दुनिया में चल रही कुल लड़ाइयों में 40 फीसदी अफ्रीका में, फिर क्यों वहां शांति दूत नहीं मंडरा रहे?

युद्ध की बात करें तो इन दिनों सबसे ज्यादा खून अफ्रीका में बह रहा है. इंटरनेशनल रेड क्रॉस कमेटी (आईसीआरसी) मानती है कि अफ्रीका में 50 से ज्यादा सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं. यह दुनिया में हो रही कुल लड़ाइयों का 40 फीसदी है. लेकिन जंग का जिक्र आने पर रूस-यूक्रेन या इजरायल-हमास पर ही चिंता दिखती है.

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रेड क्रॉस कमेटी के मुताबिक, अफ्रीका में न केवल सबसे ज्यादा संघर्ष जारी हैं, बल्कि वे बढ़ भी रहे हैं. (Photo- Pixabay) रेड क्रॉस कमेटी के मुताबिक, अफ्रीका में न केवल सबसे ज्यादा संघर्ष जारी हैं, बल्कि वे बढ़ भी रहे हैं. (Photo- Pixabay)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 4:36 PM IST

बीते चार सालों से कई देश लगातार युद्ध में लगे हुए हैं. इनमें पहला नाम रूस और यूक्रेन का आता है. मॉस्को से खुद को बचाने के लिए करीब-करीब पूरा यूरोप एकजुट होकर यूक्रेन के साथ आ गया. मिडिल ईस्ट में गाजा पट्टी हमास और इजरायल का मैदान बनी हुई है. हाल में अमेरिका ने कई देशों को धमकाना शुरू किया. लेकिन ये तमाम लड़ाइयां मिलकर भी अफ्रीकी संघर्ष के आगे कुछ नहीं. इसके बाद भी अफ्रीका नजरअंदाज किया जाता रहा. 

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क्या कहता है डेटा

इंटरनेशनल कमेटी ऑफ रेड क्रॉस (आईसीआरसी) के मुताबिक अफ्रीका में लगभग 50 से ज्यादा सक्रिय युद्ध एक साथ चल रहे हैं. ये दुनिया भर में चल रहे कुल कन्फ्लिक्ट का 40 फीसदी है, यानी हर 10 में 4 लड़ाइयां यहीं होती हैं. पिछले कुछ सालों में यह आंकड़ा भी बढ़कर 45 फीसदी के आसपास पहुंच गया. 

यूरोप से तुलना करें तो इस साल यूरोप में भी कई कनफ्लिक्ट्स हैं लेकिन अफ्रीका से कहीं कम हैं. सबसे बड़ा युद्ध रूस-यूक्रेन के बीच है, जो फरवरी 2022 से जारी है. यूरोप के कुछ हिस्सों में सीमावर्ती या लोकल तनाव भी हैं, लेकिन इनका स्तर खुले संघर्ष से काफी कम है. मतलब यूरोप की लड़ाइयां कम हैं, लेकिन उनका इंटरनेशनल असर ज्यादा है. यूएन समेत तमाम बड़े मंच उन्हीं की बात कर रहे हैं. सारे शांति प्रयास वहीं के लिए हो रहे हैं. 

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अफ्रीका में पीसकीपिंग फोर्स को भेजने का प्रस्ताव कम ही जाता है. (Photo- Pixabay)

कहां-कहां चल रही लड़ाइयां

सूडान में लगभग तीन सालों से देश की दो बड़ी फोर्स उलझी हुई हैं. सूडानी आर्मी और पैरामिलिट्री फोर्स के बीच लड़ाई राजधानी तक पहुंच चुकी. इससे आम लोग भी अछूते नहीं रहे. संघर्ष में हजारों लोग मारे जा चुके, जबकि लाखों लोग देश के भीतर या बाहर पलायन कर गए. 

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो यानी डीआरसी के ईस्टर्न हिस्से में कई अलग-अलग सशस्त्र समूह एक्टिव हैं. सबको जमीन, खनिज और सत्ता पर कब्जा चाहिए. इसके लिए वे आपस में लड़ रहे हैं, जिसका असर नागरिकों तक पहुंच चुका. 

सहेल क्षेत्र में आने वाले माली, बुर्किना फासो और नाइजर में आतंकवादी और अलगाववादी समूहों के साथ सरकारों की लड़ाई चल रही है. ये समूह अलकायदा और इस्लामिक स्टेट से जुड़े हैं, और बेहद खूंखार हैं. महिलाओं की स्थिति यहां खासकर खराब है.

