जब वाटरलू में हार गया था नेपोलियन, अंतिम जंग साबित हुई यह लड़ाई

आज के दिन ही नेपोलियन बोनापार्ट को वाटरलू की लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा था. इसके बाद उन्हें हेलेना द्वीप पर निर्वासित कर दिया गया था. जहां कुछ सालों बाद उनकी मृत्यु हो गई थी.

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नेपोलियन बोनापार्ट को अपनी अंतिम जंग वाटरलू की लड़ाई में मिली शिकस्त (Photo - Getty) नेपोलियन बोनापार्ट को अपनी अंतिम जंग वाटरलू की लड़ाई में मिली शिकस्त (Photo - Getty)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 18 जून 2026,
  • अपडेटेड 11:24 AM IST

18 जून 1815 को बेल्जियम के वाटरलू में , नेपोलियन बोनापार्ट को ड्यूक ऑफ वेलिंगटन के हाथों हार का सामना करना पड़ा. इसके साथ ही यूरोपीय इतिहास के नेपोलियन युग का अंत हो गया. कोर्सिका में जन्मे नेपोलियन, जो इतिहास के महानतम सैन्य रणनीतिकारों में गिने जाते हैं. 1790 के दशक के बाद फ्रांसीसी क्रांतिकारी सेना में तेजी से आगे बढ़े. एक समय ऐसा आया जब नेपोलियन का प्रभुत्व फ्रांस सहित लगभग पूरे यूरोप में फैल गया था. 

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1799 तक, फ्रांस यूरोप के अधिकांश देशों के साथ युद्ध में उलझा हुआ था, और नेपोलियन अपने मिस्र अभियान से लौटकर फ्रांसीसी सरकार की बागडोर संभालने और अपने राष्ट्र को पतन से बचाने के लिए आगे आए. फरवरी 1800 में प्रथम कौंसल बनने के बाद, उन्होंने अपनी सेनाओं का पुनर्गठन किया और ऑस्ट्रिया को परास्त किया.

1802 में, उन्होंने फ्रांसीसी कानून की एक नई प्रणाली, नेपोलियन संहिता की स्थापना की.1804 में नोट्रेडेम कैथेड्रल में फ्रांस के सम्राट के रूप में उनका राज्याभिषेक हुआ. 1807 तक, नेपोलियन का साम्राज्य उत्तर में एल्बे नदी से लेकर दक्षिण में इटली तक और पाइरेनीज़ पर्वतमाला से लेकर डालमेटियन तट तक फैला हुआ था.

यहां से शुरू हुआ नेपोलियन का पतन 
1812 से शुरू होकर, नेपोलियन को अपने सैन्य करियर की पहली महत्वपूर्ण हार का सामना करना पड़ा. हार के बाद एल्बा द्वीप पर नेपोलियन को निर्वासित कर दिया गया.  वह 1815 की शुरुआत में वहां से भाग निकला और फ्रांस पहुंच गया. इसके बाद एक नई शासन व्यवस्था स्थापित की.

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फिर जैसे ही मित्र देशों की सेनाएं फ्रांसीसी सीमाओं पर एकत्रित हुईं, उसने एक नई विशाल सेना खड़ी की और बेल्जियम की ओर कूच किया. उसका इरादा मित्र देशों की सेनाओं को एक-एक करके परास्त करना था, इससे पहले कि वे संयुक्त रूप से हमला कर सकें.

16 जून, 1815 को, उन्होंने लिग्नी में गेभार्ड लेबेरेच्ट वॉन ब्लुचर की  प्रशियाई सेना को हराया और पीछे हट रही प्रशियाई सेना का पीछा करने के लिए 33,000 सैनिकों (यानी अपनी कुल सेना का लगभग एक तिहाई) को भेज दिया. 18 जून को, नेपोलियन ने अपने शेष 72,000 सैनिकों का नेतृत्व ड्यूक ऑफ वेलिंगटन की 68,000 सैनिकों वाली सहयोगी सेना के खिलाफ मोर्चा लेने में किया. 

नेपोलियन ने ब्रसेल्स से 12 मील दक्षिण में वाटरलू गांव के पास शुरुआत में एक मजबूत स्थिति बना ली थी. फिर एक घातक भूल में, नेपोलियन ने मैदान को सूखने देने के लिए दोपहर तक आक्रमण का आदेश देने का इंतजार किया. लड़ाई में हुई देरी ने ब्लुचर के सैनिकों को, जो अपने पीछा करने वालों से बच निकले थे, वाटरलू तक मार्च करने और देर दोपहर तक युद्ध में शामिल होने का समय दे दिया.

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इस वजह से ब्लुचर की अगुवाई में प्रशियाई सेना ने नेपोलियन पर हमला बोल दिया. उधर नेपोलियन की सेना की एक टुकड़ी ने वेलिंगटन की सेना को भारी नुकसान पहुंचाया था. इधर, प्रशियाई सेना के हमले की वजह से वेलिंगटन संभल गया और फ्रांसीसी सेना के हमले को विफल कर दिया. शाम तक नेपोलियन की सेना पीछे हटने लगी और नेपोलियन को मैदान छोड़कर भागना पड़ा. 

नेपोलियन पेरिस लौट आए और अपना सिंहासन त्याग दिया. नेपोलियन ने काउंटर रेवोल्यूशनरी आर्मी के एकजुट होने से पहले ही फ्रांस छोड़ने का फैसला किया. 15 जुलाई को रोशेफोर्ट बंदरगाह पर ब्रिटिश सुरक्षा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका जाने की उम्मीद थी, लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें इसके बजाय सेंट हेलेना भेज दिया, जो अफ्रीका के तट से दूर अटलांटिक महासागर में स्थित एक एकांत द्वीप है.

यह भी पढ़ें: जब एल्बा द्वीप से भाग निकला था नेपोलियन, ऐसे नाम के साथ जुड़ा 'बोनापार्ट'

नेपोलियन ने विरोध किया, लेकिन उनके पास निर्वासन स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. अपने कुछ अनुयायियों के साथ, वह छह वर्षों तक सेंट हेलेना में शांतिपूर्वक रहे. मई 1821 में, उनकी मृत्यु हो गई.

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