एक तरफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को पुलिस ने हटा दिया, क्योंकि प्रशासन को उनकी सेहत की चिंता थी. वहीं दूसरी तरफ, दिल्ली से करीब 700 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के छतरपुर में एक अलग ही तस्वीर देखने को मिल रही है. पन्ना टाइगर रिजर्व के पास केन नदी की एक सहायक नदी के बीचों-बीच गांधीवादी कार्यकर्ता अमित भाटनगर 6 जुलाई से आमरण अनशन पर बैठे हैं. उनके आसपास बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं मौजूद हैं. इनमें से कई महिलाएं गले तक पानी में खड़ी होकर विरोध जता रही हैं, तो कई चिता पर लेटकर अपना दर्द बता रही हैं. कुछ लोगों के गले में फंदा है, तो चेहरे पर मिट्टी लगी है. यह चिता सत्याग्रह केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से प्रभावित परिवारों की जमीन, जंगल और आजीविका बचाने की मांग को लेकर किया जा रहा विरोध है.
इस आंदोलन में पिछड़े समुदाय के लोग बड़ी संख्या में शामिल हैं. ग्रामीणों का कहना है कि प्रोजेक्ट की वजह से उनकी जमीन, घर और जंगल से जुड़ी जिंदगी प्रभावित होगी. उनका आरोप है कि मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया में कई परिवारों की समस्याओं को नजरअंदाज किया गया है.
मिट्टी छिनी तो चेहरे पर लगा ली मिट्टी
आंदोलन में शामिल समत रानी घंटों गले तक पानी में खड़ी होकर अपना विरोध जता रही हैं. उनका कहना है कि केन-बेतवा प्रोजेक्ट के लिए उनकी जमीन और घर का अधिग्रहण किया जा रहा है, लेकिन उन्हें अपनी आगे की जिंदगी को लेकर चिंता है. चेहरे पर मिट्टी लगाए समत रानी कहती हैं, "हमारी मिट्टी छीन ली गई, इसलिए चेहरे पर मिट्टी लगा ली है. हमें मकान के बदले मकान, जंगल के बदले जंगल और नदी के बदले नदी चाहिए."
ग्रामीणों का कहना है कि उनकी जिंदगी जंगल से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर है. महुआ, जलाऊ लकड़ी, तेंदूपत्ता और दूसरे वन उत्पादों से उन्हें आमदनी मिलती है. उनका डर है कि जमीन और जंगल से दूर होने के बाद उनकी रोजी-रोटी पर असर पड़ेगा.
मुआवजे और सर्वे को लेकर ग्रामीणों के आरोप
अमित भाटनगर के साथ आम आदमी पार्टी की स्थानीय पार्षद दिव्या अहिरवार भी आंदोलन में शामिल हैं. दिव्या का आरोप है कि जमीन अधिग्रहण में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन कानून (LARR 2013) के प्रावधानों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया. उनका यह भी कहना है कि पन्ना टाइगर रिजर्व और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का सही आकलन नहीं हुआ.
प्रदर्शनकारी गित्ती बाई का कहना है कि उन्हें सिर्फ जमीन का मुआवजा मिला है, जबकि पेड़, मकान, पशु शेड और विस्थापन से जुड़ी दूसरी सुविधाओं का लाभ नहीं मिला. वहीं पन्ना जिले के बाबूराम पाल अपने जमीन के दस्तावेज दिखाते हुए दावा करते हैं कि सरकारी रिकॉर्ड में उनकी 5-6 जमीनें सिंचित दर्ज हैं, लेकिन सर्वे के दौरान कुछ जमीनों को असिंचित लिख दिया गया. इससे मिलने वाला मुआवजा करीब 60 फीसदी तक कम हो गया.
क्या है केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट?
केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना है, जिसकी योजना 1990 के दशक में बनाई गई थी. पर्यावरण से जुड़े मुद्दों और पन्ना टाइगर रिजर्व पर पड़ने वाले संभावित असर की वजह से यह परियोजना लंबे समय तक कानूनी अड़चनों में फंसी रही. दिसंबर 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस परियोजना को मंजूरी दी थी. इसकी अनुमानित लागत 44,605 करोड़ रुपये है, जिसमें केंद्र सरकार की ओर से 39,317 करोड़ रुपये की सहायता शामिल है.
