जब एल्बा द्वीप से भाग निकला था नेपोलियन, ऐसे नाम के साथ जुड़ा 'बोनापार्ट'

26 फरवरी 1815 को नेपोलियन एल्बा द्वीप से भाग निकले थे. इसके बाद उन्होंने फिर से अपनी सेना संगठित कर फ्रांस पर चढ़ाई की और दोबारा अपना सिंहासन हासिल किया.

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आज के दिन ही नेपोलियन निर्वासन से भाग निकले थे (Photo - Getty) आज के दिन ही नेपोलियन निर्वासन से भाग निकले थे (Photo - Getty)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:35 AM IST

आज के दिन ही नेपोलियन एल्बा द्वीप से भाग निकले थे. 26 फरवरी 1815 को आईलैंड से निकलकर वो फ्रांस की तरफ बढ़े और अपनी ताकर दोबारा हासिल की. जैसे-जैसे वह पेरिस के करीब पहुंचते गए, उनके साथ सैनिकों की संख्या बढ़ती गई और वैसे-वैसे उसका सम्मान भी बढ़ता गया. इस तरह दोबारा अपने सिंहासन पर कब्जा करने के साथ ही उनके नाम के साथ बोनापार्ट जुड़ गया, जिसका मतलब होता है 'अच्छा हिस्सा'. 

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नेपोलियन बोनापार्ट को इतिहास के महानतम सैन्य नेताओं में से एक माना जाता है. फ्रांसीसी क्रांति (1787-99) के दौरान उनका उदय हुआ और उन्होंने 1804 से 1814 तक और फिर 1815 में फ्रांस के सम्राट के रूप में कार्य किया. 18 जून 1815 को वाटरलू की लड़ाई में उनकी पराजय हुई थी. 

1800 में मारेन्गो में नेपोलियन ने ऑस्ट्रियाई लोगों पर विजय प्राप्त की. इसके बाद 1802 में नेपोलियन ने स्वयं को आजीवन कौंसुल घोषित किया और दो साल बाद वह फ्रांस के सम्राट बन गए. 1810 से नेपोलियन के विरुद्ध परिस्थितियां बदलने लगीं. फ्रांस को कई सैन्य पराजयों का सामना करना पड़ा.  1812 में नेपोलियन ने रूस पर विनाशकारी असफल आक्रमण का नेतृत्व किया. फ्रांस को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा.

ऐसे एल्बा द्वीप पर निर्वासन में भेजे गए थे नेपोलियन
मार्च 1814 में पेरिस पर कब्ज़ा हो गया और नेपोलियन को एल्बा द्वीप पर निर्वासित कर दिया गया. जिस पर उन्हें संप्रभुता प्रदान की गई थी. इसी बीच, उनकी पत्नी और बेटे ऑस्ट्रिया चले गए. एल्बा द्वीप टस्कनी के तट से मात्र छह मील की दूरी पर स्थित है, इसलिए 1814 में नेपोलियन  की पराजय के बाद विजयी मित्र देशों के लिए उसे कैद करने के लिए शायद यह आदर्श स्थान नहीं था. हालांकि, उनमें से कुछ ही लोग यह कल्पना कर सकते थे कि उसे भागने में केवल नौ महीने लगेंगे - या उनकी वापसी एक बड़े रक्तपात के साथ होगी. 

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बीबीसी के हिस्ट्रीएक्स्ट्रा के मुताबिक, नेपोलियन ने द्वीप को अपने छोटे से राज्य की तरह माना. तानाशाह की तरह रौब जमाया और यहां तक कि अपनी खुद की सेना को प्रशिक्षित भी किया.नेपोलियन के भागने की योजना एक ऐसी शाम के लिए बनाई गई थी. जब उसके दोस्तों को पूरा यकीन था कि ब्रिटिश और फ्रांसीसी गश्ती जहाज किसी और काम में व्यस्त होंगे.

