क्रॉस वोटिंग से मिली NDA गठबंधन की कमजोर कड़ी! कर्नाटक के नए 'नाटक' की इनसाइड स्टोरी

कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में क्रॉस-वोटिंग का मामला अब सिर्फ़ आंतरिक अनुशासनहीनता तक सीमित नहीं रहा है. बागी विधायकों की समीक्षा के तौर पर शुरू हुई ये बात अब BJP के अंदर एक बड़ी राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है. इस विवाद ने BJP की अनुशासनहीनता और JD(S) की राजनीतिक प्रासंगिकता पर सवाल उठाए हैं.

Advertisement
कर्नाटक एनडीए में क्रॉस-वोटिंग के बाद घमासान. (File photo: ITG) कर्नाटक एनडीए में क्रॉस-वोटिंग के बाद घमासान. (File photo: ITG)

ऐश्वर्या पालीवाल

  • नई दिल्ली,
  • 24 जून 2026,
  • अपडेटेड 7:27 AM IST

कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में हुई क्रॉस- वोटिंग ने बीजेपी के अंदर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. बागी विधायकों की समीक्षा से शुरू हुआ ये मामला अब इस बड़े सवाल पर पहुंच गया है कि क्या बीजेपी को राज्य में जेडी(एस) की जरूरत है या अब स्वतंत्र राह चुनने का समय आ गया है?

सूत्रों का कहना है कि BJP का रुख सख़्त है. नेतृत्व पार्टी के अंदर से होने वाली तोड़-फोड़ को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है और इसके नतीजे सिर्फ अनुशासनात्मक कार्रवाई से कहीं आगे जा सकते हैं. इस विवाद ने पार्टी को कर्नाटक में NDA के भविष्य और अपनी दीर्घकालिक चुनावी रणनीति, दोनों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है.

दिल्ली में हुई एक उच्च-स्तरीय बैठक में क्रॉस-वोटिंग के पूरे विवाद की समीक्षा की गई. BJP अध्यक्ष नितिन नवीन ने कर्नाटक BJP अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र, विपक्ष के नेता आर. अशोक और राज्य प्रभारी राधा मोहन दास अग्रवाल के साथ विस्तृत चर्चा की.

खबरों के अनुसार, राज्य नेतृत्व ने केंद्रीय नेतृत्व को बताया कि NDA के 11 विधायक उम्मीद के मुताबिक JD(S) उम्मीदवार का समर्थन करने में नाकाम रहे. BJP के चार वोट बेकार गए, एक वोट अमान्य घोषित किया गया और कम से कम तीन BJP विधायकों द्वारा क्रॉस-वोटिंग की पुष्टि हुई है.

शुरुआती रिपोर्टों से ये भी संकेत मिलता है कि JD(S) के 6 से 7 विधायक भी पार्टी लाइन का पालन करने में नाकाम रहे. BJP के लिए ये सिर्फ संख्या का नुकसान नहीं था, ये पार्टी के अनुशासन के लिए एक सीधी चुनौती थी.

Advertisement

अंदरूनी कलह से कांग्रेस को बढ़त

NDA की आंतरिक उथल-पुथल का राजनीतिक फायदा कांग्रेस को मिला. 224 सदस्यों वाली कर्नाटक विधानसभा में, कांग्रेस के पास विधान परिषद की चार सीटें आसानी से जीतने के लिए जरूरी संख्या बल था. हालांकि, NDA खेमे में क्रॉस-वोटिंग के कारण, वह पांचवीं सीट भी हासिल करने में कामयाब रही. इसके नतीजे तुरंत दिखे. विधान परिषद में कांग्रेस की ताकत 34 से बढ़कर 39 सदस्य हो गई. BJP की संख्या घटकर 29 रह गई, जबकि JD(S) के पास केवल छह सदस्य बचे. जो चुनाव एक सामान्य प्रक्रिया होनी चाहिए थी, वह NDA के लिए एक राजनीतिक 'ओन गोल' (अपनी ही टीम को नुकसान पहुंचाने वाली हरकत) में बदल गया.

उजागर हुई कमजोर कड़ी

इस चुनाव में जेडी(एस) उम्मीदवार गोविंदराजू की हार ने गठबंधन के अंदर बढ़ती असहजता को पूरी तरह उजागर कर दिया है. विधानसभा में 18 विधायक होने के बावजूद जेडी(एस) उम्मीदवार को केवल 14 प्रथम वरीयता के वोट मिले. बीजेपी द्वारा अपने चार विधायकों को उनके पक्ष में वोट देने के निर्देश के बाद भी गठबंधन का उम्मीदवार जीत की दहलीज पार नहीं कर सका, जिसने वोट ट्रांसफर की क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. इस नतीजे ने कई मुश्किल सवाल खड़े कर दिए हैं. अगर गठबंधन के साथी एक नियंत्रित चुनाव में भी एक-दूसरे को वोट ट्रांसफर नहीं कर सकते तो जमीनी स्तर पर यह साझेदारी कितनी असरदार है?

