अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर को मिले दान में गड़बड़ियों के आरोपों के बाद अब मंदिर ट्रस्ट और उसके वित्तीय लेनदेन की जांच की मांग तेज हो गई है. मामले में सीबीआई जांच और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) से ऑडिट कराने की मांग को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई हैं. याचिकाओं में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से गठित विशेष जांच दल (SIT) की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए गए हैं.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का CAG ऑडिट कराया जा सकता है? क्या देश के सबसे चर्चित धार्मिक ट्रस्ट में से एक को 'जनहित' के आधार पर CAG के दायरे में लाया जा सकता है? इस बहस के केंद्र में अब संविधान, CAG अधिनियम और कोर्ट की व्याख्याएं आ गई हैं.
क्यों उठ रही है CAG ऑडिट की मांग?
जनवरी 2024 में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद से लाखों श्रद्धालु अयोध्या पहुंच चुके हैं. मंदिर निर्माण और उससे पहले के वर्षों में देश-विदेश से करोड़ों लोगों ने नकद धनराशि, सोना, चांदी, आभूषण और अन्य मूल्यवान वस्तुएं दान की थीं.
हाल के दिनों में दान राशि के दुरुपयोग और वित्तीय गड़बड़ी के आरोप सामने आने के बाद कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि ट्रस्ट की इनकम और खर्चों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए. उनका तर्क है कि यह केवल एक धार्मिक संस्था नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है. ऐसे में पारदर्शिता तय करना जरूरी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर याचिका में न केवल जांच की मांग की गई है, बल्कि CAG ऑडिट कराने और वित्तीय लेनदेन की विस्तार से समीक्षा कराने की भी अपील की गई है.
CAG क्या है और इसकी शक्तियां क्या हैं?
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) का पद संविधान के आर्टिकल 148 से 151 के तहत स्टैब्लिश किया गया है. CAG का मुख्य काम केंद्र और राज्य सरकारों के वित्तीय लेनदेन, सरकारी विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों और सरकार की ओर से कंट्रोल होने वाली संस्थाओं के अकाउंट का ऑडिट करना है. सामान्य परिस्थितियों में CAG उन्हीं संस्थाओं का ऑडिट करता है जो, केंद्र या राज्य सरकार के अधीन हों, सरकारी कंपनियां हों, वैधानिक निगम (Statutory Corporations) हों, या सरकारी धन से संचालित संस्थाएं हों.
लेकिन CAG की शक्तियां केवल यहीं तक सीमित नहीं हैं. CAG (Duties, Powers and Conditions of Service) Act, 1971 की धारा 20 एक विशेष प्रावधान प्रदान करती है. इस धारा के अनुसार राष्ट्रपति, राज्यपाल या केंद्र शासित प्रदेश का प्रशासक "जनहित" में किसी ऐसी संस्था या निकाय के खातों का ऑडिट CAG को सौंप सकता है, जो सामान्य रूप से उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती. हालांकि इसके लिए कुछ शर्तें हैं.
इसमें सबसे जरूरी है कि ये मामला जनहित से जुड़ा होना चाहिए. संबंधित संस्था में सरकार का पर्याप्त निवेश या वित्तीय सहायता हो सकती है. राष्ट्रपति या राज्यपाल की ओर से औपचारिक अनुरोध होना चाहिए. ऑडिट से पहले संबंधित संस्था को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए. यानी कानून CAG को असाधारण परिस्थितियों में गैर-सरकारी संस्थाओं के ऑडिट का रास्ता देता है, लेकिन यह कोई अधिकार नहीं है.
दिल्ली DISCOM मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
इसी हफ्ते दिल्ली हाईकोर्ट में बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) और दिल्ली सरकार के बीच चल रहे विवाद में भी CAG ऑडिट का मुद्दा उठा. बिजली कंपनियों का तर्क था कि वे निजी संस्थाएं हैं और उनका CAG ऑडिट नहीं हो सकता. इससे पहले विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) ने कहा था कि पहली नजर में सार्वजनिक हित का ऐसा मामला नहीं दिखता जो ऑडिट को उचित ठहराए.
लेकिन सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि यदि CAG अधिनियम की धारा 20 की प्रक्रिया का पालन किया जाए तो CAG ऑडिट पर कोई स्पष्ट कानूनी रोक नहीं है. अदालत ने यह भी माना कि उपभोक्ताओं के हित प्रभावित होने के कारण मामला जनहित से जुड़ा हो सकता है. यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या सार्वजनिक महत्व रखने वाली अन्य संस्थाओं पर भी धारा 20 लागू हो सकती है.
क्या राम मंदिर ट्रस्ट 'जनहित' की कसौटी पर खरा उतरता है?
राम जन्मभूमि मामले में याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि राष्ट्रीय महत्व की संस्था है.
याचिका में कहा गया है कि, 'मंदिर को देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालुओं का दान मिलता है. मंदिर का निर्माण और संचालन व्यापक सार्वजनिक भागीदारी से जुड़ा है.
