India Fertility Rate: भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है जिसकी जनसंख्या लगभग 1.46 अरब है. लेकिन अब रिपोर्ट सामने आई है कि अब भारत की महिलाएं पहले जितने बच्चे नहीं पैदा कर रहीं. UN की संस्था UNFPA की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) गिरकर 1.9 पर आ गया है जो रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से कम है. इसका मतलब है कि भारत में जितने बच्चे पैदा हो रहे हैं वे अगली पीढ़ी की आबादी बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क ने भी इस पर चिंता जताई है. तो आइए जानते हैं भारत की फर्टिलिटी रेट क्यों कम हो रही है और इसके क्या मायने हैं?
UN की ऑर्गनाइजेशन यूनाइटेड नेशन पॉपुलेशन फंड (UNFPA) के मुताबिक, किसी भी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए एक तय मानक होता है जिसे रिप्लेसमेंट लेवल कहा जाता है. आबादी को स्टेबल रखने के लिए 2.1 का फर्टिलिटी रेट होना जरूरी माना जाता है लेकिन भारत का ओवरऑल TFR अब घटकर सिर्फ 1.9 रह गया है. आसान शब्दों में समझें तो रिप्लेसमेंट लेवल वह प्रजनन दर (2.1 बच्चे प्रति महिला) है जिस पर एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को पूरी तरह रिप्लेस कर सके ताकि जनसंख्या स्थिर बनी रहे और बढ़ने या घटने में न हो.
डेटा से साफ है कि भारत में जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार अब धीमी पड़ने लगी है. द लैंसेट में पब्लिश हुई एक रिसर्च स्टडी के मुताबिक, साल 1950 में भारत में फर्टिलिटी रेट 6.18 था जो साल 2021 तक आते-आते 1.91 पर सिमट गई थी और अब यह और भी नीचे जा चुकी है.
दिल्ली और बड़े शहरों का सबसे बुरा हाल
रिपोर्ट का कहना है कि यह गिरावट पूरे देश में एक जैसी नहीं है बल्कि अर्बन एरिया यानी शहरों में यह बेहद चौंकाने वाली है. देश की राजधानी दिल्ली का फर्टिलिटी रेट घटकर महज 1.2 हो गया है जो फिनलैंड जैसे यूरोपीय देश से भी कम है. द इकोनॉमिस्ट की एक एनालिसिस रिपोर्ट बताती है कि भारत की जनसंख्या जल्द ही बहुत तेजी से नीचे गिरने लगेगी.
SRS स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट 2024 के मुताबिक देश के सिर्फ 6 राज्यों में फर्टिलिटी रेट अभी भी रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से ऊपर है और ये सभी उत्तर भारत के राज्य हैं बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड। इनमें सबसे ज्यादा TFR बिहार क है जो 2.9 है.
एजुकेशन और करियर फर्स्ट: SRS रिपोर्ट के मुताबिक पढ़ी-लिखी महिलाओं में TFR 1.8 है जबकि कम पढ़ी-लिखी महिलाओं में यह 3.3 है. यानी जैसे-जैसे महिलाएं अधिक शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और करियर बना रही हैं, शादी और बच्चे पैदा करने की उम्र बढ़ती जा रही है. देर से शादी, करियर पर फोकस और फैमिली प्लानिंग तक बेहतर पहुंच इस बदलाव की अहम वजहें हैं.
शहरीकरण और महंगाई: शहरों में रहने की लागत ज्यादा होती है. घर, हेल्थकेयर और बच्चों की एजुकेशन महंगी है इसलिए लोग छोटे परिवार को ज्यादा बेहतर मानते हैं. अर्बन इंडिया में TFR काफी नीचे आ गई है जबकि रूरल इंडिया में यह अभी रिप्लेसमेंट लेवल के आसपास ही है. यही वजह है कि दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में फर्टिलिटी रेट सबसे कम है.
फैमिली प्लानिंग तक बेहतर पहुंच: मॉडर्न फैमिली प्लानिंग मेथड्स को अपनाने की दर 2015-16 के 47.8% से बढ़कर 2019-21 में 56.5% हो गई है. इसके साथ ही फैमिली प्लानिंग की अनमेट नीड भी घटी है. UN के मुताबिक इससे यह साफ होता है कि भारत की हेल्थ पॉलिसी और फैमिली प्लानिंग सिस्टम काम कर रहे हैं.