क्या BJP को अब भी JD(S) की जरूरत है?

सूत्रों का कहना है कि दिल्ली में सबसे अहम चर्चा बागी नेताओं की पहचान करने के बारे में नहीं, बल्कि खुद JD(S) की राजनीतिक अहमियत का आकलन करने के बारे में थी.

खबरों के मुताबिक, राज्य के नेताओं ने शुरू से ही JD(S) द्वारा तीसरा उम्मीदवार उतारने पर अपनी आपत्ति जताई थी. उनके अनुसार, गठबंधन के पास जीत के लिए जरूरी संख्या बल ही नहीं था. आपत्तियों के बावजूद उम्मीदवार उतारा गया और हार के बाद अब गठबंधन की निर्णय लेने की प्रक्रिया की कड़ी समीक्षा हो रही है. बीजेपी के कुछ हिस्सों में ये राय बन रही है कि JD(S) अब वैसी राजनीतिक ताकत नहीं रही जैसी कभी हुआ करती थी.

Advertisement

कुमारस्वामी के गढ़ में सेंधमारी

इस नए आकलन के पीछे एक अहम वजह वोक्कालिगा वोटरों के बीच बदलता राजनीतिक माहौल है. बीजेपी के कई नेताओं का मानना है कि इस प्रभावशाली समुदाय पर JD(S) की पारंपरिक पकड़ लगातार कमजोर हो रही है.

डी.के. शिवकुमार के उभार ने समीकरण बदल दिए हैं और कांग्रेस तेजी से वोक्कालिगा समुदाय का समर्थन हासिल कर रही है. यहां तक कि पुराने मैसूर इलाके में भी, जिसे लंबे वक्त से JD(S) का राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है, पकड़ कमजोर होने के संकेत नजरअंदाज करना मुश्किल हो रहा है.

बीजेपी के लिए ये एक रणनीतिक सवाल खड़ा करता है: क्या कमजोर होते सहयोगी पर निर्भर रहना समझदारी है या अपना खुद का सामाजिक गठबंधन बनाना बेहतर है?

लिंगायत और OBC समुदाय पर नजर

सूत्रों का कहना है कि बीजेपी की नजर नए सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले पर है. इसका जवाब नए सामाजिक समीकरण में मिल सकता है. खबरों के मुताबिक, कर्नाटक बीजेपी अपने पारंपरिक लिंगायत वोट बैंक और OBC समुदायों तक मजबूत पहुंच के आधार पर एक व्यापक गठबंधन बनाने की संभावना तलाश रही है. राज्य की आबादी में लिंगायतों की हिस्सेदारी लगभग 14-17 प्रतिशत है, जबकि OBC समुदाय सामूहिक रूप से कर्नाटक के मतदाताओं का लगभग एक-तिहाई हिस्सा हैं.

पार्टी के रणनीतिकार कुरुबा समुदाय के अंदर होने वाली हलचलों पर भी बहुत बारीकी से नजर रख रहे हैं. बीजेपी के एक वर्ग का मानना है कि सिद्धारमैया से जुड़े किसी भी राजनीतिक बदलाव या संक्रमण की स्थिति में कुरुबा मतदाताओं के अंदर गहरा असंतोष पैदा हो सकता है. ये स्थिति बीजेपी के लिए राज्य में एक नया राजनीतिक अवसर खोल सकती है, जिससे वो अपना दायरा बढ़ा सकते हैं.

अनुशासनहीनता का भुगतन होगा नतीजा

Advertisement

बीजेपी ने संदेश देते हुए साफ कर दिया है कि अनुशासनहीनता का नतीजा भुगतना होगा. बीजेपी नेता सी.टी. रवि के नेतृत्व में गठित फैक्ट-फाइंडिंग (तथ्य-खोज) कमेटी इस क्रॉस-वोटिंग मामले की अपनी विस्तृत रिपोर्ट जल्द ही केंद्रीय नेतृत्व को सौंपने वाली है. इस रिपोर्ट की समीक्षा के बाद क्रॉस-वोटिंग और भीतरघात में शामिल पाए जाने वाले सभी विधायकों के खिलाफ बेहद सख्त अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई की जानी पूरी तरह तय मानी जा रही है.

दिल्ली में हुए इस गंभीर मंथन से यह संदेश बिल्कुल साफ है कि बीजेपी नेतृत्व किसी भी स्तर पर विद्रोह को नजरअंदाज करने या राजनीतिक वास्तविकताओं से आंखें मूंदने के मूड में नहीं है. ये क्रॉस-वोटिंग विवाद केवल कुछ विधायकों को सजा देने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ये कर्नाटक के अंदर जेडी(एस) की प्रासंगिकता और एनडीए गठबंधन के पूरे भविष्य को एक नया आकार देने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »