नीतीश ने साबित किया वो चंदन-लालू भुजंग, छोड़ना ही था तो आए क्यों थे संग?

बिहार की हार ने जहां बीजेपी को यह एहसास करा दिया कि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का कद काफी बड़ा है. तो वहीं मोदी-शाह की जोड़ी के नेतृत्व में बीजेपी को मिल रही लगातार जीत ने नीतीश कुमार को भी यह एहसास करा दिया कि बिहार की सत्ता में अगले कुछ साल बने रहना है तो बीजेपी के साथ ही बने रहना होगा.

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महागठबंधन को नीतीश का झटका, मोदी ने दी बधाई महागठबंधन को नीतीश का झटका, मोदी ने दी बधाई

कौशलेन्द्र बिक्रम सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 27 जुलाई 2017,
  • अपडेटेड 1:36 PM IST

बिहार में तेजी से घटे राजनीति घटनाचक्र के बाद अब नीतीश कुमार छठवीं बार राज्य के मुख्यमंत्री बन चुके हैं. मोदी से लेकर योगी तक उन्हें ट्विटर पर बधाई दे रहे हैं. नीतीश कुमार एक बार फिर बीजेपी के साथ हैं, वे लालू का साथ छोड़ चुके हैं. सुशील मोदी ने भी एक बार फिर उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है. लेकिन, आपको याद दिला दें कि चुनाव से कुछ महीने पहले इन्हीं नीतीश कुमार ने बीजेपी को 'भुजंग' बताया था.

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नीतीश कुमार ने उस वक्त एक ट्वीट किया था जो रहीमदास के दोहे की पंक्ति थी, "चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग". इस ट्वीट ने बिहार की राजनीति में खूब हल्ला मचाया, पहले लोगों ने सोचा कि यह ट्वीट ताजा-ताजा हुए 'महागठबंधन' और खास कर लालू को लेकर किया गया है लेकिन बाद में जेडीयू ने स्पष्ट किया कि यह ट्वीट बीजेपी को लेकर किया गया था. अब नीतीश एक बार फिर उस वक्त के 'भुजंग' के साथ हैं. इस मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि पहले नीतीश ने मोदी से 'बगावत' की और फिर दोबारा उनकी 'शरण' में पहुंच गए.

गौर से देखें तो इस राजनीतिक उठापठक के पीछे नीतीश कुमार का 'अहम' साफ नजर आता है. देश की राजनीति में तमाम ऐसे नेता हैं जिन पर कई तरह के आरोप लगे लेकिन वे अपने पदों पर लगातार बने रहे जब तक कोर्ट ने उन्हें दोषी करार नहीं कर दिया. तेजस्वी के मामले में अभी जांच चल रही है लेकिन नीतीश झुकना बिलकुल पसंद नहीं करते. वे अपनी साफ-सुथरी छवि को दागदार नहीं करना चाहते थे इसलिए अलग हो गए. लेकिन फिर वे बीजेपी से क्यों अलग हुए ये सवाल भी उठता है. इसके पीछे भी नीतीश कुमार का अहम ही था. दरअसल, नीतीश कुमार मोदी को अपने ऊपर बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे. नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में ही नहीं देश की राजनीति में काफी पहले से ही अहम भूमिका निभा चुके थे. वे अपने समकक्ष राजनेताओं के नेतृत्व में काम करने को तैयार थे लेकिन अपने से कमतर नेता के साथ नहीं. यही वजह थी कि जब बीजेपी की गोवा मीटिंग में नरेन्द्र मोदी का नाम आगे आया तो उन्होंने आडवाणी का झंडा बुलंद किया. और अंतत: मोदी का रथ रोकने के लिए अपने धुर-विरोधी लालू प्रसाद यादव की आरजेडी, समाजवादी पार्टी, जनता दल (सेक्यूलर), इंडियन नेशनल लोक दल, समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) के साथ मिलकर महागठबंधन बना लिया. हुआ भी यही बिहार में बीजेपी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी और उन्हें 37 सीटों के नुकसान के साथ सिर्फ 58 सीट पर संतोष करना पड़ा.

