सीमांचल से फिर मैदान में ओवैसी, क्या 2020 की तरह 2024 में भी बदलेंगे गेम?

बिहार में 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए अभी से ही सियासी समीकरण सेट किए जाने लगे हैं. बीजेपी और महागठबंधन के बाद आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के चीफ असदुद्दीन ओवैसी भी सीमांचल में दस्तक देने जा रहे हैं. मुस्लिम बहुल सीमांचल में पदयात्रा करके ओवैसी क्या 2020 जैसे नतीजे 2024 में दोहरा पाएंगे?

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बिहार के सीमांचल में असदुद्दीन ओवैसी बिहार के सीमांचल में असदुद्दीन ओवैसी

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली ,
  • 14 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 12:05 PM IST

बिहार में सियासी बदलाव के बाद से सूबे के मुस्लिम बाहुल इलाके सीमांचल की राजनीतिक तपिश बढ़ गई है. नीतीश कुमार के अलग होने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सीमांचल से ही बीजेपी के मिशन-बिहार का आगाज किया था तो उसी मैदान में नीतीश-तेजस्वी यादव ने संयुक्त रूप से महागठबंधन की रैली पूर्णिया में करके अपनी ताकत दिखाई थी. वहीं, अब अपनी सियासी जमीन को बचाने के लिए आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के चीफ असदुद्दीन ओवैसी उतर रहे हैं. 

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सीमांचल में ओवैसी की पदयात्रा

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवासी सीमांचल का दो दिवसीय पर इसी सप्ताह शनिवार को पहुंच रहे हैं. ओवैसी 18 और 19 मार्च को सीमांचल के पूर्णिया और किशनगंज जिले में ' सीमांचल अधिकार पदयात्रा' करेंगे. AIMIM के बिहार प्रदेश अध्यक्ष और विधायक अख्तरुल ईमान ने aajtak.in से बताया कि असदुद्दीन ओवैसी दो दिवसीय दौरे पर सीमांचल में पदयात्रा करने के साथ-साथ अमौर और किशनगंज में जनसभा भी करेंगे. उन्होंने कहा कि सीमांचल के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए मौजूदा सरकार कुछ नहीं कर पा रही है. 

सीमांचल के विकास एजेंडो को लेकर भले ही ओवैसी पदयात्रा पर उतर रहे हों, लेकिन इसके पीछे उनका सियासी मकसद भी छिपा हुआ है. बिहार में सियासी बदलाव और AIMIM के पांच में से चार विधायक आरजेडी में जाने के बाद ओवैसी के लिए सूबे में अपनी सियासी जमीन को बचाए रखने की चुनौती है. 2020 में ओवैसी की पार्टी को सीमांचल इलाके की सीटों पर जीत मिली थी. ऐसे में ओवैसी का बिहार में सारा सियासी दारोमदार मुस्लिम बहुल सीमांचल पर ही टिका है, जिसे बचाए रखने के लिए उतर रहे हैं. 

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सीमांचल ओवैसी की प्रयोगशाला

बिहार के सीमांचल का इलाका असम और पश्चिम बंगाल के साथ-साथ लगा हुआ है, यहां पर 40 से 70 फीसदी तक मुस्लिम आबादी है. ओवैसी ने बिहार में इसी सीमांचल के इलाके को अपनी सियासी प्रयोगशाला बनाया है. 2015 के चुनाव में उन्हें भले ही सफलता नहीं मिली, उसके बाद मशक्कत कर सीमांचल में अच्छा खासा जनाधार बनाया है, जिसका नतीजा 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान किशनगंज सीट पर दिखा था. यहां ओवैसी की पार्टी को करीब 3 लाख मत मिले थे, जो 26.78 प्रतिशत था. 

2019 में किशनगंज सीट पर AIMIM नहीं जीत सकी, लेकिन ओवैसी के लिए एक उम्मीद जरूर जगा दी थी. उसी साल किशनगंज विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में AIMIM की प्रत्याशी कमरुल होदा की शानदार जीत के साथ बिहार में खाता खोलने में कामयाब रही थी. इसके बाद 2020 में ओवैसी की पार्टी के पांच विधायक सीमांचल के इलाके से जीत दर्ज किए थे, लेकिन बाद में चार विधायकों ने आरजेडी का दामन थाम लिया. यह ओवैसी के लिए बिहार में बड़ा सियासी झटका था. 

असदुद्दीन ओवैसी 2024 के लोकसभा और 2025 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए सीमांचल पर फोकस करने का प्लान बनाया है, जिसके तहत दो पुर्णिया और किशनगंज में पदयात्रा करने के साथ-साथ जनसभा करेंगे. ओवैसी का कदम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके डिप्टी तेजस्वी प्रसाद यादव के लिए चिंतित बढ़ा सकता है, क्योंकि महागठबंधन का सियासी आधार भी सीमांचल में मुस्लिम वोटों पर टिका है. वहीं, ओवैसी की सियासी वजूद बिहार में मुस्लिमों को ही निर्भर करता है और 2022 में मुस्लिम वोटों के दम पर ही जीत सके थे, लेकिन 2024 में 2020 की तरह नतीजे दोहराने की चुनौती खड़ी हो गई है. 

