जवानों के बच्चे बोले- पत्थरबाजों के मानवाधिकार तो सैनिकों के लिए क्यों नहीं?

फौजियों के इन बच्चों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से पूछा है कि कश्मीर के पत्थरबाजों के मानवाधिकार हैं तो फिर फौजियों के मानव अधिकार क्यों नहीं हैं? इन बच्चों ने पूछा है फौज में शामिल होकर देश की हिफाजत कर रहे उनके पिता जैसे तमाम सैनिकों के मानव अधिकारों की रक्षा क्यों नहीं की जा रही है?

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कश्मीर के पत्थरबाज (फाइल) कश्मीर के पत्थरबाज (फाइल)

आशुतोष मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 08 फरवरी 2018,
  • अपडेटेड 4:55 PM IST

पत्थरबाजों के मानवाधिकार हैं तो फिर सैनिकों के मानव अधिकार क्यों नहीं? यह सवाल चर्चा का विषय बने या ना बने इस सवाल को लेकर दो बेटियां और एक बेटा मानव अधिकार की सबसे बड़ी अदालत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दरवाजे पर पहुंचे हैं.

फौजियों के अधिकारों की हिफाजत क्यों नहीं?

सेना में शामिल देश की सेवा कर रहे फौजियों के इन बच्चों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से पूछा है कि कश्मीर के पत्थरबाजों के मानवाधिकार हैं तो फिर फौजियों के मानव अधिकार क्यों नहीं हैं? इन बच्चों ने पूछा है फौज में शामिल होकर देश की हिफाजत कर रहे उनके पिता जैसे तमाम सैनिकों के मानव अधिकारों की रक्षा क्यों नहीं की जा रही है?

ऐतिहासिक कदम

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7 फरवरी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुखिया एच एल दत्तू को एक चिट्ठी भेजी गई. यह चिट्ठी, भारतीय फौज में देश की सेवा कर रहे लेफ्टिनेंट कर्नल केदार गोखले की बेटी प्रीति गोखले, नायक सूबेदार अनुज मिश्रा की बेटी काजल मिश्रा और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रवीण कुमार के बेटे प्रभाव सिंह ने भेजी थी. देश में पहली बार ऐसा हुआ है कि देश की सरहदों की हिफाजत करने वाले सैनिकों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए उनके बच्चे अदालत के दरवाजे तक पहुंच गए हैं.

पत्थरबाजों के खिलाफ मुकदमें वापस

हाल ही में जम्मू कश्मीर की बीजेपी और पीडीपी की सरकार ने हजारों पत्थरबाजों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस ले लिए थे. वहीं दूसरी घटनाक्रम में मेजर आदित्य समेत कई सैनिकों पर नागरिकों की हत्या के आरोप में मुकदमे दर्ज कर दिए गए हैं.

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जम्मू कश्मीर की सरकार ने सेना के सेल्फ डिफेंस को ही उनका अपराध बता दिया और इसी कदम के बाद देश के तीन सैनिकों के तीन बच्चे अपने पिता समेत पूरे सैन्य परिवारों और सैनिकों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दरवाजे खटखटाए हैं.

क्यों उठाया ये कदम?

लेफ्टिनेंट कर्नल केदार गोखले की बेटी प्रीति गोखले ने आजतक से बातचीत में कहा कि टेलीविजन पर जब वह तस्वीरें दिखाई दी कि कैसे सैनिकों पर पत्थरबाजी होती है. हाथों में हथियार होने के बावजूद भी वह नागरिकों पर गोलियां नहीं चलाते, लेकिन हिंसक भीड़ के सारे अत्याचार सहते हैं, ऐसी घटनाओं ने उन्हें झकझोर दिया.

वर्दी पहनने के बाद किसी के मूलभूत मानवाधिकार खत्म नहीं होते

सूबेदार नायक अनुज मिश्रा की बेटी काजल मिश्रा कहती हैं की सेना की वर्दी पहन लेने के बाद किसी के भी मूलभूत मानवाधिकार खत्म नहीं हो जाते. इन तीन बच्चों ने राष्ट्रीय अधिकार आयोग को लिखे खत में कहा है कि उन्हें कश्मीर घाटी में सेना पर हो रही लगातार पत्थरबाजी की घटनाओं ने चिंतित कर दिया है.

4 हफ्ते बाद होगी सुनवाई

इन बच्चों ने लिखा है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग हर किसी के मानव अधिकारों की देख-रेख करता है. लेकिन क्या आर्म्ड फोर्सेस पर लगातार हो रहे हमले और उनके मानवाधिकारों के हनन को लेकर इस आयोग को सोचना नहीं चाहिए.

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बता दें कि 4 हफ्ते बाद इन 3 बच्चों की याचिका पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सुनवाई की तारीख तय करेगा.

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