इस परियोजना के तहत केन नदी के अतिरिक्त पानी को दौधन बांध के जरिए एक नहर से बेतवा नदी तक पहुंचाया जाएगा. सरकार के मुताबिक, इससे बुंदेलखंड क्षेत्र के मध्य प्रदेश सहित उत्तर प्रदेश के कई जिलों में सिंचाई के साथ पेयजल सुविधा भी बढ़ेगी. परियोजना का लक्ष्य करीब 10.62 लाख हेक्टेयर जमीन को सिंचाई का लाभ पहुंचाने के साथ ही 62 लाख लोगों तक पीने का पानी पहुंचाना है. साथ ही, इसमें 103 मेगावाट हाइड्रो पावर और 27 मेगावाट सोलर पावर उत्पादन की योजना भी शामिल है.
कितने गांव होंगे प्रभावित?
प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक, दौधन बांध बनने से छतरपुर जिले के 14 और पन्ना जिले के 8 गांव प्रभावित होंगे. इन गांवों में बड़ी संख्या में आदिवासी, बंजारा और पिछड़े समुदाय के लोग हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि प्रभावित परिवारों की सूची में बड़ी गड़बड़ी हुई है. कुछ ऐसे बाहरी लोगों के नाम शामिल कर लिए गए हैं, जो सीधे प्रभावित भी नहीं हैं, जबकि कई वास्तविक प्रभावित परिवार मुआवजे के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं.
प्रशासन के मुताबिक, सिंचित जमीन के लिए 7.5 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर और असिंचित जमीन के लिए 3.75 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर मुआवजा तय किया गया है. इसके अलावा, प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपये की एकमुश्त सहायता देने का प्रावधान है. मध्य प्रदेश सरकार जमीन मुआवजे के ऊपर 100 फीसदी अतिरिक्त राशि भी दे रही है. कानून के तहत पेड़, पशु शेड, घर बदलने का खर्च जैसी चीजों के लिए भी मुआवजे का नियम है, लेकिन प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्हें इन सभी मदों का कोई लाभ नहीं मिल रहा.
केन-बेतवा प्रोजेक्ट को लेकर पर्यावरण से जुड़े सवाल भी लगातार उठते रहे हैं. दौधन बांध का क्षेत्र पन्ना टाइगर रिजर्व के आसपास आता है, जिससे जंगल और वन्यजीवों पर इसके असर को लेकर पहले भी चिंता जताई गई है. छतरपुर के ककरा, डुंगरी जैसे जंगल से सटे गांवों में प्रशासन ने घर हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी है, जिससे ग्रामीणों में अपने भविष्य को लेकर डर और बढ़ गया है.
प्रशासन ने क्या कहा?
छतरपुर के अधिकारी पार्थ जायसवाल का कहना है कि प्रशासन प्रभावित लोगों की शिकायतें सुनने के लिए पूरी तरह तैयार है. उन्होंने कहा कि अगर प्रदर्शनकारी आंदोलन छोड़कर अपनी शिकायतें दर्ज कराते हैं, तो सर्वे, मुआवजे से जुड़ी गड़बड़ियों की जांच की जाएगी. प्रशासन का यह भी कहना है कि पन्ना की दो अन्य निर्माणाधीन बांध परियोजनाओं (मझगांव और रुंज) से प्रभावित कुछ लोग भी इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं.
फिलहाल केन-बेतवा प्रोजेक्ट को लेकर ग्रामीणों और प्रशासन के बीच भरोसे की कमी बनी हुई है. एक तरफ सरकार इस परियोजना को बुंदेलखंड के लिए बड़ी उम्मीद बता रही है, तो दूसरी तरफ प्रभावित परिवार जमीन, जंगल और अपने भविष्य को लेकर सवाल उठा रहे हैं. यही वजह है कि छतरपुर और पन्ना में यह विरोध लगातार तेज होता जा रहा है.
अमित भारद्वाज