दिल्ली से महाराष्ट्र तक... संविधान पर घमासान! 'समाजवाद-धर्मनिरपेक्षता' हटाने की मांग पर RSS और विपक्ष में बहस

आरएसएस के सरकार्यवाह ने आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए 'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्षता' शब्दों को हटाने पर विचार करने की बात कही. इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हंगामा मच गया और विपक्ष ने आरएसएस तथा बीजेपी पर निशाना साधा.

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संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवाद-धर्मनिरपेक्षता' हटाने की मांग पर छिड़ी बहस (फोटो क्रेडिट - पीटीआई) संविधान की प्रस्तावना से 'समाजवाद-धर्मनिरपेक्षता' हटाने की मांग पर छिड़ी बहस (फोटो क्रेडिट - पीटीआई)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 28 जून 2025,
  • अपडेटेड 6:36 AM IST

आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने इमरजेंसी के 50 वर्ष पूरे होने पर संविधान की प्रस्तावना को लेकर प्रश्न खड़े किए. होसबोले बोले, आपातकाल के दौरान संविधान में समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता शब्द जोड़े गए. अब इन्हें हटाने पर विचार होना चाहिए.

इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हंगामा मच गया. लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरएसएस और बीजेपी पर निशाना साधा. राहुल ने कहा एक बार फिर आरएसएस का नकाब उतर गया. बीजेपी होसबोले के बयान का समर्थन कर रही है.

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दत्तात्रेय होसबोले ने क्या कहा?

दत्तात्रेय होसबोले ने कहा, 'दो शब्द जोड़े गए हैं, सेक्युलरिज़्म और सोशलिज्म की. तो क्या वो रहनी चाहिए? बाबा साहेब अंबेडकर का नाम और संविधान पिछले कुछ सालों में भारतीय राजनीति के केंद्र में लगातार शीर्ष पर बना हुआ है. संविधान पर सरकार बनाम विपक्ष की लगातार जंग को हर किसी ने देखा है. लेकिन इन सबके बीच आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर आरएसएस में नंबर दो की हैसियत रखने वाले दत्तात्रेय होसबोले ने भारतीय संविधान के 42वें संशोधन पर सवाल खड़े किए. उनका कहना था कि जिस संविधान की प्रस्तावना को बाबा साहेब अंबेडकर ने लिखा था  उसे इंदिरा सरकार ने बदल दिया. जब समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्द भारतीय संविधान में 1976 में जोड़े गए'.

होसबोले ने कहा, 'इस आपातकाल के दौरान भारत के संविधान के प्रस्तावना में दो शब्द जुड़े गए.  हम लोगों को मालूम है सेकुलरिज़्म और सोशलिज्म के वो प्रस्तावना में नहीं थे. पहले तो इन दो शब्दों को प्रस्तावना में जोड़ा. बाद में इसको निकालने के प्रयत्न हुआ नहीं है. चर्चा हुई दोनों प्रकार के आर्गुमेंट्स हुए.  तो क्या वो रहनी चाहिए? प्रस्तावना में ये विचार होना चाहिए'.

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राहुल गांधी ने क्या कहा?

दत्तात्रेय होसबोले का बस इतना कहना भर था कि विपक्ष ने साझा होकर आरएसएस और बीजेपी पर हमला बोल दिया. नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरएसएस और बीजेपी पर वार करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा, 'आरएसएस का नकाब फिर से उतर गया. संविधान इन्हें चुभता है क्योंकि वो समानता, धर्मनिरपेक्षता और न्याय की बात करता है. आरएसएस और बीजेपी को संविधान नहीं मनुस्मृति चाहिए. ये बहुजनों और गरीबों से उनके अधिकार छीनकर उन्हें दोबारा गुलाम बनाना चाहते हैं. संविधान जैसा ताकतवर हथियार उनसे छीनना इनका असली एजेंडा है. आरएसएस ये सपना देखना बंद करे, हम उन्हें कभी सफल नहीं होने देंगे. हर देश भक्त भारतीय आखिरी दम तक संविधान की रक्षा करेगा'.

यह भी पढ़ें: संविधान में 'सेक्‍यूलर-सोशलिस्ट' जोड़ना फिजूल था, उसे हटाने की संघ की मांग भी बेमतलब है

संजय राउत और आदित्य ठाकरे ने क्या कहा?

शिवसेना उद्धव गुट के सांसद संजय राउत तो राहुल से एक कदम आगे निकले और कहा कि आरएसएस ने तो आपातकाल का समर्थन किया था तो आदित्य ठाकरे ने होसबोले के बयान को महाराष्ट्र के भाषा विवाद से ध्यान भटकाने वाला बताया.

शिवराज सिंह चौहान ने क्या कहा?

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने होसबोले के बयान का समर्थन कर विवाद को मानो और भड़का दिया. शिवराज ने कहा, 'सर्व धर्म सम भाव म्ये भारतीय संस्कृति का मूल है. धर्मनिरपेक्ष हमारी संस्कृति का मूल नहीं है और इसलिए इस पर जरूर विचार होना चाहिए कि आपातकाल में जिस, धर्मनिरपेक्ष शब्द को जोड़ा गया, उसको हटाया जाए. सर्वे भवंत सुखना सर्वे संतु निरामया, ये भारत का मूल भाव है. और इसलिए यह समाजवाद की जरूरत नहीं है. हम तो वर्षों पहले से कह रहे हैं सिया राम में सबको एक जैसा माना. इसलिए समाजवाद शब्द की भी आवश्यकता नहीं है. देश को इस पर निश्चित तौर पर विचार करना चाहिए.

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संविधान पर बहस कोई नई नहीं है. लेकिन इस बार मुद्दा प्रस्तावना के वो दो शब्द है जिन्हें भारत की पहचान से जोड़ा जाता है.
 

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