जब एल्बा द्वीप से भाग निकले नेपोलियन
26 फरवरी 1815 को, उन्होंने सुबह प्रार्थना में बिताई और फिर अपनी मां और बहन के साथ भोजन किया. उसके बाद अपनी पसंदीदा किताबों में से एक, पवित्र रोमन सम्राट चार्ल्स पंचम की जीवनी पढ़ी, जो इतिहास के उन गिने-चुने सम्राटों में से एक थे जिनकी शान नेपोलियन की शान के बराबर थी. भीतर ही भीतर, वह उत्साह से उबल रहे थे. क्योंकि यही वह दिन था जब उन्होंने भागकर अपना सिंहासन वापस पाने की योजना बनाई थी.

 उस रात जब वह बंदरगाह की ओर बढ़े, जहां ब्रिगेडियर इनकांस्टेंट उसका इंतज़ार कर रहा था, तो स्थानीय ग्रामीणों ने सड़कों पर कतार बनाकर उनकी जयजयकार की और अपनी टोपियां उछालीं.उनके साथ 600 ओल्ड गार्ड ग्रेनेडियर और कई तरह के सहयोगी भी थे – पूर्व जनरल बर्ट्रेंड, ड्रोउट और कैम्ब्रोन, साथ ही एक डॉक्टर, एक फार्मासिस्ट और एक खनन निरीक्षक भी थे.

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डोमिनिक सैंडब्रुक ने लिखा है कि जब जहाज उन्हें फ़्रांसीसी तट की ओर ले जा रहा था, नेपोलियन डेक पर आत्मविश्वास से टहल रहे थे और सैनिकों व नाविकों से बातचीत कर रहे थे. उनके एक सैनिक ने लिखा - लेटते, बैठते, खड़े होते और उनके चारों ओर घूमते हुए, वे उनसे लगातार सवाल पूछते रहे, जिनका उन्होंने निडरता से और बिना किसी क्रोध या अधीरता के जवाब दिया. 

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फरवरी 1815 के अंत में, वह एल्बा से चुपके से निकल गए और 1 मार्च को कोट डी'अज़ूर द्वीप पर उतरे. उनके पास केवल 600 सैनिक थे और पेरिस लगभग उतनी ही दूरी पर था, लेकिन उसके बाद का मार्च ऐतिहासिक बन गया. ग्रेनोबल के पास, पांचवीं पंक्ति की पैदल सेना की एक बटालियन ने उनका रास्ता रोक दिया. गृहयुद्ध से बचने के लिए, नेपोलियन अकेले ही उनकी ओर बढ़े. तब सैनिकों ने बॉर्बन राजा के सफेद मुकुट उतार दिए और अपने सम्राट के साथ एकजुट हो गए. उसके पुराने कमांडर, मार्शल नेय ने कहा कि वह नेपोलियन को लोहे के पिंजरे में वापस लाएगा, लेकिन उसके सैनिक भी दल बदल गए.

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नेपोलियन ने फिर से अपनी सेना को साथ कर लिया
जैसे-जैसे वह पेरिस के करीब पहुंचता गया और उसके साथ सैनिकों की संख्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे उसका सम्मान भी बढ़ता गया, जैसा कि ले मोनिटर अखबार में छपी कहानी से स्पष्ट होता है. पहले तो उसे राक्षस, अत्याचारी और राज्य हड़पने वाला कहा गया. फिर वह "बोनापार्ट" बन गए, यानी एक अच्छे पहलू वाला शख्स. अंत में 22 मार्च को अखबार ने घोषणा की कि कल महामहिम पेरिस पहुंचे. लुई XVIII तब तक नीदरलैंड भाग चुके थे. नेपोलियन ने दावा किया कि वह केवल फ्रांस को गौरव और समृद्धि लौटाना चाहते हैं और अपने पड़ोसियों के साथ शांति चाहते हैं. इस तरह दूसरी बार नेपोलियन फ्रांस के सम्राट बने और उनका नाम नेपोलियन बोनापार्ट हो गया.

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