ये कहानी उस जगह की है जहां सपने न सिर्फ बिकते हैं, बल्कि जमीन के नीचे से खोदे जाते हैं. जहां की रेत हीरे उगलती है, जहां रातोरात कोई धनकुबेर बन जाता है तो किसी की पूरी जिंदगी हीरे की चमक ढूंढते-ढूंढते अंधेरे में बीत जाती है. आखिर कैसे आम सा ये इलाका डायमंड लैंड में बदल गया. और क्या इससे यहां के आम लोगों की जिंदगी में भी चमक आ सकी या सिर्फ हीरे की इस खोज में चंद अमीर लोग ही और अमीर होते जा रहे हैं?
सोचिए कि आप एक सूखे रेगिस्तान में चल रहे हैं और अचानक आपके पैरों के नीचे कोई चीज चमकती है. 1920 के दशक में नमाक्वालैंड में कुछ ऐसा ही हुआ था. यहां की मिट्टी में इतने हीरे थे कि लोग कहते थे कि उन्हें बस झुककर बटोरने की जरूरत थी. दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया की सीमा पर स्थित यह अर्ध-रेगिस्तानी क्षेत्र दुनिया की सबसे अनोखी 'एलुवियल डायमंड' मतलब नदियों द्वारा बहाकर लाए गए हीरों के खान के लिए मशहूर हो गया. इस खोज के 106 साल बीत चुके हैं, लेकिन वह चमक अब इस जमीन के लिए एक बोझ बन चुकी है.
हीरे की खोज के बाद यहां बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों, खासकर 'डि बीयर्स' जैसे दिग्गजों का कब्जा हुआ. दशकों तक नमाक्वालैंड इन कंपनियों के लिए 'कैश काउ' बना रहा. सालाना लाखों कैरेट हीरा निकाला गया, जिससे ग्लोबल मार्केट की तिजोरियां भरी गईं. लेकिन जब जमीनी खदानों से मुनाफा कम होने लगा, तो बड़ी कंपनियां अपने प्लांट समेटकर निकलने लगीं. पीछे रह गई तो सिर्फ बेरोजगारी, गहरे गड्ढे और बर्बाद पर्यावरण.
हीरे की चमक अलग बात है लेकिन खदान में काम करने वाले मजदूरों की जिंदगी किसी फिल्म की तरह ग्लैमरस नहीं होती. यहां काम करने वाले स्थानीय लोगों के लिए हीरा सपना नहीं, बल्कि मजबूरी है. इन हीरा खदानों में एक आम कारीगर या खनिक के लिए यहां का दिन सूरज निकलने से बहुत पहले शुरू होता है. नमाक्वालैंड में माइनिंग दो तरह से होती है और दोनों ही जानलेवा हैं.
जमीन पर 45-50 डिग्री की झुलसाने वाली गर्मी और धूल भरी आंधियों के बीच घंटों खुदाई. जिसमें खनिकों के लिए कंकड़-पत्थरों के विशाल ढेरों को छानना 'भूसे के ढेर में सुई ढूंढने' जैसा है. धूल की वजह से मजदूरों को सिलिकोसिस जैसी फेफड़ों की बीमारी तोहफे में मिलती है. दूसरा तरीका है समुद्र में. जब डायमंड डाइवर्स छोटी नावों पर वैक्यूम पाइप लेकर ठंडे अटलांटिक महासागर में उतरते हैं. शार्क के खतरे और पानी के भारी दबाव के बीच रेत खींचना किसी सुसाइड मिशन से कम नहीं है.
यहां कमाई का विरोधाभास भी रुला देने वाला है. जहां एक हीरा लाखों डॉलर में बिकता है, वहीं एक कॉन्ट्रैक्ट खनिक महीने के मुश्किल से 5,000 से 15,000 रैंड यानी लगभग 22,000 से 65,000 रुपये तक ही कमा पाता है. कई बार तो 'नो डायमंड, नो पे' की नीति होती है यानी कमीशन पर खुदाई. जो मजदूर दुनिया के सबसे महंगे पत्थर निकालता है, उसके पास अपने बच्चों की स्कूल फीस भरने के पैसे भी नहीं जुड़ पाते. ऊपर से सुरक्षा के नाम पर उनके साथ अपराधियों जैसा बर्ताव होता है- ड्रोन, थर्मल कैमरे और हथियारों से लैस गार्ड्स हर वक्त उन पर नजर रखते हैं.
इस पूरे जिले में करीब डेढ़ लाख लोग रहते हैं. यह इलाका बहुत ही कम आबादी वाला है. यहां प्रति वर्ग किलोमीटर में 2 इंसान भी नहीं रहते. इसका कारण यहां का कठोर रेगिस्तानी मौसम और खदानों के लिए आरक्षित विशाल खाली जमीन है. यहां की आबादी का बड़ा हिस्सा स्प्रिंगबॉक जैसे शहरों और छोटे माइनिंग टाउन्स जैसे कि अलेक्जेंडर बे, पोर्ट नोलॉथ और कोइन्गानास में रहता है. यहां मुख्य रूप से 'नामा' समुदाय के लोग रहते हैं, जो इस जमीन के मूल निवासी हैं. इसके अलावा यहां कलर्ड समुदाय की बड़ी आबादी है, जो दशकों से इन खदानों में काम कर रही है.
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संयुक्त राष्ट्र और ह्यूमन राइट्स वॉच इस इलाके को पर्यावरण की तबाही का परफेक्ट उदाहरण मानते हैं. माइनिंग के बाद कंपनियों ने जमीन को रिस्टोर नहीं किया. नमाक्वालैंड अपनी जिस जैव विविधता के लिए जाना जाता था, वह अब मरुस्थल में बदल चुकी है. यहां बेरोजगारी इतनी बढ़ चुकी है कि स्थानीय लोग अवैध खनिक बनकर बंद खदानों में रात को घुसकर जान जोखिम में डाल रहे हैं. अक्सर मिट्टी धंसने से इनकी मौत हो जाती है, जिनका कोई रिकॉर्ड तक नहीं रखा जाता.
पुलिस और सुरक्षाकर्मियों के साथ उनकी हिंसक झड़पें भी आम हैं. अवैध तरीके से निकलने वाले हीरे का बड़ा हिस्सा यहां से ब्लैक मार्केट में चला जाता है, जहां बिचौलिए इन गरीब खनिकों से कौड़ियों के दाम पर हीरे खरीदकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऊंचे दामों पर बेचते हैं.
विज्ञापनों में शायद 'हीरा हमेशा के लिए' होता होगा, लेकिन नमाक्वालैंड की जमीन और वहां के लोगों की खुशहाली शायद चंद चमकते पत्थरों की भेंट चढ़ गई. नमाक्वालैंड की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारी लग्जरी की कीमत क्या है? एक तरफ वो मालिक हैं जिन्होंने अपनी सात पुश्तों के लिए दौलत जमा की, और दूसरी तरफ ये कारीगर हैं जो आज भी उसी मिट्टी में अपनी किस्मत तलाश रहे हैं.
संदीप कुमार सिंह