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आपको बता दें कि 1998 में गुजरात में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत का सेहरा मोदी के सिर बंधा था और उन्हें उसी साल मई में राष्ट्रीय सचिव पद से आगे बढ़ाकर बीजेपी का महासचिव बनाया गया था. लेकिन ठीक उसी वक्त नीतीश कुमार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भूतल परिवहन मंत्री का पद संभाल रहे थे. 2001 में जब बीजेपी ने मोदी को गुजरात की कमान संभालने का मौका दिया उस वक्त नीतीश कुमार केन्द्र सरकार में कृषि मंत्री थे. कृषि मंत्रालय के बाद नीतीश कुमार ने कई सालों तक रेल मंत्रालय भी संभाला. इसके बाद वे बिहार के मुख्यमंत्री बने पहले मार्च 2000 में महज 8 दिन के लिए फिर 24 नवंबर 2005 से लगातार बने रहे बस बीच में सिर्फ 278 दिनों के लिए उन्होंने अपनी गद्दी अपने नेता जीतन राम मांझी को सौंप दी थी. मांझी 20 मई 2014 से 22 फरवरी 2015 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे. उधर मोदी कुल 4610 दिन गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात की सत्ता संभाली थी और वे प्रधानमंत्री बनने तक 22 मई 2014 तक इस पद पर बने रहे.

स्पष्ट है कि नीतीश का कद उस दौर में मोदी से कहीं बड़ा था. जिस वजह से उन्होंने गुजरात दंगों का पुरजोर विरोध तो किया ही साथ ही साथ जब केन्द्रीय राजनीति में मोदी का कद बढ़ना शुरू हुआ तो उन्होंने आडवाणी का नाम प्रधानमंत्री उम्मीदवार के लिए आगे किया और अंतत: बीजेपी का साथ छोड़ दिया.

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बिहार की हार ने जहां बीजेपी को यह एहसास करा दिया कि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का कद काफी बड़ा है. तो वहीं मोदी-शाह की जोड़ी के नेतृत्व में बीजेपी को मिल रही लगातार जीत ने नीतीश कुमार को भी यह एहसास करा दिया कि बिहार की सत्ता में अगले कुछ साल बने रहना है तो बीजेपी के साथ ही बने रहना होगा.

अब जब नीतीश कुमार एक बार फिर बीजेपी के साथ हैं तो अब उन पर यह तोहमत लगनी तय है कि नीतीश कुमार ने मोदी को सबक सिखाने के लिए ही लालू का इस्तेमाल किया था. विधानसभा की गणित भी इसी ओर इशारा करती है. नीतीश कुमार बीजेपी में कम संख्या वाले कुर्मी जाति से आते हैं तो लालू यादव का वोट बैंक यादव के साथ-साथ मुस्लिम था. नीतीश ये समझते थे कि अगर दोनों अलग-अलग लड़े तो कभी जीत नहीं सकते. यही वजह है कि 2015 के चुनावों में जहां जेडीयू और आरजेडी ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा तो कांग्रेस को 41 सीटें दीं. लालू की पार्टी कुल 80 सीटों पर जीती तो नीतीश की पार्टी को 71 सीट पर वहीं कांग्रेस सिर्फ 27 सीट पर जीत दर्ज करा पाई. सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद लालू ने महागठबंधन की शर्त के मुताबिक नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनवाया. लेकिन 20 महीने बाद नीतीश कुमार समझ गए कि अब अगर साथ रहे तो उनकी छवि को नुकसान पहुंच सकता है जिसके बाद उन्होंने 26 जुलाई 2017 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया और 27 जुलाई 2017 को बीजेपी के समर्थन के साथ एक बार फिर बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.

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