अब सिर्फ भोजशाला, सरकारी टाइटल से हट गया 'मस्जिद' का नाम... ASI का नया आदेश, साल के 365 दिन पूजा कर सकेंगे हिंदू

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के बाद ASI ने धार भोजशाला में हिंदुओं को बेरोक टोक प्रवेश और पूजा का अधिकार दिया. 2003 का नमाज और पूजा से जुड़ा पुराना आदेश पूरी तरह निरस्त...

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धार भोजशाला में अब कोई 'मंगलवार-शुक्रवार' का फॉर्मूला नहीं.(Photo:PTI) धार भोजशाला में अब कोई 'मंगलवार-शुक्रवार' का फॉर्मूला नहीं.(Photo:PTI)

संजय शर्मा / रवीश पाल सिंह

  • नई दिल्ली/धार/इंदौर,
  • 16 मई 2026,
  • अपडेटेड 11:19 PM IST

मध्य प्रदेश के धार की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर 21 साल पुराना कानूनी गतिरोध पूरी तरह समाप्त हो गया है. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के चलते भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक नया शासकीय आदेश जारी किया है. इसके बाद अब इस स्थल के नाम से आधिकारिक तौर पर 'मस्जिद' शब्द को हटा दिया गया है और हिंदुओं को साल के 365 दिन बिना किसी रोक-टोक के पूजा-अर्चना और अध्ययन का अधिकार सौंप दिया गया है.

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अब तक सरकारी और कानूनी दस्तावेजों में इस परिसर को 'भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद' के नाम से संबोधित किया जाता था. ASI के इस नए आदेश के बाद अब इसके टाइटल से मस्जिद का नाम हटा दिया गया है. अब यह आधिकारिक तौर पर सिर्फ 'भोजशाला' कहलाएगी.

- 7 अप्रैल 2003 को जारी ASI के जिस आदेश के तहत हिंदुओं की पूजा को केवल मंगलवार तक सीमित किया गया था, उसे पूरी तरह निरस्त कर दिया गया है. अब हिंदू श्रद्धालु साल के 365 दिन यहां प्राचीन परंपरा के अनुसार मां वाग्देवी की पूजा और शास्त्रों का अध्ययन कर सकेंगे.

- हाई कोर्ट की ओर से साल 2003 की व्यवस्था को पूरी तरह पलटने के बाद, अब शुक्रवार को होने वाली नमाज की अनुमति वाली सीमा स्वतः समाप्त हो गई है.

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- भले ही हिंदू समुदाय को निर्बाध प्रवेश का अधिकार मिल गया है, लेकिन परिसर की ऐतिहासिक महत्ता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एएसआई ने कुछ वैधानिक नियम भी लागू रखे हैं:

- यह परिसर AMASR अधिनियम 1958 (प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम) के तहत एक राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक बना रहेगा.

- श्रद्धालुओं, शोधार्थियों और सामान्य आगंतुकों के लिए दैनिक प्रवेश का समय क्या होगा, इसका निर्धारण स्थानीय अधीक्षण पुरातत्वविद् जिला प्रशासन और पुलिस बल से परामर्श करने के बाद तय करेंगे.

- परिसर के भीतर शिक्षा, शोध और पूजा के संबंध में कौन-कौन सी गतिविधियां अनुमत होंगी, इसकी गाइडलाइन भी स्थानीय प्रशासन की देखरेख में तय की जाएगी ताकि स्मारक की सुरक्षा और भौतिक ढांचे को कोई नुकसान न पहुंचे.

फैसले का मुख्य आधार 
ASI ने अपने आदेश में साफ किया है कि हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक साहित्य और हाल ही में किए गए 98 दिनों के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के आधार पर यह पाया है कि यह स्थान मूल रूप से परमार वंश के राजा भोज द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा, व्याकरण और साहित्य का एक महान वैश्विक केंद्र था. यहां की वास्तुकला और खंभे पूरी तरह से देवी सरस्वती को समर्पित एक भव्य मंदिर के होने की पुष्टि करते हैं.

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इस आदेश के जारी होने के बाद धार जिले में सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है. हिंदू पक्षकारों में इस '365 दिन पूजा' और 'नाम बदलने' के फैसले को लेकर भारी उत्साह है, वहीं कानूनी विशेषज्ञ इसे देश की सांस्कृतिक न्याय प्रणाली में एक बहुत नजीर बनने वाला कदम मान रहे हैं.

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