कभी-कभी कुछ विदाइयां ऐसी होती हैं, जो सिर्फ एक इंसान को नहीं ले जातीं... पूरे माहौल को भीतर तक हिला देती हैं. गुजरात के नवसारी में भी ऐसा ही कुछ हुआ. यह कहानी है राजू पटेल की... और उनकी मां की अंतिम यात्रा की. मां नहीं रहीं. घर में सन्नाटा था, आंखों में आंसू थे और दिल में खालीपन. राजू पटेल के सामने सिर्फ दुख नहीं था... एक जिम्मेदारी भी थी कि अपनी मां को ऐसे विदा करना, जैसा उन्होंने जीवन भर सम्मान के साथ जिया था.
नवसारी की गलियों में उस दिन जो दृश्य बना, वह किसी आम अंतिम यात्रा जैसा नहीं था. राजू पटेल ने अपनी मां के अंतिम संस्कार को एक श्रद्धांजलि जुलूस में बदल दिया. फूलों से सजा वाहन... सजे हुए घोड़े... और पीछे बजता बैंड-बाजा... यह सब देखकर एक पल को ऐसा लगा जैसे कोई उत्सव हो. लेकिन यह उत्सव खुशी का नहीं था... यह प्रेम का था, विदाई का था.
जैसे ही यह अनोखी अंतिम यात्रा सड़कों पर निकली, लोग खुद को रोक नहीं पाए. रिश्तेदार आए, दोस्त जुड़े और फिर धीरे-धीरे पूरा मोहल्ला उसका हिस्सा बन गया. किसी ने फूल चढ़ाए, किसी ने हाथ जोड़कर श्रद्धांजलि दी, और किसी ने सिर्फ खामोशी से उस बेटे की हिम्मत को महसूस किया.
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बैंड बज रहा था... लेकिन उसमें खुशी नहीं थी. घोड़ों की चाल थी... लेकिन उसमें कोई रफ्तार नहीं थी. हर चीज के बीच एक अजीब सी खामोशी थी, जो सिर्फ महसूस की जा सकती थी. लोगों की आंखें नम थीं, शब्द गायब थे. क्योंकि सामने जो दृश्य था, वह किसी कहानी जैसा नहीं... एक सच था.
राजू पटेल के लिए यह सिर्फ अंतिम संस्कार नहीं था. यह एक बेटे के द्वारा अपनी मां को दिया गया आखिरी सम्मान था. उन्होंने मां के जीवन भर के प्रेम, त्याग और संस्कारों को इस विदाई में समेटने की कोशिश की. फूल, संगीत और जुलूस- सब कुछ एक ही भावना में बंधा हुआ था.
आमतौर पर अंतिम यात्रा दुख की होती है... लेकिन नवसारी की इस यात्रा ने एक अलग ही तस्वीर पेश की. यहां दुख भी था... और सम्मान भी. आंसू भी थे... और अपनापन भी. मां पंचतत्व में विलीन हो गईं. लेकिन जो दृश्य नवसारी की सड़कों पर बना, वह लोगों के दिलों में रह गया.
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