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बिहार में मुस्लिम सियासत

बिहार में मुस्लिम समुदाय की आबादी 16 फीसदी है. सूबे की कुल 243 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक स्थिति में हैं. इन इलाकों में मुस्लिम आबादी 20 से 40 प्रतिशत या इससे भी अधिक है. बिहार की 11 सीटें हैं जहां 40 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं और 7 सीटों पर 30 फीसदी से ज्यादा हैं. इसके अलावा 29 विधानसभा सीटों पर 20 से 30 फीसदी के बीच मुस्लिम मतदाता हैं. सीमांचल के इलाके में मुस्लिम समुदाय की आबादी 40 से 70 फीसदी के करीब है. 

सीमांचल का समीकरण 

बिहार के सीमांचल क्षेत्र में 4 लोकसभा सीटें और 24 विधानसभा सीटें आती हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार एनडीए के साथ रहते हुए जेडीयू को दो सीटों पर जीत हासिल की थी और बीजेपी ने एक सीट पर कब्जा जमाया था जबकि एक सीट कांग्रेस को मिली थी. 2020 के विधानसभा चुनाव में सीमांचल की 24 विधानसभा सीटों में से बीजेपी आठ, कांग्रेस पांच और जेडीयू चार सीटें जीती थीं. आरजेडी और भाकपा माले ने एक-एक सीट जीती थी. एआईएमआईएम ने पांच सीटें जीती थीं, जिनमें से चार पिछले साल आरजेडी में शामिल हो गए हैं. ऐसे में आरजेडी के पांच और ओवैसी की पार्टी के एक विधायक सीमांचल में है. 

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ओवैसी फैक्टर से क्या होगा

बिहार में राजनीतिक बदलाव के बाद बीजेपी अपने खुद के दम पर खड़े होना चाहती है, जिसके लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सीमांचल के पूर्णिया में रैली करके ही हुंकार भरी थी. सीमांचल के किशनगंज लोकसभा सीट से एक समय बीजेपी के शाहनवाज हुसैन सांसद रह चुके हैं और अब बिहार में वो सक्रिय हैं. ओवैसी दोबारा से सीमांचल में फिर सक्रिय हैं तो बीजेपी की नजर भी इसी इलाके पर है. 

ओवैसी के बिहार के चुनावी मैदान में उतरने से बीजेपी को 2020 में सीमांचल में सियासी फायदा मिला था. सबसे ज्यादा 8 जीती थी. हाल ही में गोपालगंज और कुढ़नी विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में AIMIM ने महागठबंधन का सारा खेल बिगाड़ दिया था.  उपचुनाव में AIMIM ने मुस्लिम वोटों को अपने साथ जोड़ने में सफल रही थी, जिसका लाभ बीजेपी को मिला और वो दोनों सीटों पर जीत दर्ज की थी. गोपालगंज उपचुनाव में एआईएमआईएम के अब्दुल सलाम को 12,212 मत मिले थे जबकि आरजेडी को बीजेपी ने महज 1,794 मतों के अंतर से हराया था. 

ओवैसी किसकी बढ़ाएंगें चिंता

ओवैसी के सीमांचल दौरे से महागठबंधन की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि मुस्लिम वोटों में सिर्फ बिखराव का खतरा नहीं बल्कि हिंदू और मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की भी संभावना है. सीमांचल का इलाका भले ही मुस्लिम बहुल है, लेकिन यहां अति पिछड़ा और पिछड़ा वोटर की भी अच्छी खासी आबादी है. आरजेडी यहां पर मुस्लिम-यादव समीकरण के जरिए मजबूत मानी जाती है तो जेडीयू मुस्लिम और अतिपिछड़े के दम पर जीतती रही है. 

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बीजेपी बिहार में नीतीश से अलग होने के बाद खुलकर हिंदुत्व का कार्ड खेल रही है और हिंदू वोटों को अपनी छतरी के नीचे लाने की कवायद में जुटी है. पुर्णिया की रैली में अमित शाह ने जिस तरह से नीतीश सरकार पर ध्रुवीकरण का आरोप लगाया है, उसे भी यह संकेत मिलने लगे हैं. असदुद्दीन ओवैसी भी लगातार नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को निशाने पर ले रहे हैं और महागठबंधन पर मुस्लिमों व सीमांचल के साथ भेदभाव करने का आरोप लगा रहे हैं. ऐसे में देखना है कि सीमांचल का सियासी मिजाज क्या रुख लेता है? 

 

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