'होम्योपैथी को लेकर समाज में कई भ्रांतियां', साहित्य आजतक में बोले एक्सपर्ट

स्वास्थ्य मंत्रालय में सीएमओ होम्योपैथी डॉ. आशीष कुमार जायसवाल ने कहा कि होम्योपैथी कोई दवा नहीं है बल्कि यह एक सिद्धांत है. एलोपैथी और आयुर्वेद सहित बाकी अन्य विधाओं से इसकी तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि किसी भी रोग का इलाज उस बीमारी की दशा और दिशा पर निर्भर करता है. 

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साहित्य आजतक के मंच पर गेस्ट्स साहित्य आजतक के मंच पर गेस्ट्स

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 नवंबर 2023,
  • अपडेटेड 11:47 AM IST

दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में शुक्रवार को शब्द-सुरों के महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2023' का आगाज हुआ. तीन दिवसीय इस कार्यक्रम के पहले दिन साहित्य से लेकर सिनेमा जगत के कई दिग्गज हिस्सा ले रहे हैं. इस सत्र में विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों सहित भाषा पर विस्तार से चर्चा हुई.

इस सत्र की शुरुआत में स्वास्थ्य मंत्रालय में सीएमओ होम्योपैथी डॉ. आशीष कुमार जायसवाल ने कहा कि होम्योपैथी कोई दवा नहीं है बल्कि यह एक सिद्धांत है. एलोपैथी और आयुर्वेद सहित बाकी अन्य विधाओं से इसकी तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि किसी भी रोग का इलाज उस बीमारी की दशा और दिशा पर निर्भर करता है. 

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होम्योपैथी बनाम अन्य चिकित्सा पद्धतियां

जायसवाल ने कहा कि हर पैथी का उद्देश्य एक है. मानव जीवन को रोगों से मुक्त करना. किसी भी बीमारी को डायग्नोस करने के बाद पूरी जांच पड़ताल के बाद ही सटीक दवा दी जाती है. तभी कोई भी दवा तेज गति से अपना काम करती है. समाज में यह भ्रम बना हुआ है कि होम्योपैथी से देर में मरीज ठीक होता है जबकि ऐसा नहीं है. 

उन्होंने कहा कि मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं कि हर पैथी की अपनी सीमाएं हैं. उनकी अपनी भूमिका है, जो बेजोड़ है. हमारी जो परंपरा है, उसका एकमात्र उद्देश्य हर व्यक्ति को निरोगी बनाना है. 

टीवी पत्रकार विकास मिश्र ने अपनी किताब 'बखरी... कहानी हर आंगन की' पर बात की. उन्होंने बखरी शब्द का अर्थ समझाते हुए कहा कि बखरी किसी गांव के बड़े घर को कहते हैं पूर्वांचल और बिहार में इसे बखरी कहा जाता है. यह मन को अच्छा करने वाली किताब है कि घर-परिवार से लेकर पूरे गांव को एक वृहत समाज कैसे एक कर सकता है. 

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भाषाएं तोड़ती नहीं जोड़ती हैं

वहीं, सर्वभाषा ट्रस्ट के केशव मोहन पांडेय ने कहा कि उन्होंने 2019 में इस ट्रस्ट को शुरू किया था. मैं छात्रजीवन में हिंदी का विद्यार्थी रहा हूं. मैं जब गोरखपुर यूनिवर्सिटी से एमए कर रहा था, वह समय भाषाओं के नाम पर फूट पड़ने का दौर था. तभी मैंने सर्वभाषा की कल्पना की थी. क्योंकि भाषाएं तोड़ती नहीं बल्कि जोड़ती हैं. यह संप्रेषण का माध्यम है. 

वह कहते हैं कि आज के समय में हमने देश के हर क्षेत्र की भाषाओं को तवज्जो दी है. मलयालम से लेकर बांग्ला, उड़िया, भोजपुरी और डोंगरी तक में किताबों को प्रकाशित किया जा रहा है.

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