कूल्हे की हड्डी में चोट लगने को हल्के में नहीं लेना चाहिए. जर्नल ऑफ़ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में छपी एक नई स्टडी में इसको जानलेवा बताया गया है. स्टडी में कहा गया है कि हिप फ्रैक्चर (कूल्हे की हड्डी टूटना) बुजुर्गों में जानलेवा साबित हो सकता है. रिसर्च में पता चला है कि हिप फ्रैक्चर के बाद एक साल के भीतर औसत 5 में से 1 मरीजों की मौत हो जाती है, वहीं, केवल 42% से 71% मरीज ही छह महीने के भीतर पहले की तरह रोजमर्रा के काम करने लायक हो पाते हैं.
दुनियाभर में हर साल 1.42 करोड़ से अधिक लोग हिप फ्रैक्चर का शिकार होते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल हड्डी टूटने की समस्या नहीं है, बल्कि इससे व्यक्ति की चलने-फिरने की क्षमता, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर भी गहरा असर पड़ता है. रिसर्च में यह भी बताया गया है कि हिप की हड्डी टूटने का रिस्क पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक होता है. इसका एक कारण मेनोपॉज के बाद होने वाली ऑस्टियोपोरोसिस की बीमारी भी है. इसमें बढ़ती उम्र में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं. ऐसे में किसी चोट लगने पर कूल्हे की हड्डी टूटने का रिस्क बढ़ जाता है. पुरुषों में बढ़ती उम्र में खासतौर पर 55 साल की उम्र के बाद खतरा अधिक होता है. इसके अलावा जिन लोगों में विटामिन डी और कैल्शियम की बहुत कमी होती है उनको भी रिस्क होता है.
हर मिनट करीब 27 लोगों को हिप फ्रैक्चर होता है
रिसर्च में बताया गया है कि दुनियाभर में हर मिनट में करीब 27 लोगों को हिप फ्रैक्चर होता है. अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यह समस्या खासतौर पर बुजुर्गों के लिए बेहद गंभीर है. उनमें मौत का खतरा सबसे अधिक होता है. 50 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं में फ्रैक्चर का रिस्क 22.9% है, जबकि पुरुषों में यह 10.7% है. रिसर्च में यह भी बताया गया है कि अधिकतर मामलों में हिप फ्रैक्चर अचानक गिरने के कारण होती है. ऐसा मांसपेशियों का कमजोर होना, आंखों की रोशनी कम होना या फिर किसी दिमागी समस्या के कारण चक्कर आना शामिल है.
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कैसे होता है हिप फ्रैक्चर का इलाज
हिप फ्रैक्चर का इलाज हिप जॉइंट रिप्लेसमेंट, ओपन रिडक्शन एंड इंटरनल फिक्सेशन (ORIF), जिसमें प्लेट, स्क्रू या रॉड की मदद से टूटी हड्डी को जोड़ा जाता है. इस इंजरी वाले सभी मरीजो में सर्जरी के बाद फिजियोथेरेपी की जाती है, ताकि मरीज जल्द दोबारा चल-फिर सके और मांसपेशियों की ताकत वापस आ सके. कुछ मामलों में रिहैब की जरूरत भी पड़ सकती है. रिसर्च में बताया गया है कि दोबारा फैक्चर से बचने के लिए केवल ऑपरेशन ही काफी नहीं है, मरीजों को भविष्य में हड्डी टूटने से बचाने के लिए डॉक्टर बिसफॉस्फोनेट्स, डेनोसुमैब जैसी दवाएं दे सकते हैं.
बचाव के लिए क्या करें?
रोज एक्सरसाइज करें
घर में फिसलन और ठोकर लगने वाली चीजें हटाएं
विटामिन D और कैल्शियम की पर्याप्त मात्रा लें
डॉक्टर की सलाह के बिना ऐसी दवाएं न लें, जिनसे चक्कर या गिरने का खतरा बढ़ता हो
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