केंद्र सरकार आगामी संसद के मानसून सत्र में 'प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर (अमेंडमेंट) बिल' पेश करने जा रही है. इसके जरिए देश के राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को भी राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान 'जन गण मन' की तरह कानूनी संरक्षण देने का प्रस्ताव है. यदि यह बिल संसद से पारित हो जाता है, तो वंदे मातरम् का अपमान करने, इसके गायन में बाधा डालने या व्यवधान पैदा करने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है.
फिलहाल 1971 के 'प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट' के तहत राष्ट्रगान 'जन गण मन', राष्ट्रीय ध्वज और संविधान का अपमान दंडनीय अपराध है. नए संशोधन के जरिए अब राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को भी इसी कानून के दायरे में लाया जाएगा.
वंदे मातरम् की 150वीं जयंती
सरकार का यह कदम ऐसे समय आया है, जब देशभर में वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है. पिछले कुछ महीनों में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गीत को लेकर कई अहम फैसले लिए हैं. इसी साल फरवरी में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों को निर्देश दिया था कि जिन सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगान 'जन गण मन' बजाया या गाया जाता है, वहां 'वंदे मातरम्' का गायन या वादन भी अनिवार्य किया जाए.
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इसके बाद जुलाई में गृह मंत्रालय ने राज्यों के मुख्य सचिवों को एक और पत्र भेजकर कहा कि यदि किसी सरकारी कार्यक्रम में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों प्रस्तुत किए जाएं, तो पहले वंदे मातरम् और उसके बाद जन गण मन प्रस्तुत किया जाए. मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे गाए जाएं. इस निर्देश को लेकर भी राजनीतिक बहस शुरू हो गई है.
छह अंतरों पर विवाद क्यों है?
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में वंदे मातरम् की रचना की थी और 1882 में प्रकाशित अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में इसे शामिल किया था. हालांकि, 1937 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने फैसला किया था कि सार्वजनिक आयोजनों में वंदे मातरम् के केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे. उस समय मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों ने बाद के अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भों पर आपत्ति जताई थी.
बीजेपी-कांग्रेस में फिर तेज हुई सियासत
प्रस्तावित विधेयक को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है. बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस और उसका इकोसिस्टम वंदे मातरम् से नफरत करता है. उन्होंने आरोप लगाया कि जवाहरलाल नेहरू ने मुस्लिम लीग के दबाव में राष्ट्रीय गीत को दो हिस्सों में बांट दिया था. वहीं, पिछले वर्ष संसद के शीतकालीन सत्र में भी यह मुद्दा गरमाया था.
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उस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति के लिए वंदे मातरम् की विरासत को कमजोर करने का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि इसके अंतरों को हटाने का फैसला देश के विभाजन की सोच को मजबूत करने वाला था. इसके जवाब में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था कि केवल पहले दो अंतरे गाने का फैसला अकेले नेहरू का नहीं था, बल्कि महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर समेत कई राष्ट्रीय नेताओं की सहमति से लिया गया था.
मानसून सत्र में हो सकती है तीखी बहस
सरकार का कहना है कि इस विधेयक का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को औपचारिक कानूनी संरक्षण देना है, न कि पुराने राजनीतिक विवादों को दोबारा खड़ा करना. हालांकि, विपक्ष के विरोध और इस मुद्दे के राजनीतिक महत्व को देखते हुए माना जा रहा है कि संसद के आगामी मानसून सत्र में इस बिल पर जोरदार बहस और हंगामा देखने को मिल सकता है.
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