बदलती सोच और सोशल प्रेशर: युवा पीढ़ी अब करियर ग्रोथ, फाइनेंशियल सिक्योरिटी और पर्सनल लाइफ को पहले रख रही है. UNFPA के सर्वे में सामने आया कि भारत में 5 में से 1 महिला ने कम्युनिटी के प्रेशर की वजह से उससे ज्यादा बच्चे पैदा किए जितना वो चाहती थी. वहीं 30 फीसदी महिलाओं ने बताया कि जब वो प्रेग्नेंसी नहीं चाहती थीं तब उन पर प्रेशर डाला गया. यह बताता है कि फर्टिलिटी डिसीजन में महिलाओं की अपनी चॉइस भी बढ़ रही है.
क्लाइमेट चेंज और बढ़ती गर्मी: फर्टिलिटी रेट गिरने की एक कम चर्चित लेकिन असली वजह क्लाइमेट चेंज भी है. UCLA के एनवायरनमेंटल इकोनॉमिस्ट एलन बैरेका की रिसर्च के मुताबिक, बहुत ज्यादा गर्मी का फर्टिलिटी और बर्थ रेट पर सीधा नेगेटिव असर पड़ता है. भारत जैसे देश के लिए यह खास तौर पर अहम है जहां हर साल हीटवेव की तीव्रता बढ़ रही है. NIH में पब्लिश एक सिस्टमेटिक रिव्यू के अनुसार PM2.5 जैसे पॉल्यूटेंट्स और एक्सट्रीम टेंपरेचर का एक्सपोजर फर्टिलिटी घटाने, मिसकैरिज का रिस्क बढ़ाने और प्रीटर्म बर्थ से सीधे जुड़ा हुआ पाया गया है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के डेमोग्राफी एक्सपर्ट डॉ. मोरध्वज धाकड़ का मानना है कि फर्टिलिटी रेट गिरने के पीछे आज के समाज में महिलाओं पर बढ़ता दोहरा बोझ है. आज महिलाएं करियर तो बना रही हैं लेकिन घर और बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है. इस डबल रोल और स्ट्रेस के कारण अब महिलाएं या तो लेट फैमिली प्लानिंग कर रही हैं या फिर सिंगल चाइल्ड पॉलिसी अपना रही हैं. इसके अलावा सरकार के 'हम दो, हमारे दो' जैसे जागरूकता अभियानों ने भी ग्रामीण इलाकों तक लोगों की सोच को बदल दिया है.
स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट डॉ. मार्टिन कोल्क के मुताबिक, अब लोगों के लिए एक अच्छी जिंदगी जीने के लिए बच्चे पैदा करना पहली शर्त नहीं रह गया है. दुनिया भर में लाइफस्टाइल बदल रही है लोग देर से शादी कर रहे हैं या सिंगल रहना पसंद कर रहे हैं. स्मार्टफोन और डिजिटल दुनिया में खोए रहने के कारण लोगों का आपसी संपर्क (इन-पर्सन इंटरैक्शन) कम हुआ है, जिससे कपल्स बनने और परिवार शुरू करने की दरें घटी हैं.
एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि अगर फर्टिलिटी रेट रिप्लेसमेंट लेवल से बहुत ज्यादा नीचे (जैसे 1.5 से कम) चला गया तो देश पर बुजुर्गों की आबादी का बोझ बढ़ जाएगा. डॉ. कोल्क ने दक्षिण कोरिया का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां हर एक नवजात बच्चे के मुकाबले 55 साल से ऊपर के साढ़े तीन लोग हैं. यदि भारत ने अभी से प्रो-फैमिली (परिवारों के अनुकूल) पॉलिसीज नहीं बनाईं तो आने वाले समय में देश के पास काम करने वाले युवाओं की कमी हो जाएगी और बुजुर्गों की सोशल सिक्योरिटी संभालना मुश्किल हो जाएगा.
क्या आबादी अभी भी बढ़ेगी?
UNFPA की स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन 2025 की रिपोर्ट का कहना है कि भारत की आबादी अगले 40 साल में 1.7 अरब तक पहुंचेगी और उसके बाद घटने लगेगी. फिलहाल भारत की आबादी 1.46 अरब से ज्यादा है और 2023 में इसने चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बनने का रिकॉर्ड बनाया था.
बिजनेस टुडे का कहना है कि फर्टिलिटी रेट रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाने का मतलब ये नहीं कि आबादी तुरंत घट जाएगी. पिछली जनरेशन की वजह से ग्रोथ कुछ सालों तक जारी रह सकती है लेकिन लंबे समय तक फर्टिलिटी रेट कम रहने से आबादी की ग्रोथ धीमी होगी, सोसायटी बूढ़ी होगी और वर्कफोर्स छोटा होता जाएगा.
मृदुल राजपूत