जब 7707 राजा करते थे शासन... SC ने SIR फैसले में याद दिलाया बिहार का सबसे पुराना लोकतंत्र

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के अधिकार को बरकरार रखा है, जो निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक दायित्व को मजबूत करता है. कोर्ट ने बिहार के प्राचीन वैशाली और वज्जि गणराज्यों की लोकतांत्रिक परंपरा का उल्लेख किया.

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सुप्रीम कोर्ट ने SIR मामले में बुधवार को अहम फैसला सुनाते हुए उसे वैध बताया है सुप्रीम कोर्ट ने SIR मामले में बुधवार को अहम फैसला सुनाते हुए उसे वैध बताया है

बिश्वजीत

  • नई दिल्ली,
  • 27 मई 2026,
  • अपडेटेड 6:12 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) करने के अधिकार को बरकरार रखते हुए कहा कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक दायित्व में 'नई जान' फूंकती है.बिहार के ऐतिहासिक संदर्भ का ज़िक्र करते हुए कहा गया कि महाजनपद काल (छठी–पांचवीं सदी ईसा पूर्व) में आज का बिहार क्षेत्र राजतंत्र और गैर‑राजतांत्रिक दोनों तरह की व्यवस्थाओं का केंद्र था. 

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मगध-अंग और वैशाली की राज व्यवस्था
मगध और अंग जहां राजाओं के अधीन थे, वहीं वैशाली केंद्रित वज्जि संघ को आधुनिक शोध प्राचीन भारतीय गणतांत्रिक और अर्ध‑गणतांत्रिक संस्थाओं की परंपरा में रखता है. महापरिनिब्बान सुत्त जैसी पाली रचनाओं में वज्जियों का वर्णन ऐसी संगठित जनता के रूप में है जो बार‑बार पूर्ण सभाएं बुलाती हैं, सहमति से काम करती है और स्थापित संस्थाओं के अनुसार निर्णय लेती है. वहां न आधुनिक वोटर लिस्ट है, न सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की भाषा, लेकिन यह साफ दिखता है कि सत्ता किसी अकेले शासक के बजाय निर्वाचित या निर्धारित सभा के जरिये चलती थी.

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में किया जिक्र

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्राचीन वज्जि जैसे गणराज्य आज के संवैधानिक अर्थों में लोकतंत्र नहीं थे, क्योंकि भागीदारी सीमित और दर्जे, वंश और हैसियत से बंधी थी. फिर भी, हर गणराज्य- चाहे वह अल्पतंत्री (ओलिगार्किक) ही क्यों न हो – को यह तय करना पड़ता था कि कौन नीतिगत चर्चा और फैसलों में हिस्सा ले सकता है. इस अर्थ में प्राचीन इतिहास स्पष्ट रूप से दिखाता है कि समाज बहुत पहले से ही 'सार्वजनिक सदस्यता' और राजनीतिक भागीदारी की परिभाषा को लेकर चिंतित रहा है.

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संघ या गण के रू में चलता था वैशाली का शासन

वैशाली और वज्जि की इस गणतांत्रिक परंपरा को लेकर इतिहासकार योगेन्द्र मिश्र की किताब  'AN EARLY HISTORY OF VAISALI(From the Earliest Times to the Fall of the Vajjian Republic, circa 484 BC' में विस्तार से चर्चा मिलती है. वे बताते हैं कि वज्जि राज्य को पाली साहित्य में Vajji‑rattha कहा गया और इसका शासन 'संघ' या 'गण' के रूप में चलता था, जिसमें लिच्छवि प्रमुख घटक थे, इसलिए इसे लिच्छवि‑गण भी कहा गया. यह राजाधीन नहीं, बल्कि गणाधीन राज्य था – यानी सत्ता किसी एक राजा के बजाय गणराजाओं के सामूहिक ढांचे में निहित थी.

7,707 सदस्यों से मिलकर बनती थी वज्जि की संसद

वैशाली की सबसे रोमांचक झलक उसकी केंद्रीय विधायिका से मिलती है. मिश्र के अनुसार वज्जि (या लिच्छवि) गणराज्य की 'सेंट्रल लेजिस्लेचर' या संसद 7,707 सदस्यों से मिलकर बनती थी और हर सदस्य को 'राजा' कहा जाता था. जातक ग्रंथ में वर्णन आता है कि वैशाली में 7,707 राजा निवास करते थे, उतने ही उप‑राजा उतने ही सेनापति और उतने ही भंडगारिक (कोषाध्यक्ष). यानी हर 'राजा' के साथ एक उप‑राजा, एक सेनापति और एक भंडाराध्यक्ष जुड़ा था- मानो हर संसद सदस्य के पास अपना छोटा‑सा कैबिनेट हो.

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'जातक (Jātaka) संख्या 149 में लिच्छवियों के संविधान का वर्णन करते हुए एक रोचक अंश मिलता है, 'वैशाली में जो राजा स्थायी रूप से निवास करते और शासन करते थे, उनकी संख्या सात हजर सात सौ सात थी. उप‑राजाओं की संख्या भी उतनी ही थी, और सेनापतियों तथा भंडगारिकों (कोषाध्यक्षों) की संख्या भी उतनी ही थी.'

इससे स्पष्ट होता है कि 'वहां 7707 राजा, 7707 उप‑राजा, 7707 सेनापति और 7707 भंडगारिक थे. इस तरह केंद्रीय विधानसभा के प्रत्येक सदस्य के पास एक उप‑राजा (वाइसरॉय), एक सेनापति (जनरल) और एक भंडगारिक (कोषाध्यक्ष) नियुक्त था.'

इतिहासकार एएस. आल्तेकर इस 7,707 की संख्या को यूं समझाते हैं कि जब आर्य यहां बसने आए, तो यह क्षेत्र लगभग 7,707  क्षत्रिय परिवारों में बंटा था, जो किसी राज्य के ज़मींदार परिवारों की तरह राजनीतिक अधिकार रखते थे. सैद्धांतिक रूप से हर राजा के अधिकार समान माने जाते थे, भले ही व्यवहार में बुज़ुर्गों और प्रतिष्ठित परिवारों की आवाज़ ज्यादा भारी पड़ती हो.

राजशाही में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था

विद्वान स्टीवन मुलबर्गर लिखते हैं कि बीते एक सदी में यह बात काफी हद तक स्थापित हो चुकी है कि प्राचीन भारत सिर्फ राजाओं और वर्ण‑व्यवस्था वाला समाज नहीं था, बल्कि लंबे समय तक ऐसे गणराज्यों का घर था जिन्हें यूनानी शहर‑राज्यों जितना ही लोकतांत्रिक कहा जा सकता है.

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पाली कैनन, पाणिनि और कौटिल्य के ग्रंथों से हमें अनगिनत गणों और संघों की जानकारी मिलती है, जहां सदस्य समान हितों के आधार पर मिलकर शासन-संचालन करते थे. मुलबर्गर के अनुसार, यह अनुभव दिखाता है कि लोकतंत्र की कहानी केवल 'पश्चिम' की नहीं, बल्कि भारत जैसे क्षेत्रों की भी है, जहां जनसभा, संवाद और सामूहिक निर्णय की परंपरा बहुत पुरानी है.

वैशाली की 7,707‑सदस्यीय सभा से लेकर आज के करोड़ों मतदाताओं वाले गणराज्य तक की यह लम्बी यात्रा हमें सिखाती है कि बिहार की ज़मीन पर लोकतांत्रिक प्रयोग कोई नई चीज़ नहीं; यहाँ की स्मृति में संगठित जनजीवन और सभाओं की परंपरा बहुत पुरानी है.

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