली थी.

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