सोमालिया में अल-शबाब जैसे कट्टर समूह, सरकार और इंटरनेशनल सेनाओं के साथ लगातार लड़ाई कर रहे हैं. बम धमाके, अपहरण और नागरिकों पर हमले यहां आम हैं. 

इथियोपिया और इरिट्रिया में भी लड़ाई चलती रही. यहां तक कि इनकी जंग की तुलना दूसरे विश्व युद्ध से होती है, जिसमें जानमाल का भारी नुकसान हुआ. ये युद्ध इतना घातक है कि इसमें बाहरी देश भी दखल देने से बचते रहे. 

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क्यों फोकस यहां नहीं है

अफ्रीकी युद्धों को नजरअंदाज किए जाने की एक वजह यह है कि ये लड़ाइयां सीधे ग्लोबल ताकतों के हितों पर असर नहीं डालतीं. जब कहीं ऐसा युद्ध होता है जिससे तेल, गैस, व्यापार या यूरोप-अमेरिका की सुरक्षा पर असर पड़े, तो लड़ाई तुरंत सुर्खियों में आ जाती है. लेकिन अफ्रीका के ज्यादातर युद्ध स्थानीय हैं. वे जातीय संघर्ष हैं, जिन्हें स्थानीय रिसोर्स चाहिए. इसका सीधा असर बाहरी दुनिया पर तुरंत नहीं पड़ता इसलिए वैश्विक राजनीति में इन्हें सेकेंडरी टकराव की तरह देखते हैं. 

सालों से चले आ रहे घरेलू संघर्षों में कई अफ्रीकी देश बदहाल हो चुके. (Photo- Pexels)

अपने हाल पर छोड़े जा चुके

इस महाद्वीप के युद्ध धीरे-धीरे नॉर्मलाइज कर दिए गए हैं. यह भी नस्लवाद की एक मिसाल ही है. दशकों तक हिंसा में लिथड़ा अफ्रीका हिंसा और गरीबी का दूसरा नाम बन गया. इसमें किसी को भी कोई इमरजेंसी नहीं दिखती. यही वजह है कि मौतों और माइग्रेशन के बाद भी दुनिया को खास फर्क नहीं पड़ता. 

अफ्रीकी देशों की कूटनीतिक आवाज भी कमजोर है. ये महाद्वीप बेहद घनी आबादी के बावजूद किसी बड़े मंच पर ताकतवर नहीं. उनके पास न तो मजबूत लॉबी है, न ही ग्लोबल एजेंडा सेट करने की सोच. वहीं यूरोप या मिडिल ईस्ट की लड़ाइयों में ताकतवर देश सीधे इनवॉल्व होते हैं. 

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ग्लोबल मीडिया का बड़ा हिस्सा वेस्ट से चलता है. उनके दर्शकों की दिलचस्पी भी उन्हीं खबरों में मानी जाती है जो यूरोप, अमेरिका या मध्य-पूर्व से जुड़ी हों. अफ्रीका की लड़ाइयां लंबे समय से चल रही हैं और इनमें पश्चिम की तरह कलर फैक्टर नहीं. नतीजा यह कि सूडान या सहेल की हिंसा खबर बनकर तुरंत हट जाती है. 

थकान फैक्टर भी यहां काम करता है. लंबे समय तक चलने वाले युद्धों से दुनिया ऊब जाती है. जब कोई संघर्ष सालों तक बिना समाधान के चलता रहे तो दुनिया उसे अपने हाल पर छोड़ देती है. अफ्रीका के कई लंबे सिविल वॉर इसी श्रेणी में जा चुके. 

पीसकीपिंग सेना भी कम ही भेजी जाती है

अफ्रीका में पीसकीपिंग फोर्स भेजने पर भी कम ही बात होती है. इसकी वजह वही है- ग्लोबल प्राथमिकताएं न होना. अफ्रीका में अक्सर एथनिक समूहों के बीच लड़ाइयां होती हैं जो सालोंसाल खिंचती रहती हैं. ऐसे संघर्ष न तो महाशक्तियों की सुरक्षा से जुड़े माने जाते हैं, न ही  वैश्विक अर्थव्यवस्था को तुरंत बड़ा झटका दे सकते हैं. नतीजा ये है कि वहां शांति सैनिक कम ही भेजे जाते हैं और भेजे भी गए तो पुराने अनुभव खराब रहे. बड़े देश यहां शांति के लिए बैठकें करते नहीं फिरते, न ही कोई मध्यस्थता होती है, जिसकी चर्चा हो सके. 

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