वित्तीय अनियमितताओं के आरोप करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसी स्थिति में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी है. हालांकि जब मामले का जिक्र इलाहाबाद हाईकोर्ट में किया गया तो अदालत ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार पहले ही SIT जांच का आदेश दे चुकी है.
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि केवल 'जनहित" का तर्क CAG ऑडिट के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता. कानूनी फर्म सराफ एंड पार्टनर्स के पार्टनर गौहर मिर्जा के अनुसार, CAG की शक्तियां व्यापक जरूर हैं लेकिन असीमित नहीं. उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के BSES फैसले से यह स्पष्ट है कि CAG सार्वजनिक धन या सरकारी सब्सिडी के उपयोग की जांच कर सकता है, लेकिन इससे उसे किसी निजी संस्था के पूरे कामकाज की जांच करने का सामान्य अधिकार नहीं मिल जाता.
मिर्जा के अनुसार, राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट जैसी संस्था का ऑडिट तभी संभव होगा जब वह धारा 20 के तहत निर्धारित कानूनी मानदंडों को पूरा करे. उन्होंने कहा कि यदि किसी संस्था में सरकारी स्वामित्व, पर्याप्त सरकारी वित्तपोषण या धारा 20 के तहत विशेष आदेश नहीं है, तो केवल सार्वजनिक महत्व के आधार पर CAG उसका ऑडिट नहीं कर सकता.
सबसे बड़ी कानूनी बाधा क्या है?
वरिष्ठ अधिवक्ता आमिर खान वली का मानना है कि राम मंदिर का मामला कानूनी रूप से और भी जटिल है. उनके अनुसार, अक्सर 'जनहित' शब्द को गलत तरीके से समझा जाता है. CAG कोई ऐसा सार्वभौमिक निगरानी संस्थान नहीं है जो हर महत्वपूर्ण संस्था का ऑडिट कर सके. वह कहते हैं कि असली सवाल यह है कि ट्रस्ट पर CAG के अधिकार क्षेत्र का कानूनी आधार क्या होगा?
क्या राम जन्मभूमि ट्रस्ट CAG के सामान्य दायरे में आता है?
वर्तमान स्थिति में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट कई कारणों से CAG के पारंपरिक अधिकार क्षेत्र से बाहर दिखाई देता है. क्योंकि यह ट्रस्ट कोई सरकारी विभाग नहीं है, कोई सरकारी कंपनी नहीं है, कोई वैधानिक निगम नहीं है, संसद द्वारा बनाए गए कानून से स्थापित संस्था नहीं है और इसे बड़े पैमाने पर सरकारी अनुदान नहीं मिलता.
हालांकि ट्रस्ट का गठन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद केंद्र सरकार द्वारा किया गया था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह स्वतः सरकारी संस्था बन गया. यही वजह है कि कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मंदिर की लोकप्रियता या राष्ट्रीय महत्व CAG ऑडिट का पर्याप्त आधार नहीं बन सकता.
क्या पहले भी मंदिरों का ऑडिट हुआ है?
भारत में मंदिरों के ऑडिट के उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन उनकी परिस्थितियां अलग थीं. जैसे पद्मनाभस्वामी मंदिर...
केरल के प्रसिद्ध पद्मनाभस्वामी मंदिर में संपत्ति और खजाने की जांच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई थी. यह ऑडिट CAG ने नहीं किया था, बल्कि अदालत द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञों और ऑडिटरों की टीम ने किया था. यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए कराई थी.
सबरीमाला मंदिर:
सबरीमाला मंदिर का मामला अलग है. इसका प्रबंधन त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड करता है, जो राज्य कानून के तहत गठित संस्था है और सरकारी निगरानी में काम करती है. यही कारण है कि देवस्वम बोर्ड CAG के अधिकार क्षेत्र में आता है और उसके खातों का ऑडिट किया जा सकता है.
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल राम मंदिर दान विवाद की जांच SIT कर रही है. लेकिन यदि याचिकाकर्ता CAG ऑडिट की मांग को आगे बढ़ाते हैं तो अदालतों को यह तय करना होगा कि क्या राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को धारा 20 के तहत "जनहित" के आधार पर ऑडिट के दायरे में लाया जा सकता है. यह मामला केवल राम मंदिर तक सीमित नहीं है. अदालत का फैसला भविष्य में देश की अन्य बड़ी धार्मिक और चैरिटेबल संस्थाओं पर भी असर डाल सकता है.
यानी बहस सिर्फ इतनी नहीं है कि राम मंदिर ट्रस्ट का ऑडिट होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह भी है कि भारत में सार्वजनिक महत्व रखने वाली निजी या धार्मिक संस्थाओं की वित्तीय जवाबदेही की सीमा आखिर क्या होनी चाहिए?
अनीषा माथुर