क्या अब भी बागी नेताओं पर एक्शन ले सकती हैं ममता बनर्जी? पार्टी संविधान में लिखी है ये बात

टीएमसी के अंदर जो कुछ भी हो रहा है. उसे समझने के लिए एक बार टीएमसी के संविधान और उसके सुप्रीमो की ताकत को समझना जरूरी है. क्योंकि, टीएमसी के इतने सारे विधायकों और सांसदों के बागी होने के बाद अब भी पार्टी सुप्रीमो के तौर पर ममता बनर्जी के पास कितनी ताकत बची हुई है और वह क्या कार्रवाई कर सकती है. ये सारी चीजें टीएमसी के संविधान में दिए गए प्रावधानों पर भी निर्भर करता है और इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता.

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 संकट के इस दौर में ममता बनर्जी अब भी ले सकती हैं एक्शन. (Photo: PTI) संकट के इस दौर में ममता बनर्जी अब भी ले सकती हैं एक्शन. (Photo: PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 जून 2026,
  • अपडेटेड 1:39 PM IST

पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद टीएमसी में कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है. पहले ममता बनर्जी के विधायक बागी हो गए और अब 20 सांसदों के भी रास्ते अलग हो चुके हैं. अब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पर कब्जे को लेकर लड़ाई शुरू हो गई है. ऐसे में समझते हैं कि संविधान के प्रावधानों और टीएमसी के अपने संविधान के  मुताबिक ममता बनर्जी को पार्टी प्रमुख के रूप में क्या- क्या शक्तियां मिली हुई है और अब भी वो बागी हुए नेताओं पर क्या कार्रवाई कर सकती हैं?

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टीएमसी के संविधान के मुताबिक, पार्टी की चेयरपर्सन ही संगठन की सुप्रीमो होगी और वहीं पार्टी का राष्ट्रीय एजेंडा तय कर सकती है. इसके लिए पार्टी सुप्रीमो को राष्ट्रीय कार्यकारिणी यानी नेशनल वर्किंग कमेटी का गठन करना होता है. पार्टी प्रमुख इस कमेटी की हेड होती है. पार्टी से जुड़े किसी भी नीति और नियम का निर्माण और उसे लागू करने का काम वर्किंग कमेटी का होता है. यहां तक कि किसी सदस्य के खिलाफ शिकायत भी कमेटी के सामने ही लाई जाती है और वर्किंग कमेटी के पास भी किसी भी सदस्य के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार होता है. कमेटी के किसी भी फैसले पर  अंतिम मुहर कमेटी की हेड यानी पार्टी चेयरपर्सन की लगती है. बिना चेयरपर्सन का मंतव्य लिए कमेटी कोई फैसला नहीं ले सकती.  

ऐसे में अगर पार्टी के विधायक और सांसद अगर बगावत कर दें तो पार्टी सुप्रीमो यानी टीएमसी में ममता बनर्जी की जो हैसियत है, वह क्या कर सकती हैं और पार्टी के संविधान के मुताबिक उन्हें क्या- क्या पावर मिले हैं, यह समझना जरूरी है. शुरुआत में ही लिखा है कि पार्टी सुप्रीमो के पास ही राष्ट्रीय एजेंडा तय करने का अधिकार होता है. यानी राजनीतिक मुद्दों और चुनावी रणनीति संबंधी मुद्दों पर अंतिम निर्णय लेने का हक ममता बनर्जी का ही है. इसका मतलब है कि वर्किंग कमेटी के फैसले पर भी अंतिम मुहर कमेटी की हेड यानी पार्टी प्रमुख की ही लगेगी.

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क्या कहता है टीएमसी का संविधान
अगर हम टीएमसी की बात करें तो  इसके संविधान के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस में चेयरपर्सन यानी पार्टी सुप्रीमो के पास नेशनल वर्किंग कमेटी से ज्यादा शक्तियां मिली हुई है. पार्टी सुप्रीमो संगठन की इकाइयों का गठन, पुनर्गठन, चुनावी अधिकारियों की नियुक्ति और राष्ट्रीय एजेंडा तय करने का अंतिम अधिकार रखती हैं. वहीं नेशनल वर्किंग कमेटी सिर्फ प्रशासनिक और वित्तीय कामकाज संभालती है.

तृणमूल कांग्रेस के संविधान की सामान्य अनुशासनात्मक धाराओं को देखें, तो किसी नेता के बगावत करने पर पार्टी नेतृत्व के पास कई स्तर की कार्रवाई करने का अधिकार होता है.आमतौर पर ऐसे मामलों में पार्टी, कारण बताओ नोटिस जारी कर सकती है. नेता को पार्टी पद से हटा सकती है. उसे राष्ट्रीय, प्रदेश, जिला या अन्य कमेटियों से बाहर किया जा सकता है.

यहां फंसता है पेच
पार्टी से निष्कासन और विधायक-सांसद की सदस्यता खत्म होना अलग-अलग चीजें हैं. यदि कोई विधायक या सांसद बगावत करता है, तो उसकी विधानसभा या लोकसभा सदस्यता पर फैसला भारत के दल-बदल विरोधी कानून के तहत स्पीकर या चेयरमैन लेते हैं, केवल पार्टी सुप्रीमो नहीं.

किसी के खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधि में शामिल होने पर नेशनल वर्किंग कमेटी  अनुशासनात्मक समिति के रूप में काम कर सकती है और  किसी सदस्य या पार्टी इकाई के खिलाफ शिकायतों की जांच कर सकती है. जरूरत पड़ने पर नेशनल वर्किंग कमेटी किसी भी सदस्य को हटा सकती है या शो कॉज नोटिस दे सकती है.

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जहां तक बागावत की बात है तो सांसदों या विधायकों के खिलाफ भी पार्टी की नेशनल वर्किंग कमेटी ही एक्शन ले सकती है. टीएमसी के मामले में राष्ट्रीय कार्यकारिणी को ये शक्तियां दी गई है और इस कमेटी की प्रमुख पार्टी सुप्रीमो होती है. यानी बिना ममता बनर्जी की मर्जी के बिना वर्किंग कमेटी कोई एक्शन नहीं ले सकती है. 

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